सोशल मीडिया पर निबंध | Social Media Essay in Hindi |सोशल मीडिया प्लेटफार्म बने जवाबदेह! 

सोशल मीडिया पर निबंध | Social Media Essay in Hindi | सोशल मीडिया प्लेटफार्म बने जवाबदेह! 

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जवाबदेही पर विमर्श से पूर्व यह जान लेना उचित रहेगा कि सोशल मीडिया है क्या? ‘सोशल मीडिया’ मीडिया का एक नया चेहरा है, जो परम्परागत मीडिया से इतर है। सोशल मीडिया का चेहरा समाज द्वारा गढ़ा गया है और इसकी बागडोर भी समाज के ही हाथों में है। यानी यह आमजन का मीडिया है, जिसमें सामाजिक सरोकारों का जीवंत अक्स देखने को मिलता है, तो इन सरोकारों पर तत्काल जीवंत प्रतिक्रियाएँ भी देखने को मिलती हैं। सोशल मीडिया यकीनन आमजन के लिए अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन कर सामने आया है और देखते-ही-देखते यह परम्परागत मीडिया से ज्यादा असरदार भी दिखने लगा है। यही कारण है कि इसे नकार पाना इसके आलोचकों के लिए भी संभव नहीं है। समाज का आइना बन चुके सोशल मीडिया को मूर्त रूप देने का काम संचार की उन्नत और आधुनिक तकनीकों ने किया है तथा इसके घटक हैं – फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम, मेसेंजर, जीमेल आदि। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया का दायरा तेजी से बढ़ा है। इसके असंख्य यूजर्स हैं और इसकी वैश्विक पहुँच है। सोशल मीडिया के माध्यम से हम अपने विचारों को दूसरों के साथ साझा कर रहे हैं, तो व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी आदि के विचारों को जान भी रहे हैं। इसके जरिए हम कहीं भी बैठकर दुनिया के किसी भी क्षेत्र के व्यक्ति, समाज या राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति का जायजा ले सकते हैं। इस तरह सोशल मीडिया ने पूरे विश्व को एक गांव में तब्दील कर दिया है। सम्पर्क और संचार को बढ़ाकर लोगों को जोड़ा है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि सोशल मीडिया का दायरा तेजी से बढ़ा है। इसके असंख्य यूजर्स हैं और इसकी वैश्विक पहुँच है। सोशल मीडिया के माध्यम से हम अपने विचारों को दूसरों के साथ साझा कर रहे हैं, तो व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी आदि के विचारों को जान भी रहे हैं। 

सोशल मीडिया की खूबियाँ भी कम नहीं हैं। आपदा प्रबंधन, समावेशी विकास और सरकारी योजनाओं को लोगों तक पहुँचाने में सोशल मीडिया ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश-विदेश में जन आन्दोलनों को सफल बनाने में सोशल मीडिया केन्द्रीय भूमिका निभा रहा है और जन-जागरण का अग्रणी माध्यम बन गया है। रायशुमारी में भी इसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है। इसने ‘ग्रुप कनेक्टिविटी’ को बढ़ाया है। सोशल मीडिया के विविध माध्यमों से पलभर में संदेशो का आदान-प्रदान होता है तथा ज्वलंत मुद्दों पर प्रतिक्रियाएँ सामने आती हैं, जो एक आम राय कायम करने में कारगर सिद्ध होती है। सोशल मीडिया ने न सिर्फ लोकतांत्रिक मल्यों को मजबती प्रदान की है, बल्कि सूचनाओं के लोकतांत्रिक संचार को भी रचा है। 

जन-जागरण में सोशल मीडिया के बढ़ते महत्त्व के कारण ही जहाँ शासन-प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ी है, वहीं जनहित के मुद्दों पर इस माध्यम ने दबाव बनाकर व्यवस्था में परिवर्तन का सूत्रपात किया है। इस प्रकार सामाजिक न्याय और हकों को पाने का दायरा भी बहुत बढ़ा है। यह माध्यम बड़ी शिद्दत से सामाजिक विद्रूपताओं को सामने लाकर जहाँ समाज के कल्याण का काम कर रहा है, वहीं समाज को दिशा-बोध भी करवा रहा है। इसने लोक-प्रशासन में नई अवधारणाओं का सूत्रपात कर सुशासन को धार दी है। वीडियो कांफ्रेंसिंग, ई-प्रशासन तथा ई-चौपाल आदि से सुशासन को गति मिली है, तो सूचनाओं के त्वरित आदान-प्रदान से प्रशासनिक सक्रियता बढ़ी है। इस प्रकार यह विकास का वाहक भी बन चुका है। 

