सिस्टर निवेदिता की जीवनी और इतिहास | Sister Nivedita Biography and History

सिस्टर निवेदिता की जीवनी

सिस्टर निवेदिता की जीवनी और इतिहास | Sister Nivedita Biography and History

मारग्रेट एलिजाबेथ नोबल का जन्म 28 अक्टूबर, 1867 को टायरॉन जिले के डुंगनन नामक गांव में हुआ था। बाद में जब मारग्रेट नोबल स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आईं तो उनका नाम ‘सिस्टर निवेदिता’ हो गया और फिर वे इसी नाम से प्रसिद्ध हो गईं। 

मारग्रेट नोबल के पितामह का नाम जॉन नोबल था। यह नोबल परिवार स्कॉटिश मूल का था, जो पिछले पांच सौ वर्षों से आयरलैंड में आकर रहने लगा था। मारग्रेट नोबल के पिता का नाम सेम्युअल नोबल और माता का नाम मैरी ईसाबेल था। 

जब सेम्युअल अपनी पत्नी मैरी के साथ ग्रेट टोरिंगटन शहर में आ गए तो मारग्रेट भी उनके पास ही आ गईं, जो अब तक अपनी दादी के पास ही रहती थीं। यह 1867 का वर्ष था। इस दौरान मारग्रेट की एक बहन ‘मे’ और भाई ‘रिचमंड’ का जन्म भी हो चुका था। 

पिता सेम्युअल मारग्रेट को बहुत लाड-प्यार करते थे। अक्सर जब भी वे कहीं विशेष कार्य से बाहर जाते तो मारग्रेट को भी अवश्य ही अपने साथ लेकर जाते । जब सेम्युअल केवल 34 वर्ष के थे, उनकी मृत्यु हो गई। इसका मारग्रेट को बड़ा गहरा दुख हुआ। इसके बाद मैरी अपने तीनों बच्चों को साथ लेकर अपने पिता हेमिल्टन के पास आयरलैंड आ गईं। यह वह समय था, जब आयरलैंड भी स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के खिलाफ क्रांतिकारी संघर्ष कर रहा था। 

मारग्रेट और मे को हेलिफेक्स महाविद्यालय में दाखिल करा दिया गया। 1884 में उनकी महाविद्यालयी शिक्षा पूर्ण हुई। फिर उन्होंने केसविक स्कूल में शिक्षकीय शिक्षण प्राप्त किया और रेक्सहेम में उनकी नियुक्ति शिक्षिका के पद पर हो गई। अध्यापन में उनकी रुचि कुछ अधिक ही थी। अत: उन्होंने अपने आपको पूरे उत्साह से इस क्षेत्र में समर्पित कर दिया। 

इस बीच मारग्रेट एक युवक इंजीनियर के संपर्क में आईं। दोनों के विचार एक-दूसरे से काफी मिलते-जुलते थे। धीरे-धीरे उनके बीच प्रेम हो गया और बात विवाह तक जा पहुंची, लेकिन उस युवक की बीमारी के चलते मृत्यु हो गई। 1889 में वे रेक्सहेम छोड़कर चेस्टर आ गईं। 1890 में वे चेस्टर को भी छोड़कर अपनी मां के साथ विंबलडन आ गईं। 1892 में उन्होंने विद्यालय आरंभ कर स्वतंत्र रूप से कार्य करना आरंभ कर दिया। इस प्रकार 1894 तक वे इसी कार्य में व्यस्त रहीं। 

22 अक्टूबर, 1895 को लंदन में पिकाडिली के प्रिंसेस हाल में स्वामी विवेकानंद ने अपना प्रभावशाली भाषण दिया, जिसने मारग्रेट को अभिभूत कर दिया। मारग्रेट स्वामी जी के व्यक्तित्व से इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने इस संबंध में वर्णन भी कुछ इस प्रकार किया है 

“इस व्यक्ति के ईश्वरीय अंशों व असामान्य नेतृत्व गुण को मैंने पहचान लिया है। मेरी यह इच्छा है कि मैं उनके समाज-विषयक प्रेम का दासत्व स्वीकार कर लूं। मैं चाहती हूं कि जिस समाज से वे इतना प्रेम करते हैं, उस समाज की सेवा के लिए मैं अपने आपको समर्पित कर दूं। यही वह व्यक्तित्व है, जिसे मैं बारंबार प्रणाम करती हूं। यही तो वह चरित्र है, जिसने मुझे विनम्र बनाया है। एक 

धार्मिक उपदेशक के रूप में मैंने देखा कि उनके पास विश्व को देने के लिए धर्मविचारों की सुव्यवस्थित श्रृंखला है, जिसका मनन करने के पश्चात् कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि सत्य कहीं और है। 

जब वे अपने धर्म के तत्वों के बारे में बताते हैं और जिस क्षण उन्हें लगता कि कोई विचारधारा सत्य से विसंगत है तो वे उसे दूर कर देते हैं और उनकी इसी महानता के कारण ही मैं उनकी शिष्या बनी हूं।”

1896 में स्वामी विवेकानंद फिर इंग्लैंड आए और जून के अंत से लेकर जुलाई के मध्य तक उन्होंने कई व्याख्यान दिए, जिनमें मारग्रेट भी उपस्थित रहीं। स्वामी जी के प्रभावशाली एवं ओजस्वी विचारों से मारग्रेट बहुत प्रभावित थीं। स्वामी जी की शिक्षा को उन्होंने मन-ही-मन अंगीकार कर लिया था। स्वामी जी की एक-एक बात ने उन्हें आंदोलित कर दिया था और वे स्वामी जी के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलने को तत्पर हो उठीं। इस संबंध में उन्होंने स्वामी जी के नाम एक पत्र लिखा, जिसके प्रत्युत्तर में स्वामी जी ने 7 जून, 1896 को लिखा 

“प्रिय नोबल, 

वस्तुतः मेरे जीवन के आदर्शों को इन शब्दों में समझा जा सकता है और वे शब्द हैं-मनुष्य जाति को उनके देवत्व तक ले जाना। उन्हें उनके दिव्य स्वरूप या ईश्वरत्व का अहसास कराने के लिए उपदेश देना ही मेरा लक्ष्य है। जीवन के प्रत्येक कार्यकलापों में, प्रत्येक क्षेत्र में इस बात को किस प्रकार प्रकट किया जाए, इसका उपाय बताना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है।। 

यह संसार अंधविश्वासों और कुसंस्कारों के बंधनों में जकड़ा हुआ है। मुझे इन स्त्री-पुरुषों के प्रति दया आती है, जो इन अंधविश्वासों के बंधन के कारण पीड़ित होते हैं और अत्याचारों को सहते हैं। मुझे इन अत्याचारियों के प्रति कुछ अधिक ही दया आती है, जो इन अंधविश्वासों के चलते लोगों को कष्ट देते हैं। 

