सिर पर तिलक क्यों लगाते हैं-क्या है मान्यता सर पर तिलक लगाने को लेकर और कितने प्रकार के तिलक होते है हिन्दू धर्म में 

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 क्या है मान्यता सर पर तिलक लगाने को लेकर और कितने प्रकार के तिलक होते है हिन्दू धर्म में 

हमारे हिंदू धर्म पर सिर पर तिलक लगाने की परंपरा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। घर या मंदिर पर होने वाली सभी प्रकार की पूजा और शुभ कार्य में किसी बड़े ब्राह्मण या पंडित द्वारा हमारे सिर पर तिलक लगाया जाता है। तिलक हिंदू धर्म की संस्कृति का प्रतीक है मान्यता है कि सिर पर तिलक लगाने के कारण हमें समाज में गौरव की अनुभूति कराता है। तिलक कितने प्रकार के पदार्थों और वस्तु लगाए जाते हैं । जिसमें सबसे प्रमुख सिंदूर, भस्म, केसर, हल्दी, चंदन आदि लगाए जाते हैं।लेकिन क्या हम जानते हैं सिर पर तिलक लगाने का धार्मिक और वैज्ञानिक कारण क्या होता है

माना जाता है कि मानव शरीर के अंदर ऊर्जा के साथ प्रकार के दिव्य सूक्ष्म होते हैं जिसमें ऊर्जा के अपार भंडार होते हैं। मनुष्य का मस्तिष्क अर्थात माथा जहां पर तिलक लगाया जाता है। माना जाता है कि मनुष्य के माथे पर तिलक लगता है वहां भगवान विष्णु निवास करते हैं और हमारे माथे पर आज्ञा चक्र भी होता है तथा यहीं पर तीन प्रमुख नाडियों सुषुम्ना, पिंगला व  इड़ा का संगम भी होता है।यही वह स्थान है जहां पर समस्त ऋषि और साधु योगा और ध्यान लगाते समय इनका प्रयोग करते हैं।

माना जाता है कि हमारे सिर का मस्तक संपूर्ण शरीर का संचालन होता है और यह पूजनीय स्थान भी कहलाता है इसी कारण से हम लोग इस जगह पर तिलक लगाया करते हैं। पुराणों में वर्णित पुस्तक के अनुसार जो व्यक्ति स्नान करने के बाद अपने मस्ती के सिर पर तिलक लगाता है उसे अपने जीवन में में मोक्ष की प्राप्ति होती है। हमारे वैज्ञानिक भी इस विषय में मानते हैं कि किसी पर तिलक लगाने के कारण हमारा मस्तिक तनाव मुक्त और तिलक शीतलता प्रदान करती है।

माना जाता है कि हिंदू धर्म में तिलक लगाने के अलग-अलग अनेक प्रकार है, भारत में हर प्रकार के साधु, संत, संप्रदाय तथा पंथ वे लोग अपनी प्रथा के अनुकूल तिलक लगाते हैं। प्राचीन समय अर्थात सनातन धर्म वैष्णव,शाक्त,शैव और अलग-अलग धार्मिक लोगों के अनेक प्रकार के तिलक लगाने का प्रचलन है। वैष्णव परंपरा में अधिकतर 64 प्रकार के तिलक का प्रयोग लोगों द्वारा किया जाता है लेकिन उसमें सबसे प्रमुख है लाल श्री तिलक। उसी प्रकार शाक्त परंपरा के अनुसार तिलक के रूप में सिंदूर का प्रयोग किया जाता है,शैव मत के लोग अपने लालाट अर्थात माथे पर त्रिपुंड तिलक का उपयोग करते हैं जो चंदन से घिस के लगाया जाता है। 

इस परंपरा के अनुसार मनुष्य के ललाट पर आसपास के चंदन लगाया जाता है उनके मध्य भाग में हल्दी की एक सीधी रेखा खींच दी जाती है। विष्णु स्वामी तिलक के अनुसार हमारे माथे सिर पर दो रेखाओं को खींचकर बनाया जाता है तथा तथा उसे आगे की तरफ खींचते हुए भोहों तक लाया जाता है। तिलक लगाने की परंपरा है बड़े-बड़े साधुओं के बीच काफी प्रचलित है। इसी प्रकार यदि विष्णु तिलक के मार्ग कुंकुम से एक सीधी रेखा खींच दी जाए तो वह तिलक,रामानंद तिलक कही जाती है।इसी प्रकार प्राचीन हिंदू सनातन धर्म में गणपति, कापालिक, तांत्रिक आदि विभिन्न प्रकार के तिलक लगाने की परंपरा प्रचलित है।

प्राचीन तंत्र शास्त्र के अनुसार हमारे माथे पर तिलक इसलिए लगाया जाता है ताकि ताकि ईश्वर की स्मृति और कृपा हमारे ऊपर सदैव बनी रहे, ध्यान लगाते समय हमारे ललाट अर्थात माथे पर जहां तिलक लगा हुआ है वह स्थान केंद्र शक्ति के रूप में दिखाई दे।शास्त्रों के अनुकूल माना जाता है कि मनुष्य को अपनी अनामिका उंगली के द्वारा माथे पर तिलक लगाना चाहिए जो चंदन का होना चाहिए। चंदन का तिलक लगाते समय चावल का भी प्रयोग करना चाहिए माना जाता है कि इससे मां लक्ष्मी की कृपा व्यक्ति पर बनी रहती है। पूजा करते समय देवताओं पर तिलक मध्यमा उंगली से लगाया जाना चाहिए। चंदन के साथ गाय के खुर की मट्टी, पीपल और तुलसी के मट्टी तिलक में प्रयोग करना चाहिए पुराना में यह सबसे पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है।

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