जन-जागरण में सोशल मीडिया के बढ़ते महत्त्व के कारण ही जहाँ शासन-प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ी है, वहीं जनहित के मुद्दों पर इस माध्यम ने दबाव बनाकर व्यवस्था में परिवर्तन का सूत्रपात किया है। 

तमाम खूबियों के बावजूद मीडिया का यह नया चेहरा खुद को खामियों से नहीं बचा पाया। सोशल मीडिया के इस्तेमाल के तौर तरीके कहीं भी आदर्श रूप में नहीं दिखते। इस संदर्भ में भारत तो कुछ ज्यादा ही पीछे दिख रहा है। सोशल मीडिया के विविध माध्यमों पर विद्वेष और घृणा फैलाने वाले उन संदेशों और तस्वीरों की बाढ़ सी देखने को मिल रही है, जो सामाजिक सद्भाव को ठेस पहुँचाकर समाज में जहर घोल रहे हैं। भ्रामक खबरें और संदेश देखने को मिल रहे हैं, जिनसे इसकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सवालिया निशान लग गया है और प्रबुद्ध वर्ग इसके प्रति गंभीर नहीं रह पा रहा है। सोशल मीडिया के माध्यम से राजनीतिक रोटियाँ भी सेंकी जा रही हैं। प्रायः सभी राजनीतिक दल और संगठन बाकायदा अपने आईटी सेल स्थापित कर आम लोगों के बीच भ्रामक संदेश भेज कर उन्हें बरगलाने, भ्रमित करने तथा अपने पक्ष में लाने की कुचेष्टाएँ करते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक दलों और संगठनों को यह माध्यम कुछ ज्यादा ही रास आ रहा है, क्योंकि उन्हें अपने हित साधने के लिए अब ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ रही है। आईटी सेल के महारथियों ने उनका काम आसान कर दिया है। चरित्र-चित्रण से लेकर चरित्र-हनन तक का काम सोशल मीडिया पर व्यापक पैमाने पर हो रहा है। 

सोशल मीडिया के विविध माध्यमों पर तो मानो अफवाहों और भड़काऊ संदेशों की बाढ़-सी आ गई है, जिसने जहाँ नागरिकों के निजी सम्बन्ध दरकने लगे हैं, वहीं देश की आंतरिक सुरक्षा को चेतावनी देती ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाएँ इसके ताजा उदाहरण हैं। सोशल मीडिया पर झूठी और भ्रामक खबरों के कारण लोग किसी को अपराधी समझ लेते हैं और फिर भीड़ द्वारा उसे इस कदर पीटा | जाता है कि इसकी मौत तक हो जाती है। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए देश की शीर्षतम अदालत को यह कहना पड़ा कि सोशल मीडिया पर गैरकानूनी तथा हिंसात्मक संदेशों व वीडियो के प्रचार-प्रसार पर अंकुश लगाने के लिए सरकारें विधि निर्माण करें। इतना ही नहीं, सप्रीम कोर्ट द्वारा भीड़तंत्र की रोकथाम, उपचार एवं दंडात्मक उपायों को सुनिश्चित | करने के लिए सरकार को निर्देशित भी किया गया। यह भी हिदायत | दी कि केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें रोकथाम के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करें तथा रेडियो, टेलीविजन और दूसरे मीडिया मंचों, गृह मंत्रालय और पुलिस की वेबसाइट पर यह प्रसारित करें कि ऐसी घटनाआ के गंभीर परिणाम होंगे। 

सोशल मीडिया के विविध माध्यमों पर तो मानो अफवाहों और भड़काऊ संदेशों की बाढ़-सी आ गई है, जिसने जहाँ नागरिकों के निजी सम्बन्ध दरकने लगे हैं, वहीं देश की आंतरिक सुरक्षा को चेतावनी देती ‘मॉब लिंचिंग’ की घटनाएँ इसके ताजा उदाहरण हैं। 

सोशल मीडिया के कुछ अन्य दुष्प्रभाव भी हैं। इसके इस्तेमाल से यूजर्स में बेचैनी बढ़ती है, व्याकुलता बढ़ जाती है, क्योंकि उसकी हर चीज पर सामाजिक प्रतिक्रिया की इच्छा में वृद्धि होती है। सोशल मीडिया से यूजर्स एक तरह से ‘प्रोग्राम्ड’ हो जाते हैं। बच्चों पर भी इसके दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। इनमें खेलकूद में कमी, जीवन से असंतुष्टि और अभिभावकों से खराब संबंध जैसी प्रवृत्तियाँ देखने को मिल रही हैं। फेसबुक से भारतीयों के निजी डाटा चुराने की घटनाएँ भी प्रकाश में आ चुकी हैं। भारतीयों के निजी डाटा चुराने के आरोप में ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ और ‘ग्लोबल साइंस’ के खिलाफ सी. बी. आई. द्वारा प्रारंभिक जाँच शुरू की जा चुकी है। कुल मिलाकर, सोशल मीडिया से जुड़ी विसंगतियों ने इसे प्रश्नगत कर दिया है। ऐसे में सोशल मीडिया की जवाबदेही की मांग स्वाभाविक है। 