एक बात जो सूर्य की भांति स्पष्ट दिखाई दे रही है, वह यह कि हमारे दुर्भाग्य का मुख्य कारण निरक्षरता एवं अज्ञानता है और कुछ नहीं। इस विश्व को कौन ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाएगा? कौन इस जगत को प्रकाश दिखाएगा? भूतकाल में बलिदान का नियम था। भूतकाल में जिन-जिन लोगों ने बलिदान किए, वे सबके सामने उदाहरण बन गए। उन लोगों को सदियों तक याद रखा जाएगा और बलिदान का यह नाम युगों तक ऐसे ही चलता रहेगा। इस पृथ्वी के सभी वीर साहसी पुरुषों को, सर्वोत्तम व्यक्तियों को सबकी भलाई के लिए एवं सबके कल्याण के लिए अपने जीवन का बलिदान करना होगा। भगवान बुद्ध के समान ही असीम दया तथा अनंत प्रेम से परिपूर्ण सैकड़ों जीवन की इस पृथ्वी को बहुत आवश्यकता है। 

विश्व के धर्म प्राणहीनता से, तिरस्कार से निर्जीव केवल विडंबना बन गए हैं। आज विश्व क्या चाहता है ? एक आदर्श चरित्र! ऐसे लोगों की संसार को आवश्यकता है, जिनका जीवन प्रेम और नि:स्वार्थता का ज्वलंत उदाहरण हो। ऐसे निःस्वार्थी लोगों का प्रेम उनके एक-एक शब्द को वज्र की भांति प्रभावशाली बना देगा। 

मेरी यह दृढ़ धारणा है कि तुम अंधविश्वासी नहीं हो। तुममें कुसंस्कार नहीं हैं। मुझे आशा है कि तुममें इतनी क्षमता है कि तुम संसार को हिला सको। समस्त संसार को प्रेरणा दे सको। और भी लोग हैं, जो आएंगे और तुम्हारे कार्य में तुम्हारा सहयोग करेंगे। आज हमें प्रखर शब्दों और उससे अधिक ‘वीर’ कर्मों की बहुत आवश्यकता है। जागो! जागो! महान व्यक्तियों जागो! यह संसार दुर्भाग्य की अग्नि में जल रहा है। ऐसे समय में तुम कैसे सो सकते हो? चलो, हम उस ईश्वर को पुकारें और तब तक पुकारें, जब तक वह जाग्रत न हो जाए। जब तक कि वह ईश्वर, जो तुम्हारे अंदर अवस्थित है, तुम्हारी पुकार का उत्तर न दे दे। और अधिक कितना कुछ चाहिए इस जीवन में? हमें इससे अधिक कौन-सा महान कार्य करना है इस जीवन में? मैं जैसे-जैसे कर्म के क्षेत्र में आगे बढ़ता जाऊंगा, वैसे-वैसे विस्तारपूर्वक सारी सूचनाएं मिलती जाएंगी। योजनाएं अपने आप बनेंगी और साकार भी होंगी। मैं कभी भी किसी कार्य की अग्रिम रूपरेखा तैयार नहीं करता। कार्य की ये रूपरेखाएं अपने आप बनती जाती हैं और कार्य स्वयं आकार ग्रहण करने लगता है। मैं तो केवल कहता हूं-जागो! जागो! 

मेरे सभी आशीर्वाद अनंतकाल तक के लिए तुम्हारे साथ हैं।” 

स्वामी जी का यह पत्र पढ़कर मारग्रेट भावविभोर हो गईं। वे समझ गई थीं कि शीघ्र ही स्वामी जी उन्हें अपने साथ कार्य करने का अवसर देंगे, लेकिन वे यह भी जान गई थीं कि इसके लिए अभी उन्हें प्रतीक्षा करनी होगी। 

जब स्वामी जी भारत लौटने की तैयारी में थे, उस समय मारग्रेट भी चाहती थीं कि वे भी भारत जाएं। इस संबंध में उन्होंने अभी तक स्वामी जी से कोई बात नहीं की थी, लेकिन एक दिन शाम के समय श्रीमति मुलर ने मारग्रेट की इस इच्छा का वर्णन स्वामी जी के सामने कर दिया। उस समय स्वामी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। वे समझ गए थे कि मारग्रेट उनके कार्य को लेकर गंभीर हैं। वे यह भी अच्छी तरह समझ गए थे कि मारग्रेट भारतीय महिलाओं की सेवा में अपना जीवन समर्पित करने की इच्छा भी रखती हैं। अतः स्वामी जी ने मारग्रेट को ढेर सारे पत्र लिखे, जिनमें 20 जून, 1897 को लिखा एक पत्र इस प्रकार है 

“मैं स्पष्ट रूप से तथा निष्कपट भाव से तुम्हें यह पत्र लिख रहा हूं। तुम्हारे द्वारा लिखा हुआ प्रत्येक शब्द मेरे लिए बहुत महत्व रखता है। मेरे लिए तुम्हारा प्रत्येक पत्र बहुत ही आकांक्षा की वस्तु है, उसका मेरे यहां सौ-सौ बार स्वागत है। जब तुम्हारी इच्छा हो, जब कभी तुम्हें अवसर मिले और जो कुछ तुम्हें पसंद हो तो तुम बिना संकोच किए पत्र लिख देना। यह निश्चित समझ लो कि तुम्हारी एक भी बात की गलत व्याख्या नहीं होगी और न ही तुम्हारी किसी बात से कोई गलत राय बनाऊंगा। मैं तुम्हारी किसी भी बात की उपेक्षा नहीं करूंगा। 

बहुत दिन हो गए कि तुम्हारी ओर से वहां के कार्य की प्रगति के बारे में कुछ भी समाचार नहीं मिला। क्या इस संबंध में तुम कुछ बता सकती हो? मैं इस कार्य के लिए भारत से किसी भी प्रकार की सहायता की आशा नहीं कर रहा हूं। जबकि यहां सभी मुझसे बहुत प्रसन्न हैं और मुझे लेकर खूब उत्साहित भी हैं, लेकिन भारत के लोग बहुत गरीब हैं।” 

स्वामी जी एक कुशल विचारवान एवं निपुण बुद्धिमान वक्ता थे। वे लोगों की भावनाओं एवं उनके विचारों को शीघ्र ही ताड़ने की अद्भुत शक्ति रखते थे। उनका तर्कज्ञान अद्भुत था। उनमें देशप्रेम की भावना कूट-कूटकर भरी हुई थी। वे जब भी कुछ बोलते तो उसमें देश की महिमा का गुणगान करते और लोगों को अपनी सभ्यता एवं संस्कृति से परिचित कराने का प्रयास कराते। उनके विषय में मारग्रेट ने लिखा है 

