Shri Krishna mahabharat story in hindi-भगवान कृष्ण और महाभारत

Shri Krishna mahabharat story in hind

 Shri Krishna mahabharat story in hindi-भगवान कृष्ण बने संदेशवाहक

पांडवों ने वनवास के बारह वर्ष जंगल में बिताए। तेरहवां वर्ष उन्हें अज्ञातवास में बिताना था, ताकि कोई भी व्यक्ति उन्हें पहचान न सके। अतः पांडव राजा विराट के राज्य में चले गए। जब उनके तेरहवें वर्ष का अज्ञातवास समाप्त हो गया, तो भगवान कृष्ण राजा विराट के दरबार में उपस्थित हुए। उन्होंने पांडवों का वास्तविक परिचय राजा विराट को दिया। भगवान कृष्ण ने कहा, “अब वनवास समाप्त हो चुका है। मुझे पांडवों को उनका राज्य वापस दिलाने में सहायता करनी है।” 

भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम दुर्योधन के साथ थे, क्योंकि वे दुर्योधन के गुरु थे। लेकिन भगवान कृष्ण ने बलराम को शांतिदूत बनाकर दुर्योधन के पास भेजा और यह संदेश देने के लिए कहा, “प्रिय मित्र! पांडवों का वनवास काल समाप्त हो गया है। अब उन्हें उनका राज्य वापस दे दो।” दुर्योधन ने क्रूरतापूर्वक उत्तर भिजवाया, “मैं उन्हें कुछ भी नहीं दूंगा।” इसके बाद धृतराष्ट्र ने अपने मंत्री संजय को दूत बनाकर पांडवों के पास भेजा और कहा, “हम तुम्हारी धमकियों से डरने वाले नहीं हैं। अब केवल युद्ध ही एकमात्र उपाय है।” इसके बाद युधिष्ठिर की ओर से एक अन्य दूत वहां भेजने की योजना बनाई गई। पांडवों ने भगवान कृष्ण से दूत बनकर वहां जाने को कहा। 

भगवान कृष्ण पांडवों के दूत बनकर कौरवों के दरबार में पहुंचे, लेकिन उन्होंने उनके महल में रहना स्वीकार नहीं किया। वे कौरवों के दरबार के एक दरबारी विदुर के घर जाकर ठहरे। केवल विदुर ही एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे, जो युद्ध नहीं चाहते थे तथा दोनों ओर का पक्ष लेते थे। वे स्वयं चाहते थे कि भगवान कृष्ण उनके ही घर आकर ठहरें, क्योंकि वे उनसे बहुत प्रेम करते थे। भगवान कृष्ण उनके घर जाकर बहुत खुश हुए। विदुर ने उन्हें खाने के लिए केले दिए। 

विदुर भगवान कृष्ण की सेवा-सत्कार करते समय यह भूल गए कि वे क्या कर रहे हैं। विदुर केला छीलकर उसका छिलका तो भगवान कृष्ण को देते गए और अंदर का फल फेंकते गए। भगवान कृष्ण कुछ नहीं बोले और मुस्कराते हुए केले के छिलके खाने शुरू कर दिए। लेकिन कुछ समय पश्चात जब विदुर को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो वे रोने लगे। उन्होंने फिर से केले खाने को कहा। भगवान कृष्ण बोले, “केले के फल की अपेक्षा मुझे उनके छिलके खाने में अधिक आनंद आया। क्योंकि उनमें तुम्हारा प्रेम छिपा हुआ था।” यह सुनकर विदुर शांत हो गए। 

Shri Krishna mahabharat story in hindi-भगवान कृष्ण और महाभारत

जब दुर्योधन को यह पता चला कि भगवान कृष्ण कौरवों के महल में रहने की अपेक्षा उनके दरबारी विदुर के घर ठहरे हैं, तो वह परेशान हो गया। भगवान कृष्ण ने दुर्योधन से पांडवों का राज्य वापस देने को कहा। इस पर दुर्योधन बोला कि पांडवों को दोबारा बारह वर्ष के वनवास पर चले जाना चाहिए। भगवान कृष्ण बोले, “ठीक है, तुम उन्हें केवल पांच गांव ही देने के लिए राजी हो जाओ, क्योंकि पांचों भाई शांति चाहते हैं।” लेकिन दुर्योधन को यह भी मंजूर नहीं था। उसने गुस्से में आकर भगवान कृष्ण को बंदी बनाने का आदेश दे दिया। 