सोशल मीडिया से जुड़ी विसंगतियों के कारण ही इसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग ने जोर पकड़ा है। सरकारें, बुद्धिजीवी एवं प्रौद्योगिकी कंपनियाँ सभी चिंतित हैं तथा सोशल मीडिया के इस्तेमाल के तौर-तरीकों को कैसे आदर्श और संतुलित स्वरूप दिया जाए, इसे लेकर मंथन भी कर रही हैं। सोशल मीडिया से जुड़े अवांछित और अराजक तत्त्वों को हतोत्साहित करने के लिए जहाँ ठोस पहलों की आवश्यकता है, वहीं भारत के बाजार से अच्छा खासा वाणिज्यिक मुनाफा कमा रही सोशल मीडिया कंपनियों को जवाबदेह और सतर्क रहना होगा। उचित प्रौद्योगिकी के जरिए गलत सूचनाओं के प्रवाह को रोकना होगा। 

कुछ उपाय होते भी दिख रहे हैं, ताकि सोशल मीडिया से जुड़ी विसंगतियों पर अंकुश लगाया जा सके। हाल ही में देश के केन्द्रीय इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा व्हाट्सएप को नोटिस भेजकर यह कहा गया कि यदि वह फर्जी खबरों को रोकने में नाकाम रहा, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। 

इसके बाद फेसबुक के स्वामित्व वाले मैसेजिंग एप ‘व्हाट्स एप’ ने 20 करोड़ भारतीय व्हाट्सएप उपयोगकर्ताओं के लिए मैसेज फॉरवर्ड करने की सीमा पाँच चैट्स तक सीमित कर दी, जो कि वैश्विक स्तर पर 20 चैट्स है। व्हाट्सएप ने देश में फर्जी खबरों की पहचान के लिए ‘डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम’ पर भी काम शुरू कर दिया है, ताकि लोगों को गलत सूचनाओं की पहचान के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। कंपनी की तरफ से एक नई सुविधा भी प्रदान की जाएगी, जिसमें आगे भेजे गये प्रत्येक संदेश के साथ एक खास चिह्न लगा होगा। इससे उपयोगकर्ता को पता चल जाएगा कि यह जानकारी अविश्वसनीय हो सकती है। यह चिह्न संदेशों को आगे भेजने से पहले दोबारा विचार करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण संकेत के तौर पर काम करेगा।

वस्तुतः सोशल मीडिया से जुड़ी विसंगतियों को दूर करना अकेले प्रौद्योगिकी कंपनियों के वश में बात नहीं है। इसके लिए सरकारों, समाज और प्रौद्योगिकी कंपनियों को एकजुट होकर प्रयास करने होंगे। बेहतर होगा कि जहाँ सरकार की ओर से यह सुनिश्चित किया जाए कि सोशल मीडिया कंपनियां अफवाहों और आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को रोकने के कुछ ठोस उपाय करें, वहीं इस नए मीडिया का इस्तेमाल करने वाले भी सजगता का परिचय दें। केन्द्र और राज्य सरकारों को यह भी समझना होगा कि अफवाहों और आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार के लिए सारा दोष सोशल मीडिया पर । ही नहीं मढ़ा जा सकता। जहाँ सुरक्षा के लिए प्रौद्योगिकी के नए विकल्प तलाशने होंगे, वहीं सरकार और समाज की ओर से भी सामूहिक कार्रवाई का किया जाना भी आवश्यक है। यानी इस समस्या से सामूहिक रूप से ही निपटा जा सकता है। 

सोशल मीडिया की उपादेयता को देखते हुए इसे न तो खारिज किया जा सकता है और न ही इसे प्रतिबंधित ही किया जा सकता है। आवश्यकता है, इसके इस्तेमाल के तौर-तरीकों को आदर्श और संतुलित स्वरूप प्रदान करने की। यह सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। जहां सोशल मीडिया कंपनियों को घृणा फैलाने वाले तथा सामाजिक सद्भाव को ठेस पहुँचाने वाले संदेशों पर पैनी नजर रखते हुए प्रौद्योगिकी के स्तर पर इनकी रोकथाम के उपाय सुनिश्चित करने होंगे, वहीं सरकारों को भी दंडात्मक उपाय सुनिश्चित करने होंगे। सोशल मीडिया के उपयोगकर्ताओं को भी इसकी विश्वसनीयता बनाए रखने में दृढ़तापूर्वक सहयोग करना होगा, तभी यह अपने उद्देश्यों में सार्थक हो पायेगा। 

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