“स्वामी जी के स्वभाव में एक बात बिल्कुल साफ दिखाई पड़ती है कि ऐसा प्रतीत होता है कि वे स्वयं यह कभी जान ही नहीं पाए कि वर्तमान परिस्थितियों से कैसे सामंजस्य स्थापित किया जाए और शायद ऐसा उनके अपने देश के प्रति अनोखे प्रेम तथा देशवासियों के कष्टों के प्रति मन में उठते क्रोध के कारण था। पिछले कुछ समय में मैंने उन्हें लगभग ही रोज बहुत निकट से देखा, इसलिए मुझे लगा कि भारत के प्रति प्रेमभावना उनकी रग-रग में समा गई है; जैसे हवा उनकी सांसों में समाती है। सच में वे जन्मजात कर्मयोगी हैं। जन्म से देशभक्त हैं। वे राष्ट्रीयता शब्द का प्रयोग कभी नहीं करते और न ही ‘राष्ट्रनिर्माण’ या ‘मानवनिर्माण’ काल या युग की घोषणा करते हैं। 

वे कहते थे कि ‘मानव के व्यक्तित्व का निर्माण’ उनके स्वयं का कर्तव्य है, लेकिन वे अपनी मातृभूमि के जन्मजात प्रशंसक तथा एक उत्कृष्ट भक्त थे। उनके आदर की पात्र भारतमाता थी। उसके प्रति उनका हृदय बहुत ही अधिक संवेदनशील था। जैसे कोमल-सी नाजुक घंटी अपने ऊपर पड़ने वाले प्रत्येक आघात के साथ कंपित होती है, उसी तरह उनका हृदय अति कोमल और मातृभूमि के प्रति अति संवेदनशील था। भारत के किसी भी कोने में उत्पन्न एक छोटी-सी सिसकी, एक आर्त करुण स्वर उनके हृदय को प्रतिध्वनित कर जाता। 

किसी भी प्रकार का भयप्रद रुदन या अत्याचार की आवाज, कमजोर थरथराहट या अत्याचार सहन करने वाले का कष्ट, आत्मसंयम के कारण हुआ संकोचन जिसे वे जानते तक नहीं थे अथवा समझ नहीं सकते थे। किसी के पापपूर्ण कार्य के प्रति वे बहुत ही कठोर थे। सांसारिक बुद्धि की इच्छा के प्रति वे हर तरह से उदार थे। यह सब इसलिए, क्योंकि वे हर अच्छे या बुरे कर्म, गलतियों के प्रति स्वयं को उत्तरदायी समझते थे और साथ ही वे यह भी जानते थे कि विश्व के प्रति उनके जैसा महान दृष्टिकोण और किसी के पास हो ही नहीं सकता।” 

इस प्रकार पत्रों के माध्यम से स्वामी जी और मारग्रेट के बीच अनेक बातों व मुद्दों को लेकर विचारों का आदान-प्रदान खूब होता था। उस समय स्वामी ब्रह्मानंद रामकृष्ण मिशन के अध्यक्ष थे। भारत में रामकृष्ण मिशन द्वारा जो कार्य किए गए थे, उसकी एक रिपोर्ट उन्होंने विदेशों में स्थित केंद्रों में भी भेजी थी। मारग्रेट ने उन्हें एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने मिशन के कार्यों के बारे में विशेष रूप से पूछा था। वे भारत में मिशन द्वारा किए गए कार्यों का सारा ब्यौरा जानना चाहती थीं। जब स्वामी जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने मारग्रेट के सभी प्रश्नों का उत्तर देते हुए एक बड़ा-सा पत्र लिखा और उसे स्वामी ब्रह्मानंद को भेज दिया। स्वामी ब्रह्मानंद ने स्वामी जी के शब्दों को ही उद्धृत करते हुए पत्र लिखा, जिसके कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं 

Sister Nivedita Biography and History

“विश्व के विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच विश्व बंधुत्व की भावना का निर्माण करना ही हमारे परम पूजनीय श्रीरामकृष्ण देव के जीवन का मुख्य उद्देश्य था, ताकि हमारा समाज उस मौलिक लक्ष्य को प्राप्त कर सके, जिसके लिए वे कई वर्षों से उद्यम कर रहे थे। हमें धर्म के अखाड़े में प्रवेश करना है और किसी नए पंथ या संप्रदाय को जन्म देने के लिए, क्योंकि पहले से ही बहुत सारे धर्म इस विश्वरूपी मंच पर अपना अधिकार जमाए हुए हैं और न ही हिंदुत्व की स्वीकृति के लिए या विश्व के किसी अन्य धर्म की स्वीकृति के लिए स्पर्धा करनी है। हमारा एक ही नारा है-शांति । हमारा प्रमुख उद्देश्य संसार के अन्य मतावलंबियों के बीच शांति स्थापित करना तथा अन्य धर्मों को एक अलौकिक नित्य वैश्विक धर्म का अंग मानते हुए सबके बीच सद्भावना स्थापित करना है। यही वह संदेश है, जिसकी घोषणा करने का रामकृष्ण मिशन विशेषाधिकार चाहता है।” 

लंदन में स्वामी अभेदानंद वेदांत केंद्र के कार्य को सुचारू रूप से चलाते थे, जिसमें मारग्रेट उनकी यथासंभव सहायता करती थीं। जल्दी ही विंबलडन में भी वेदांत केंद्र की स्थापना की गई। इसी दौरान मारग्रेट ने लंदन में किए गए कार्यों के बारे में ‘ब्रह्म वादिन’ में समय-समय पर अपनी रिपोर्ट भी प्रस्तुत की। 

मारग्रेट के मन में यह इच्छा तीव्र हो उठी थी कि वे जितना जल्दी हो सके, भारत जाएं और वहां रहकर अपने काम को अंजाम दें। उनकी यह इच्छा पूरी होने का समय आ गया था। 28 जनवरी, 1898 को मारग्रेट कलकत्ता पहुंचीं। स्वयं स्वामी विवेकानंद उनका स्वागत करने के लिए बंदरगाह पर आए थे। कुछ दिन कलकत्ता की गलियों एवं मंदिरों में घूमने के पश्चात् उनका परिचय प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु और उनकी बहन लावण्यप्रभा बसु से हुआ। इसके अलावा उन्होंने टैगोर परिवार के लोगों से भी मुलाकात की। 

स्वामी जी चाहते थे कि यदि मारग्रेट बड़ी गहराई से भारतीयों के साथ जुड़ना चाहती हैं तो उन्हें भारतीय भाषा से भी परिचित होना होगा। अतः स्वामी जी ने उनके लिए बंगाली भाषा सीखने की व्यवस्था कर दी। थोड़े ही समय में वे भारतीय रीति-रिवाजों व संस्कारों से परिचित हो गईं। उन्हें भारतीय सभ्यता व लोगों से परिचित कराने के लिए स्वामी जी ने पहले वर्ष भारत का भ्रमण किया। 

स्वामी जी जो भी उपदेश करते थे, उसे मारग्रेट बड़ी जल्दी से ग्रहण कर लेती थीं। उनके कार्य करने की लगन ने स्वामी जी को बहुत प्रभावित किया। फरवरी, 1898 को उन्होंने अपने मित्र श्री और श्रीमति इरिक हेमंड को एक पत्र लिखा 