भगवान कृष्ण ने कहा, “देखो धृतराष्ट्र, मैं दुर्योधन की इस गलती के लिए इसे अभी मौत के घाट उतार सकता हूं। लेकिन मैं ऐसा नहीं करूंगा। ऐसा करने से भीम द्वारा की गई प्रतिज्ञा पूरी नहीं हो पाएगी।” भगवान कृष्ण जानते थे कि दुर्योधन अपने मामा शकुनि की मदद से उन्हें बंदी बना सकता है, इसलिए वे शांतिपूर्वक कौरवों को समझाना चाहते थे। धृतराष्ट्र और कर्ण ने दुर्योधन को सलाह दी कि इस प्रकार किसी भी दूत को बंदी नहीं बनाया जा सकता। ऐसा करना नीति के खिलाफ होता है। लेकिन दुर्योधन ने उनकी एक न सुनी। उसने अपने भाई दुशासन की मदद से भगवान कृष्ण को जंजीरों से बांध दिया। लेकिन थोड़ी ही देर बाद उसे पता चला कि भगवान कृष्ण वहां से गायब हो चुके थे और जंजीरों में बंधा व्यक्ति उसका भाई दुशासन था। 

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अब भगवान कृष्ण अपने विराट रूप में दरबार में प्रकट हुए। समस्त दरबारी उनका यह रूप देखकर हैरान रह गए। आज उन्हें पता चल गया था कि भगवान कृष्ण साधारण मनुष्य नहीं, वास्तव में ब्रह्माण्ड के सृष्टिकर्ता हैं। फिर देखते ही देखते भगवान कृष्ण वहां से अंतर्धान हो गए। 

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भगवान कृष्ण जानते थे कि कौरवों पर शांति के प्रस्ताव या संधिवार्ता का कोई असर नहीं होने वाला है। फिर भी वे युधिष्ठिर के कहने पर वहां गए थे। लेकिन शांतिदूत बनकर भी भगवान कृष्ण ने एक चाल चल दी थी। यदि कौरव उनकी बात नहीं मानते, तो इसका सारा दोष दुर्योधन के सिर आना था और ऐसा ही हुआ। यदि कौरव पांडवों को उनका राज्य दे देते, तो इसका श्रेय भगवान कृष्ण को मिलना था। पांडवों को उनका राज्य न मिलने पर अब युद्ध की संभावना बलवती हो गई थी।

जब भगवान कृष्ण शांतिदूत बनकर हस्तिनापुर गए थे, तो उन्होंने वहां कर्ण से भी भेंट की थी। श्रीकृष्ण ने कर्ण को उसकी मां कुंती के बारे में बता दिया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने कर्ण से अपने भाइयों की मदद करने को कहा। वे कर्ण के जन्म की कहानी जानते थे। लेकिन कर्ण ने पांडवों की कोई भी मदद करने से मना कर दिया। 

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तत्पश्चात भगवान कृष्ण भीष्म पितामह की ओर बढ़े। वे भी कर्ण के जन्म की कहानी जानते थे। भीष्म पितामह भी नहीं चाहते थे कि कर्ण अपने भाइयों के विरुद्ध लड़े। अतः उन्होंने कर्ण का अपमान कर दिया। ऐसे में कर्ण ने कसम खाई कि जब तक भीष्म पितामह की मृत्यु नहीं हो जाती, तब तक वह युद्ध नहीं लड़ेगा। कर्ण के इस निर्णय से कौरवों को बड़ा दुख हुआ, लेकिन वह अपने निर्णय पर अटल रहा। 

भगवान कृष्ण के पास लड़ने के लिए नारायणी सेना थी। उन्हें अपनी सेना पर बहुत भरोसा था। उन्होंने सोचा, ‘यदि इस युद्ध में बलराम कौरवों की ओर से लड़ते हैं, तो पांडवों की हार निश्चित है।’ इसलिए श्रीकृष्ण ने बलराम से कहा, “इस युद्ध में बहुत कुछ ऐसा होने वाला है, जो नीति के विरुद्ध है। इसमें किसी भी नियम और कानून का पालन नहीं होगा। इसलिए आप जैसे व्यक्ति को नीति के विरुद्ध नहीं लड़ना चाहिए। आपको किसी तीर्थयात्रा पर तत्काल चले जाना चाहिए।” 

