देवों के देव महादेव की कहानी-गले में लिपटा सर्प 

देवों के देव महादेव की कहानी

देवों के देव महादेव की कहानी-गले में लिपटा सर्प 

शिव भगवान के गले में सदा एक सर्प लिपटा हुआ दिखता है। वह सर्प और कोई नहीं वरन् सर्पराज वासुकी हैं। पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि कश्यप और कक्तू की दो संतानें थीं; बड़ा पुत्र आदिशेष जो कि विष्णु भगवान का सहायक है तथा छोटा पुत्र वासुकी जो शिव जी के गले में रहता है। वासुकी किस प्रकार शिव के गले का हार बना इसकी भी एक कथा है। 

अमृत की खोज में असुर और देवता समुद्र मंथन कर रहे थे। तभी मंथन से जहरीला विष ‘हलाहल’ निकला। विष अत्यंत जहरीला एवं गर्म था और उसमें से धुआँ निकल रहा था। उसे देखकर सभी देवता एवं असुर भयभीत हो गए। विष के प्रभाव के कारण कुछ मूर्छित हो गए। भयभीत देवता भागे-भागे भगवान शिव के पास गए। उन्होंने शिव भगवान से प्रार्थना करी, “हे महादेव! कृपया हमारी रक्षा करें। हमें समुद्र मंथन में हलाहल विष मिला है। उस विष के गर्म धुएँ से कई देवता अचेत हो गए हैं।” 

देवताओं की पुकार सुनकर शिव भगवान ने तुरंत हलाहल को लेकर अपने गले में उतार लिया। माता पार्वती यह देखकर भागी आईं और शिव भगवान का गला उन्होंने जोर से पकड़ लिया जिससे हलाहल नीचे न उतर पाए। उनकी इस फुर्ती के कारण विष शिव भगवान के गले में ही रुक गया। 

जिस समय यह घटना घट रही थी तभी समुद्र मंथन करने वाले सर्पराज वासुकी ने भी निश्चिंत भाव से विषपान प्रारम्भ कर दिया। सर्पराज वासुकी को ऐसा करते देख अन्य सो को भी बल मिला और उन्होंने भी शिव भगवान एवं सर्पराज वासुकी के साथ विषपान किया। यह देख शिव भगवान अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने सों को आशीर्वाद दिया और सर्पराज वासुकी को ससम्मान अपने गले में धारण किया। 

शिव भगवान ‘पशुपतिनाथ’ नाम से भी जाने जाते हैं जिसका अर्थ होता है ‘पशुओं के रक्षक’। एक अन्य कथा भी है जो इस कथन की सत्यता को स्थापित करती है। एक बार सम्पूर्ण सर्प जाति पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उनकी जाति समाप्ति के कगार पर आ गई थी। सभी सर्प एक साथ इकट्ठे हुए और अपनी रक्षा की प्रार्थना लेकर शिव भगवान के पास पहुंचे। 

देवों के देव महादेव की कहानी

कैलाश पर्वत पर पहुँचने पर उनके प्रतिनिधि ने विनम्रतापूर्वक शिव जी का अभिवादन कर उनसे प्रार्थना करी, “हे महादेव! कृपया हमारे जीवन की रक्षा करें। हमारा जीवन खतरे में है। हमें हमारी जाति के समाप्त होने का भय है। हम सभी सॉं पर कृपा करें। आश्रय देकर हमारी रक्षा करें।” 

शिव भगवान ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा, “हे नाग देव! आपका राजा मेरे संरक्षण में है अतः आप सब मुझसे संबंध हैं… आप सभी यहाँ मेरे कैलाश में आश्रय ले सकते हैं। मारे जाने के भय से आप निश्चिंत हो जाइए।” 

इस प्रकार सभी सर्प शिव के साथ ही कैलाश पर्वत पर रहने लगे। किन्तु कैलाश पर्वत की ठंड उनसे बर्दाश्त न हुई और उन्होंने पुनः प्रभु से प्रार्थना करी, “हे महादेव! कृपया हमें क्षमा करें। यहाँ हमें बहुत सर्दी लग रही है। हमें गर्मी चाहिए। क्या हमें आप अपने शरीर की गर्मी प्रदान करेंगे?” 

इस प्रकार शिव भगवान ने उन्हें तुष्ट करने एवं सर्दी से बचाने के लिए आभूषण रूप में अपने शरीर पर धारण किया और उन्हें सुरक्षा प्रदान कर समस्त सर्यों के जीवन की रक्षा की।