“अब स्वामी जी एक संन्यासी संस्था संबंधित शिक्षा केंद्र को स्थापित करने के लिए चिंतित हैं। यहां शिक्षाकार्य के लिए युवा संन्यासियों को प्रशिक्षित किया जाएगा। ऐसे शिक्षा केंद्र केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पश्चिम में भी स्थापित किए जाएंगे। यही वह विचार बिंदु हैं, जिस पर हमने कभी विचार नहीं किया। ऐसा मैं सोचती हूं। मुझे यह विश्वास है कि तुम भी मेरे साथ इस बात के महत्व से सहमत होगी कि वेदांत सभी धर्मों के धार्मिक जीवन पर प्रकाश डालता है। क्या कोई इस बात को समझने से इनकार कर सकता है कि यह वेदांत का प्रकाश पिछले तीन हजार वर्षों से किसी एक ही जाति के अधिकार में है। बजाय इसके कि इसका पूरे विश्व में प्रचार-प्रसार हो, वे ईर्ष्यावश इसे अपने ही वंश के नीच जाति के साथ-साथ उच्च जाति के लोगों तक भी पहुंचने नहीं दे रहे हैं। इस ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करने का अधिकार सिर्फ एक ही विशिष्ट जाति तक ही सीमित है और यही सुधार स्वामी जी लाना चाहते हैं।” 

स्वामी जी ने देखा कि मारग्रेट संपूर्ण भक्तिभाव से भारतीयों की सेवा करने के लिए तत्पर हैं। मारग्रेट की समर्पण भावना ने स्वामी जी को बहुत प्रभावित किया। इसी कारण स्वामी जी ने मारग्रेट का नाम ‘निवेदिता’ रख दिया। जबकि रामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदा मां उन्हें प्यार से ‘खुकी’ कहकर संबोधित करने लगीं। इस प्रकार मारग्रेट भारत में भगिनी निवेदिता और विदेश में सिस्टर निवेदिता बनकर स्वामी जी की प्रमुख शिष्या के रूप में भारतीय संस्कृति, सभ्यता, दर्शन, अध्यात्म और वेदांत का प्रचार-कार्य करने लगीं। 

जब कभी निवेदिता स्वामी जी के विचारों एवं भावनाओं से व्याकुल होती तो वे इसके समाधान के लिए अपनी समस्या को स्वामी स्वरूपानंद के सामने प्रकट कर देतीं। तब स्वामी स्वरूपानंद उन्हें समझाते, जिससे उन्हें संतुष्टि मिलती। एक प्रकार से कहा जा सकता है कि स्वामी स्वरूपानंद ने निवेदिता और स्वामी जी के बीच एक पुल की भूमिका निभाई। वास्तव में, स्वामी स्वरूपानंद ने ही निवेदिता को स्वामी जी के विचारों से भली-भांति अवगत कराया और यही कारण था कि निवेदिता स्वामी जी के विचारों एवं भावनाओं को समझ सकीं। स्वामी स्वरूपानंद ने ही निवेदिता को गीता की शिक्षा दी और उनके रहस्य से अवगत कराया। 

यह स्वामी स्वरूपानंद ही थे, जिनसे निवेदिता ने योगक्रिया सीखी, ध्यान लगाना सीखा। इससे निवेदिता को जीवन में बहुत लाभ मिला। लेकिन निवेदिता को बहुत संघर्ष करना पड़ा, जिसका वर्णन उन्होंने इस प्रकार है किया है- 

“आखिरकार वह समय भी आ ही गया, जब मानसिक कष्टों की इतनी तीव्रता जो मेरे लिए प्रयुक्त हुई और जो शायद ही मेरे मन से उत्पन्न विषाद को 

सरलता से दूर कर सकेगी तथा मेरे और स्वामी जी के बीच वैचारिक मतभेद अपने चरम पर पहुंच जाएगा-हमारे समूह की एक वयस्क महिला ने यह सोचकर इस वैचारिक कलह को शांत करने के लिए गंभीरतापूर्वक तथा दयावश बीच-बचाव किया। उन्होंने मेरे मन में उठते विचारों को स्वामी जी को कह सुनाया। 

स्वामी जी ने बड़ी शांति से सब सुना, फिर वे वहां से उठकर चले गए। जब शाम को वे वापस आए तो हम सब लोग बरामदे में एकत्रित थे। वे उसकी ओर देखकर एक बच्चे की तरह निश्छल भाव मुंह पर लाकर बोले, ‘तुम ही ठीक थी। अब यहां एक परिवर्तन आना चाहिए। अब मैं कुछ दिनों के लिए यहां से जंगल में अकेला जा रहा हूं और वहां से मैं जब वापस आऊंगा तो मानसिक शांति प्राप्त कर लूंगा।’ 

इसके बाद वे मुड़े और चांद की नई कोर की ओर देखकर बोले, ‘देखो, मुसलमानों के लिए नए चांद का बहुत महत्व है। चलो, हम भी नए चांद के साथ नए जीवन की शुरुआत करें।’ 

इतना कहकर उन्होंने आशीर्वाद देने की मुद्रा में अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए और उन्हें आशीर्वाद दिया। इस सच्चे मन की गहराई से दिए गए आशीर्वाद ने उनकी अब तक की सबसे अधिक विद्रोही शिष्या को उनके सामने झुका दिया। यह क्षण निश्चय ही हम दोनों के बीच संधि का माधुर्य भरा क्षण था। इस तरह के क्षण किसी के मन में उत्पन्न भ्रम के मायाजाल को खंडित होने से नहीं बचा सकते। 

इस बारे में मुझे एक कहानी सुनानी है, जिसके अंत को ही मैं स्पर्श कर सकूँगी। कई वर्ष पहले श्रीरामकृष्ण देव ने अपने शिष्यों से कहा था कि एक दिन ऐसा अवश्य आएगा, जब मेरा प्यारा नरेन अपने ज्ञान के प्रकाश को अपने एक स्पर्श से किसी को भी दे सकेगा। अल्मोड़ा की उस शाम को मेरे ऊपर ठाकुर की वह भविष्यवाणी सही सिद्ध हुई। 

अकेले में जब मैंने ध्यान लगाया तो पाया कि मैं अनंत गहराइयों जैसी अच्छाइयों के आकाश में कहीं गहरे किसी बिंदु पर टकटकी लगाए देख रही हूं और अपने आपको पहचानने की कोशिश कर रही हूं, लेकिन अब मुझमें अहंकार या आत्मप्रशंसा का भाव नाममात्र को भी नहीं रह गया है। 

इसके साथ ही मैंने यह सीखा कि भौतिक धरातल पर रोजमर्रा के सरल अनुभव जिस सच्चाई को साबित करते हैं, वे सब हिंदू धर्म की धार्मिक मनोविज्ञान की पुस्तकों से संबंधित हैं और वर्णित भी हैं। साथ ही अपने जीवन में पहली बार मैं यह समझ पाई हूं कि एक महान गुरु वह होता है, जिसमें इतनी मानसिक शक्ति हो कि वह हमारे अंदर स्थिति व्यक्तिगत संबंधों की माया को एकदम समाप्त कर दे और उसके स्थान पर ऐसी दृष्टि को स्थापित कर दे, जो बिल्कुल ही व्यक्ति भाव से रहित हो और जो सत्य से साक्षात्कार करा सके।” 