इस प्रकार बलराम युद्ध से बाहर हो गए। कौरवों की ओर से दुर्योधन तथा पांडवों की ओर से अर्जुन भगवान कृष्ण की मदद लेने के लिए द्वारका नगरी गए। जब दुर्योधन श्रीकृष्ण के कमरे में गया, तो वे सो रहे थे। अतः दुर्योधन उनके सिर के नजदीक बैठ गया और उनके उठने का इंतजार करने लगा। लेकिन जब भगवान कृष्ण सोकर उठे, तो उन्होंने अर्जुन को पहले देखा, जो बाद में आकर उनके कदमों में बैठ गया था। उन्होंने उन दोनों की बातें सुनीं-वे महाभारत युद्ध के लिए उनसे मदद मांग रहे थे। 

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अर्जुन और दुर्योधन की बातें सुनकर भगवान कृष्ण बोले, “आप लोग जानते हैं कि मैं इस युद्ध में नहीं लगा। लेकिन मेरे पास नारायणी सेना है। वह आप लोगों के काम आ सकती है। अब तुम दोनों को मुझे और मेरी नारायणी सेना में से किसी एक को चुनना होगा।” 

दुर्योधन ने तत्काल भगवान कृष्ण की नारायणी सेना को चुन लिया और अर्जुन ने श्रीकृष्ण से अपने साथ रहने के लिए कहा। जब दुर्योधन वहां से चला गया, तो भगवान कृष्ण ने अर्जुन को डांटते हुए कहा, “अर्जुन! तुम एकदम मूर्ख हो। देखा, दुर्योधन कितनी चतुराई से मेरी नारायणी सेना ले गया और तुम मुझे अपने साथ रहने के लिए कह रहे हो? मैं इस युद्ध में कुछ नहीं करूंगा-सिवाय खाली बैठे रहने के। मैं किसी काम का नहीं हूं।” अर्जुन ने उत्तर दिया, “भगवान, आप मेरे लिए सब कुछ हैं।” । 

भगवान कृष्ण ने अपनी नारायणी सेना दुर्योधन को दे दी। फिर उन्होंने यह निर्णय लिया कि वे पांडवों की ओर से लड़ेंगे। लेकिन उन्होंने यह बात बहुत धीरे से कही। वे बोले, “मैं इस युद्ध में तुम्हारा सारथी बनकर रहूंगा, लेकिन युद्ध के लिए अस्त्र नहीं उठाऊंगा।” एक बार फिर दुर्योधन ने श्रीकृष्ण की नारायणी सेना लेकर गलती कर दी। वह भगवान कृष्ण तथा उनकी गूढ नीतियों से भली-भांति परिचित नहीं था। 

Krishna story in hindi mahabharat-भगवान कृष्ण और महाभारत

फिर महाभारत युद्ध के दौरान कई बार ऐसे अवसर आए, जब भगवान कृष्ण की सलाह और नीतियों ने पांडवों को अपनी रणनीति बनाने में काफी मदद की। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने के लिए तैयार किया। उन्होंने अपनी ओर से हर संभव प्रयास किया कि इस धर्म युद्ध में धर्म की ही जीत हो, अधर्म की नहीं। 

महाभारत  युद्ध का आरंभ

भगवान कृष्ण को कुरुक्षेत्र में लड़े गए महाभारत युद्ध का एक महत्वपूर्ण नीति-निर्देशक माना जाता है। उन्हीं के द्वारा भीष्म के दिमाग में यह बात डाली गई थी कि वे कर्ण का अपमान करें, ताकि वह तब तक इस युद्ध में भाग न ले सके, जब तक कि भीष्म पितामह की मृत्यु न हो जाए। इस प्रकार भगवान कृष्ण को यह तसल्ली हो गई कि पहले कुछ दिनों तक पांडवों को कर्ण जैसे महारथी से कोई खतरा नहीं है। 

महाभारत  युद्ध का आरंभ

महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह को कौरवों की ओर से सेनापति बनाया गया। दुर्योधन भीष्म पितामह की इस प्रतिज्ञा से बहुत क्रोधित था कि वे अपने हाथों किसी भी पांडव का वध नहीं करेंगे। 