Sister Nivedita Biography and History

निवेदिता का सदैव यह प्रयास रहता कि वे स्वयं को स्वामी जी के विचारों के अनुसार बना लें। वे उन्हीं के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात् करने का प्रयास करतीं। उनकी इस प्रकार की भावना उनके पत्रों में, जो उस समय लिखे गए थे, प्रकट होती है 

“मुझे एक महान व्यावहारिक ज्ञान की बात सीखने को मिली है। उसे अध्यात्मवादिता या धार्मिकता कहा जा सकता है। ऐसे एक विशेष गुण का जीवन में विशेष महत्व है और योग्यता भी। जिस प्रकार मानव-हृदय मानवीय प्रीति की अत्यंत अभिलाषा करता है, उसी तरह आत्मा भी ईश्वर की अत्यंत अभिलाषा करती है। आत्मा ईश्वर को पाना चाहती है, उसमें विलीन हो जाना चाहती है। जिसे मैं हृदय की उदारवादिता कहा करती थी, वह तो एकदम महत्वहीन है। हृदय की नि:स्वार्थता ही सब कुछ है तथा महत्वपूर्ण है। वह गुण जिसे हम स्वत्वहीनता, आत्मत्याग या निःस्वार्थता कहते हैं, इस यथार्थ गुण के उज्ज्वल शुभ प्रकाश के सामने से सभी गुण बहुत अधिक अस्पष्ट व हीन दिखाई देते हैं। 

यह बहुत ही अद्भुत बात है कि जीवन के इन प्रारंभिक सत्यों को समझने के लिए मुझे बहुत ही अधिक समय लगा, लेकिन अब मैंने इन वास्तविकताओं को इतना आत्मसात् कर लिया है कि अब मुझे ऐसा लगता है कि मेरे पास आगे समझने के लिए एवं आगे देखने के लिए कुछ भी नहीं है। यद्यपि मैं अपने जीवन के पिछले अनुभवों तथा मानवीय संबंधों को अपने जीवन से बाहर नहीं निकाल सकती, लेकिन मैंने कई संतों को इस दिशा में कठिन प्रयास करते देखा है। क्या वे सब गलत हो सकते हैं ? फिलहाल तो मैं बस अंधेरे में ही हाथ-पैर मार रही हूं और इधर उधर इस प्रकार की घटनाओं के बारे में पूछताछ कर रही हूं। यही नहीं, सूक्ष्म रूप से परीक्षा कर प्रमाण प्राप्त करने की कोशिश कर रही हूं। मुझे यह आशा है कि एक दिन अवश्य आएगा कि जब मुझे इस बारे में प्राथमिक जानकारी मिल जाएगी, जिससे मैं पूर्ण ईमानदारी से वह जानकारी दूसरों के बीच भी बांट सकू।” 

स्वामी जी, निवेदिता और कुछ अन्य सहयोगी अनेक शहरों का भ्रमण करते हुए कश्मीर पहुंचे। कश्मीर की भव्य सुंदरता ने निवेदिता का मन मोह लिया था। वहां की हरी-भरी प्राकृतिक छटा उन्हें स्वर्ग का अहसास करा रही थी। यहीं निवेदिता ने पहली बार स्वामी जी की ईश्वर को पाने की गहरी व तीव्र इच्छा को समझा। इस प्रवासकाल के बारे में उन्होंने कुछ इस प्रकार वर्णन किया है 

“वास्तविकता तो यह है कि मैं जो कुछ भी लिखने का प्रयास कर रही हूं और जो कुछ भी मैं कहना चाहती हूं, वही सत्य है। मेरा तो स्वाभिमान टूट चुका है। फिर भी वे प्रसन्नता से सब कुछ बताना चाह रहे हैं। उनका भी मौन (अपने बारे में) डांवाडोल हो रहा है। इस बात के लिए हम और कश्मीर की ये हसीन वादियां साक्षी रह सकती हैं। 

वे बोल रहे हैं न तो भारत की भौगोलिक स्थिति के बारे में, न ही राजनीति के बारे में, न महान व्यक्तियों के आचार-विचार और उनके व्यक्तित्व के बारे में और न ही अज्ञात वंशों के बारे में। वे इनमें से किसी के बारे में भी नहीं बोल रहे हैं। उनकी बातों में हमें उनके स्वयं के अनुभवों और धार्मिक जीवन में हुए असाधारण अनुभवों की झलक दिखाई दे रही है। जिन बातों को वे अभी तक बस टाल ही जाते थे, वे उन्हें स्वीकार कर रहे हैं। मानो हम पर कृपा कर रहे हों।” 

जब निवेदिता अल्मोड़ा में थीं तो उस समय उन्होंने महसूस किया था कि अंग्रेज अन्य धर्मों एवं जातियों के प्रति दुर्भाव रखते हैं और दूसरी जाति के लोगों को घृणा भरी दृष्टि से देखते हैं । इस सबके बावजूद उन्हें यह आशा थी कि कभी तो भारत और इंग्लैंड के बीच आपसी सद्भावना पैदा होगी ही और इन देशों के लोग एक-दूसरे को समझ सकेंगे। अपनी इन्हीं भावनाओं को उन्होंने एक पत्र में इस प्रकार प्रकट किया था, जो श्रीमती हेमंड को लिखा गया था 

“एक संन्यासी बंधु ने सबको आज सुबह सावधान करते हुए बताया कि पुलिस स्वामी जी की निगरानी जासूसों द्वारा करवा रही है। हम सभी यह बात साधारण रूप से जानते थे और इसे साधारण ही समझते थे। फिर भी इस समाचार ने इस बात की गंभीरता को बढ़ा दिया है। यह बात सुनकर स्वामी जी को हंसी आ गई, लेकिन मुझे यह घटना बड़ी गंभीर लग रही है। मैं इस बात के महत्व के संबंध में कुछ भी मदद नहीं कर सकती। स्वामी जी की निगरानी करवाना या उनकी किन्हीं बातों में रुकावट पैदा करके अंग्रेज सरकार अपने आपको मूर्ख साबित करने पर तुली है। 

यहां उनका बहुत आदर है और प्रभाव भी। यदि स्वामी जी का विरोध अंग्रेज सरकार करेगी तो यहां पूरे देश में अवश्य विद्रोह की ज्वाला भड़क उठेगी। यदि ऐसा कुछ हुआ तो मैं एक देशभक्त अंग्रेज महिला, जो इस देश की हवा में सांस ले रही है, सबसे पहले अंग्रेज सरकार के विरुद्ध खड़ी हो जाऊंगी। हम यह आशा रखें कि सरकार के सभी संदेह और अविश्वास अवश्य ही दूर होंगे।” 

 निवेदिता जो भी कार्य करती थीं, उसे पूरी लगन व श्रद्धा से करती थीं। उनकी प्रमुख विशेषता यह थी कि उन्हें जिस क्षेत्र में कार्य करना होता था, वे उसके बारे में पूरी तरह से परिचित होकर ही आगे कदम बढ़ाती थीं। चूंकि उन्हें स्त्रियों के बीच रहकर कार्य करना था तो वे अधिक-से-अधिक अनुभव प्राप्त करना चाहती थीं और यह अनुभव उन्हें शारदा मां के सान्निध्य में रहकर प्राप्त हो सकता था। अतः उन्होंने स्वामी जी से जिद की कि उन्हें शारदा मां के घर में रहने का मौका मिले, भले अतिथि के रूप में ही सही। 

कुछ समय पश्चात् 10/2 बोसपाड़ा गली के एक मकान में निवेदिता के लिए एक कमरे को किराये पर लेने के लिए व्यवस्था की गई। यहां दो कमरे थे। इनमें से एक में स्वामी योगानंद रहते थे और दूसरे कमरे में निवेदिता। 

यद्यपि निवेदिता एक विदेशी महिला थीं और उनका रहन-सहन भी विदेशी सा ही था, लेकिन फिर भी शारदा मां के दिल में उनके लिए कोई मैल नहीं था और न ही कभी भी शारदा मां ने यह महसूस किया कि कोई विदेशी महिला उनके सान्निध्य में समय व्यतीत करती है। शारदा मां तो उन्हें अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में ही देखती थीं। 

इसी दौरान स्वामी जी का मन न जाने किस अलौकिक शक्ति के प्रभाव से भगवान शिव की ओर से हटकर मां काली की ओर आकृष्ट हो गया। अब वे अधिकांश समय मां काली के ध्यान में ही लीन रहते। वे जहां भी जाते तो बस मां काली को ही अनुभव करते। इसी मनोस्थिति में वे अचानक क्षीरभवानी की ओर चल दिए और साथ ही यह सूचना दी कि कोई भी उनके पीछे न आए। लगभग एक हफ्ते तक वे वहां रहे। वहां उन्हें जो दैवीय ज्ञान का प्रकाश मिला, उसका उनके ऊपर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। अब उनके मुख पर एक अनोखी चमक और शांति के भाव थे। इस घटना के बाद उनमें एक अनोखा परिवर्तन आ गया था। इस बारे में निवेदिता ने अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए अपनी एक महिला मित्र को पत्र लिखा, जिसमें लिखा था 

“स्वामी जी के बारे में मैं तुम्हें कुछ बताने के लिए यह पत्र लिखने बैठी हूं, लेकिन समझ में नहीं आता कि शुरुआत कैसे और कहां से करूं। दो हफ्ते पहले वे अकेले कहीं चले गए और जब 8 दिन बाद वापस आए तो एक अनोखा स्फूर्तिपूर्ण देवप्रेरित रूप लेकर। उनका व्यक्तित्व बहुत अधिक बदल गया था। वे एक नवीन स्फूर्ति तथा नवीन अनुभव लेकर आए थे। उनके परिवर्तित व्यक्तित्व की आभा को मैं तुम्हें बता नहीं सकती। मेरी कलम के लिए उसको शब्द में बांधना असंभव ही है। मेरी कलम उसका वर्णन करने में असमर्थ है। मेरी कलम को उसके लिए धीरे-धीरे प्रयत्न करना सीखना होगा। 

वे मां काली के एक मासूम-से बच्चे की तरह बातें करते थे। उनकी बातों में एक बच्चे जैसी चंचलता, अल्हड़ता तथा निर्मलता थी, लेकिन उनकी आत्मा और वाणी में एक दैवीय भाव था। उनके शब्द और आवाज से ऐसा लग रहा था, मानो हमें साक्षात् ईश्वर से वार्तालाप का आभास हो रहा हो। उनकी उपस्थिति मात्र से वातावरण में इतनी शांति, गंभीरता, पवित्रता और आनंद भर जाता है कि मेरा मन मुझे किसी एकांत निर्जन स्थान पर ले जाने के लिए लालायित हो उठा है। ऐसा लगता है कि किसी निर्जन स्थान पर जाकर इन सांसारिक बंधनों से अवकाश प्राप्त कर पूरा समय ईश्वर के भजन में, भक्ति में और उपासना में लीन कर दूं। जिसने भी ईश्वर को देखा है, उसका ढंग ऐसा ही होता है। ऐसा केवल वही अनुभव कर सकता है, जिसने ईश्वर का प्रत्यक्ष दर्शन किया हो। अभी भी उनकी आंखों में केवल ईश्वर ही है। 

इस समय अभी उन्हें कोई भी सत्कार्य हाथ में लेना भयप्रद लगता है। उन्हें तो ऐसा लगता है कि जैसे मां ही सब कुछ कर सकती है। देशभक्ति गलत है, किसी कार्य को हाथ में लेना गलत है, सब कुछ गलत है। वे जब क्षीरभवानी से घर वापस जाए तो उन्होंने कहा था, ‘सिर्फ मां ही सब कुछ है। सभी व्यक्ति भले होते हैं, लेकिन उनके अंतकरण तक हम पहुंच नहीं पाते। हम सबकी भल मनसाहत को समझ नहीं पाते। मैं अब कभी भी किसी को भी कुछ नहीं सिखाऊंगा। मैं किसी को कुछ भी सिखाने वाला कौन होता हूं।’ 

तपस्या, मौन, कठोर जीवन और कार्य-निवृत्ति आजकल यही उनके स्वभाव के मुख्य दृढ़ भाव हो गए हैं, लेकिन यह कार्य-निवृत्ति इतनी पवित्र है कि हम लोग उसे स्पर्श भी नहीं कर सकते। जो क्षण मां के सान्निध्य में नहीं गुजारा, वह क्षण व्यर्थ गया- ऐसा अब उन्हें लगने लगा है। उनकी उपस्थिति से हमें ईश्वर के दर्शन का लाभ मिल रहा हो, ऐसा प्रतीत हो रहा था। 

कल सुबह की प्रार्थना सभा के अंतिम क्षणों में जब वे मां का स्तुतिगान कर रहे थे और हमसे बातें कर रहे थे तो वे मां में इतने लीन हो गए थे कि उनकी भाव-समाधि लग गई। हम लोगों की तो मानो सांस ही रुक गई, लेकिन किसी का इतना साहस नहीं था कि उनकी भाव-समाधि को भंग कर सके। हम सब सांस रोककर उनकी बातें सुन रहे थे। अब उनमें सबके प्रति प्यार है।” 

कुछ समय बाद निवेदिता के लिए एक अलग मकान तलाश लिया गया। वह मकान था 16, बोसपाड़ा लेन नामक जगह पर। हालांकि निवेदिता अलग मकान में रहने लगी थीं, लेकिन फिर भी वे दोपहर का समय शारदा मां के 

सान्निध्य में ही बितातीं और जब गर्मी का मौसम आया तथा शारदा मां ने आदेश दिया कि वे रात के समय सोने के लिए उनके पास आ जाया करें तो वे ऐसा ही करने लगीं। 