दुर्योधन अपने प्रिय मित्र कर्ण को इस युद्ध में अपनी सेना का सेनापति बनाना चाहता था, अतः वह एक प्रस्ताव लेकर भीष्म पितामह के पास गया और चिल्लाते हुए बोला, “पांचों भाई अभी तक जीवित हैं, जबकि आप सेनापति हैं। आप उनके साथ अपनापन का रवैया अपना रहे हैं।” दुर्योधन की बात सुनकर भीष्म पितामह को बहुत धक्का लगा। वे प्रतिज्ञा करते हुए बोले, “कल शाम तक कोई भी पांडव जीवित नहीं बचेगा। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो मैं अपना पद छोड़कर चला जाऊंगा।” इस प्रकार भीष्म पितामह और पांडवों से पीछा छुड़ाने की दुर्योधन की योजना सफल हुई। 

भीष्म द्वारा द्रौपदी को वरदान

दुर्योधन ने ऐसी योजना बनाई थी, जिससे उसकी जीत निश्चित थी। इसके लिए उसे अपने प्रिय मित्र कर्ण की आवश्यकता नहीं थी कि वह कौरवों का सेनापति बनकर उनका मार्गदर्शन करे। भगवान कृष्ण के अलावा कोई भी व्यक्ति भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा के बारे में नहीं जानता था। उन्होंने एक सोची-समझी युक्ति के अनुसार द्रौपदी को सब कुछ बता दिया और उसे उसी तरह कार्य करने का निर्देश दिया। 

भगवान कृष्ण एक नौकर का रूप धारण करके द्रौपदी के साथ भीष्म पितामह के पास गए। उन्होंने द्रौपदी को बता दिया था कि उसे वहां जाकर कब और क्या कहना है। द्रौपदी भीष्म पितामह के तंबू के अंदर चली गई और वे स्वयं बाहर रुक गए। द्रौपदी ने अंदर जाकर भीष्म पितामह के पैर छुए। भीष्म पितामह ध्यान लगाए बैठे थे। द्रौपदी ने उनसे आशीर्वाद देने को कहा। द्रौपदी को देखे बिना भीष्म बोल उठे, “सौभाग्यवती रहो।” 

भीष्म द्वारा द्रौपदी को वरदान

लेकिन जब भीष्म पितामह ने अपनी आंखें खोलकर द्रौपदी को देखा, तो वे हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, “तुम इतनी रात को यहां – क्या कर रही हो?” द्रौपदी बोली, “मैं यहां अपने नौकर के साथ आई हूं।” भीष्म पितामह ने तत्काल अंदाजा लगा लिया कि वह नौकर नहीं, बल्कि भगवान कृष्ण हैं, जो यह सब करा रहे हैं। 

भीष्म पितामह भगवान कृष्ण से मिलने के लिए फौरन अपने तंबू से बाहर आ गए। उन्होंने पहरेदार से नौकर के बारे में पूछा। पहरेदार ने गर्व से कहा, “मैंने उसे ठोकर मारकर भगा दिया। अब वह दोबारा यहां नहीं आएगा।” 

भीष्म पितामह ने कहा, “अरे मूर्ख! तुम्हें नहीं पता कि तुमने किसे मारा है!” भीष्म पितामह आगे गए और नौकर रूपी भगवान कृष्ण के चरण छू लिए। यह देखकर पहरेदार हैरान हो गया। भीष्म पितामह बोले, “भगवान, आपने ऐसा क्यों किया?” श्रीकृष्ण ने कहा, “आपकी इस प्रतिज्ञा के कारण कि कल शाम तक कोई भी पांडव जीवित नहीं बचेगा। आपकी इस प्रतिज्ञा ने ही मुझे ऐसा करने पर मजबूर किया है। पांडवों को महाप्रतापी योद्धा भीष्म पितामह से बचाने का एकमात्र यही उपाय था।” । 

यह सुनकर भीष्म पितामह हैरान रह गए। उन्होंने अपने मन में सोचा, ‘भगवान कृष्ण ने कितनी बुद्धिमत्ता का काम किया है। उन्होंने पांडवों को आने वाले सबसे बड़े खतरे से बचा लिया है।’ 

भीष्म द्वारा द्रौपदी को वरदान

भीष्म पितामह की ताकत जानने वाले भगवान कृष्ण ने उनकी प्रतिज्ञा तोड़ने के लिए ही ऐसी युक्ति निकाली थी। 

द्रौपदी को भीष्म पितामह के मुख से सौभाग्यवती रहने का आशीर्वाद मिल गया था। १ इस तरह अब कोई भी व्यक्ति पांडवों का बाल तक बांका नहीं कर सकता था। भगवान कृष्ण ने अपनी युक्ति से भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा का तोड़ निकाल लिया था। 

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