आरंभ में तो हिंदू महिलाओं को यह बात बहुत अखरी कि एक विदेशी महिला उनके बीच कैसे रहने लगी, लेकिन धीरे-धीरे उन हिंदू महिलाओं की सोच बदल गई और वे निवेदिता के व्यवहार से बहुत प्रभावित हुईं। अब सभी हिंदू महिलाएं उनसे प्रेमपूर्वक व्यवहार करने लगीं। 

यह ऐसा अवसर था, जब निवेदिता को किसी हिंदू परिवार में रहने का अवसर मिला था। वे उन हिंदू महिलाओं के सादगी से परिपूर्ण, लेकिन जटिल जीवन प्रणाली को बड़ी निकटता से अनुभव कर रही थीं। उन्होंने शारदा मां के बारे में वर्णन करते हुए लिखा 

“इस छोटे-से पारिवारिक समुदाय में श्रेष्ठ स्थान शारदा मां का ही था। उनकी उपस्थिति मात्र ही वहां के वातावरण को पवित्र बना देती थी। उनके पुण्य प्रभाव के कारण वहां रहने वाले लोगों को स्वर्गिक सुख का अनुभव होता। 

शारदा मां यानी श्रीरामकृष्ण की कल्पना में सृजित भारतीय स्त्री का आदर्श प्रतिरूप हैं। वे मेरे लिए श्रीरामकृष्ण का प्रतिरूप ही हैं। उनके प्रत्येक शब्द भारतीय स्त्री-जगत के लिए आदर्श ही हैं। कभी-कभी मैं सोचती हूं कि क्या श्रीमां पुरानी पीढ़ी का अंतिम पड़ाव हैं या फिर नई पीढ़ी की शुरुआत? बुद्धिमत्ता तथा माधुर्य का सबसे सरल रूप यदि किसी स्त्री को प्राप्त हो सके तो वे शारदा मां ही हैं। 

 शारदा मां का उदार एवं विशाल दृष्टिकोण मेरे लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि उनके हृदय की विशालता। उनके साध्वी भाव में है उतनी पवित्रता, जितनी उनकी सादगी में है। किसी भी महत्वपूर्ण तथा उदार निर्णय को लेते हुए वे कभी भी नहीं हिचकिचातीं और उस निर्णय को सबके सामने रखने का साहस भी उनमें पूरा साफ दिखाई देता है। अत: कैसी भी समस्या हो और चाहे नई हो या कितनी ही जटिल भी हो, उनके सामने समाधान हेतु अवश्य रखी जाती है। उनका जीवन प्रार्थना की एक क्रमबद्ध श्रृंखला है।” 

निवेदिता ने कुछ समय जब मां शारदा के घर में बिताया था तो उस समय उन्हें एक नवीन अनुभव मिला था। मां शारदा का घर एक स्वच्छ और लगभग शांत-सी रहने वाली गली में था। वहां विषमता और अव्यवस्था होने के बाद भी एक विचित्र प्रकार की मोहकता थी।अत: यह व्यवस्था दुरुस्त करने में उन्हें कुछ व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन दिनों को याद करते हुए उन्होंने लिखा है 

“मेरे सामने यहां के शुरुआती जीवन में कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां आईं। सबसे पहले तो एक अंग्रेज महिला के लिए घर ढूंढना आसान नहीं था। जब घर मिल गया तो घरेलू काम-काज के लिए मेरे लिए घरेलू सेविका कैसे मिले यह प्रश्न सामने आ खड़ा हुआ। आखिर में कुछ हफ्तों के बाद एक बहुत वृद्ध महिला काम करने के मिल सकी। मैं उससे आयु में बहुत ही छोटी होने के बावजूद वह मुझे ‘मां’ कहकर संबोधित करती थी और उसे मुझे आयु में आधी होने के बावजूद ‘पुत्री’ या ‘झी’ कहकर संबोधित करना पड़ता था।

वह वृद्ध सेविका पूरे घर को झाड़कर, धो-पोछकर बड़ी कुशलता से स्वच्छ करती। साथ ही बताए गए विशेष समय पर नहाने के बाद तथा पीने के लिए पानी उबालकर रखती। फिर भी पता नहीं क्यों उसकी एक शर्त थी कि मैं कभी भी उसकी रसोई में नहीं घुसूंगी और पानी तथा अग्नि या चूल्हे को नहीं छुऊंगी। इसके बावजूद भी मुझे कभी भी मांगने पर तुरंत गरम पानी नहीं मिल पाता था, क्योंकि हमारे पास चूल्हा नहीं था। चूल्हा बनाने के लिए जो आवश्यक वस्तुएं लगती थीं, जब उनका मूल्य मैंने पूछा तो मुझे छः पैसे की भारी रकम बताई गई, जिसे जुटाना मेरे लिए ज्यादा कठिन नहीं था। पैसे मिलते ही मेरी विश्वस्त सेविका ने तुरंत बाजार जाकर कुछ ईंट, काली चिकनी मिट्टी और कुछ लोहे की सलाखें जुटाईं तथा अपने हाथों से उसे जैसा चाहिए था, वैसा चूल्हे का निर्माण बड़ी ही कुशलता से किया। 

उस चूल्हे को सूखने और काम योग्य बनाने में कुछ समय जरूर लगा, लेकिन आखिरकार यह पूरा हो गया। उस दिन से चाय मेरे कमरे में ही बनती थी। जब चाय बनती तो बड़ी ही प्रसन्न मुद्रा में मेरी वृद्धा पुत्री केतली के सामने जमीन पर बैठती और इस कौतूहल से देखती मानो कोई अनोखी चीज उस चाय के पात्र से बाहर निकलने वाली हो। जैसे ही मैंने कप-भर चाय उंडेलकर गरम पानी के लिए वह केतली ‘झी’ को पकड़ाई, वैसे ही मैं आश्चर्यचकित हो उठी, क्योंकि मुंह से कुछ विचित्र शब्द निकालते हुए वह अंदर के बरामदे में चली गई और कुछ क्षणों के बाद जब फिर से वापस आई तो सिर से पांव तक ठंडे पानी से सराबोर थी। जिस केतली की चाय मैं पीने वाली थी, उसे छू लेने के पहले उसने स्नान करना उचित समझा।” 

13 नवंबर, 1898 को 16, बोसपाड़ा लेन स्थित मकान में ही निवेदिता ने एक कन्या विद्यालय की शुरुआत की। इस विद्यालय में कन्याओं को शिक्षा के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई और दस्तकारी जैसे कार्य भी सिखाए जाते थे। 

यह वह समय था, जब कन्याओं को शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यालयों में नहीं भेजा जाता था और जो ऐसा करता भी था तो समाज में उसे इसका भारी विरोध भी सहना पड़ता था। निवेदिता ने अपनी ओर से पूरा प्रयास किया कि उनके विद्यालय में कन्याएं शिक्षा प्राप्त करें, लेकिन उनका हर प्रयास विफल रहा और अंततः यह विद्यालय बंद हो गया। 

उस दौरान कश्मीर नरेश ने स्वामी जी को मठ और विद्यालय चलाने के लिए जमीन उपहार के रूप में देने की बात की थी, लेकिन अंग्रेज सरकार ने यह संभव न होने दिया। इस घटना से निवेदिता अंग्रेजों के मन की चाल को समझ गईं और उन्हें यह बात समझते देर नहीं लगी कि अंग्रेज सरकार हर प्रकार से भारत की राह में बाधक बनकर खड़ी है। 

अपने पहले ही वर्ष में निवेदिता समझ गईं कि अर्थाभाव के कारण मिशन व आश्रम के कार्यों को सुचारू रूप से चलाने में कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। अतः उन्होंने धनी पाश्चात्य देशों में भारतीय अध्यात्म और वेदांत का प्रचार-कार्य कर उन देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त करने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंने स्वामी जी को तैयार भी कर लिया। 

विशेष योजना व उद्देश्य को लेकर निवेदिता स्वामी जी और स्वामी सूर्यानंद जी को साथ लेकर 20 जून, 1899 को लंदन के लिए रवाना हो गईं। 40 दिनों की लंबी समुद्रीयात्रा के बाद वे सभी 31 जुलाई, 1899 को लंदन पहुंचे। इस प्रकार केवल इंग्लैंड में ही नहीं, बल्कि यूरोप के अन्य देशों व अमेरिका में लगभग ढाई वर्षों तक भ्रमण और वेदांत का भाषण कर तथा आवश्यक धन संग्रहित कर वे 3 फरवरी, 1902 को भारत लौट आए। उस समय वे बड़े प्रसन्न थे। 

सब कुछ ठीक चल रहा था कि अचानक 4 जुलाई, 1902 को स्वामी जी की मृत्यु हो गई। निवेदिता को गहरा आघात लगा। स्वामी जी की मृत्यु से निवेदिता को बहुत दुख हुआ, लेकिन लंबे समय तक शोक मनाने के बजाय उन्होंने उन अधूरे कार्यों को पूरा करने की दिशा में अपने कदम बड़ी मजबूती से बढ़ा दिए, जो स्वामी जी द्वारा आरंभ किए गए थे। इन्हें उन्होंने एक चुनौती के रूप में लिया। 

सबसे पहले निवेदिता ने स्वामी जी की अमेरिकी शिष्या क्रिस्टीन ग्रीनस्टिडेल के साथ मिलकर अपना बंद हुआ स्कूल फिर से शुरू हुआ। इस बार स्कूल का कार्यक्रम बदल दिया गया और स्कूल से प्रौढ़ महिलाओं को भी जोड़ दिया गया। अब वे महिलाएं भी स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए आने लगीं, जो घर के काम-काज निपटाकर शेष समय यूं ही बिता देती थीं। इस प्रकार स्त्री-शिक्षा के काम में निवेदिता को प्रोत्साहन मिला। प्रौढ़ महिलाओं के स्कूल से जुड़ने का लाभ यह हुआ कि अब वे महिलाएं अपनी बेटियों को भी शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल में भेजने लगीं। अब निवेदिता मिशन चलाने वाली निवेदिता नहीं, बल्कि एक देशभक्त नारी के रूप पहचानी जानी लगी थीं। 

निवेदिता स्वामी जी के प्रेरक विचारों के माध्यम से भारतीयों में नवस्फूर्ति का संचार करने के कार्य में जुट गईं। वे स्वामी जी के उद्देश्यों और उपदेशों को ध्यान में रखकर पूर्ण देशभक्ति से कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध थीं। यही कारण था कि उन्होंने देश-भर में विवेकानंद समितियों का गठन कर उनके विचारों को देशवासियों के बीच लाने का अतुलनीय कार्य किया। इसकी सबसे पहली समिति उन्होंने कलकत्ता में स्थापित की और महर्षि अरविंद घोष से मुलाकात कर उनसे कलकत्ता में कार्य करने के लिए आग्रह किया। 

9 फरवरी, 1904 को बेलूर मठ में स्वामी जी का जन्मोत्सव मनाया गया, जिसमें निवेदिता ने भी भाग लिया। वहां से वे स्वामी सदानंद के साथ स्वामी जी के विचारों एवं उद्देश्यों के प्रचार-प्रसार के लिए पटना चली आईं। जब वे लोगों के बीच पहुंची तो उनका बड़ा हार्दिक अभिनंदन किया गया। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे नरम दल व गरम दल के लोगों के साथ भी मुलाकात की और उनसे एकजुट होकर कार्य करने की अपील की। चूंकि उनका झुकाव गरम दल के लोगों की ओर अधिक था इसलिए वे समय-समय पर उनकी हर संभव सहायता भी करती रहती थीं। यहां यह बताना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि स्वामी विवेकानंद के भाई भूपेंद्रनाथ दत्त एक क्रांतिकारी थे, जो भारत छोड़कर यूएसए चले गए थे। 

1906 में पूर्वी बंगाल में अकाल पड़ने के साथ-साथ बाढ़ ने भी लोगों के जीवन के लिए कठिनाइयां उत्पन्न कर दीं। स्थिति बड़ी विकट थी तो ऐसे में निवेदिता पीछे कैसे रह सकती थीं। उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर सहायतार्थ कार्य किया। 

एक अच्छी समाजसेविका होने के साथ-साथ निवेदिता एक अच्छी लेखिका भी थीं। जब वे 20 वर्ष की थीं, तभी उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लेख लिखना शुरू कर दिया था। जब से वे स्वामी जी के संपर्क में आई थीं, तब से ही वे अनेक लेख व पुस्तकें लिख भी चुकी थीं। उनकी ‘क्रेडल टेल्स ऑफ हिंदुइज्म’ नामक पुस्तक के कई संस्करण देश-विदेश में छपे थे। यह पुस्तक अत्यंत लोकप्रिय हुई थी। 

निवेदिता की विशेषताओं में से एक विशेषता यह थी कि वे अध्ययनशील महिला थीं और आदत के कारण वे एक कुशल वक्ता बन गई थीं। उन्होंने देश विदेश में अनेक प्रभावशाली एवं ओजस्वी भाषण दिए थे। अत: यदि हम यह कहें कि वे जितनी सफल लेखिका थीं, उतनी ही सफल वक्ता भी थीं, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। 

ऐसा नहीं था कि निवेदिता केवल भारत में ही लोकप्रिय थीं, बल्कि वे विदेश में भी अत्यंत लोकप्रिय थीं। उनके कार्यों ने उन्हें जहां भारतीयों के बीच प्रमुख स्थान दिलाया, वहीं विदेशों में एक उच्च पहचान। लगभग 13 वर्ष तक उन्होंने भारत की सेवा की। इस अवधि में जिस श्रद्धा, भक्ति, आस्था और प्रेम से उन्होंने भारत की सेवा की, उसे विस्मृत नहीं किया जा सकता। खराब स्वास्थ्य के चलते 14 अक्टूबर, 1911 को वे इस दुनिया से चल बसीं, लेकिन अपने कभी न भूलने वाले विचार, उद्देश्य एवं कार्य हमारे बीच छोड़ गईं। 

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