श्री कृष्ण कथा इन हिंदी-भद्रा और लक्ष्मणा

श्री कृष्ण कथा इन हिंदी

श्री कृष्ण कथा इन हिंदी-भद्रा और लक्ष्मणा

वासुदेव की बहन श्रुतकीर्ति की एक बेटी थी। उसका नाम था-भद्रा। वह अपनी सुंदरता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी। भद्रा कैकेय देश की राजकुमारी थी। उसके पिता जानते थे कि वह भगवान कृष्ण को चाहती है। उन्होंने श्रीकृष्ण के पास यह संदेश भेजा। श्रीकृष्ण मान गए और भद्रा के साथ उनका विवाह हो गया। लक्ष्मणा राजा मद्र की पुत्री थी। राजा मद्र ने लक्ष्मणा के विवाह के लिए एक स्वयंवर का आयोजन किया, जिसमें धनुष और बाण द्वारा एक निश्चित स्थान पर निशाना लगाना था। 

सभी राजा और राजकुमार निशाना लगाने में असफल रहे। दुर्योधन तथा अन्य लोगों का भी निशाना चूक गया। अर्जुन ने जान-बूझकर गलत निशाना लगाया, क्योंकि वह भगवान कृष्ण का आदर करता था। श्रीकृष्ण ने निशाना लगाया और लक्ष्मणा से विवाह कर लिया। एक दिन नारद मुनि ने सोचा कि भगवान कृष्ण अपनी सारी पत्नियों के साथ एक ही समय में कैसे हो सकते हैं। यह जानने के लिए नारद मुनि सभी महलों में गए। उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि भगवान कृष्ण हर महल में मौजूद थे और वहां की गतिविधियों में हिस्सा ले रहे थे। नारद मुनि चाहते थे कि भगवान कृष्ण की रानियों के बीच किसी तरह फूट डालीए। उनसे कहा जाए कि उनके पति उनके साथ समय नहीं बिताते। वे अन्य रानियों के साथ अधिक समय तक रहते हैं, लेकिन उनकी यह चाल सफल नहीं हो सकी। ऐसे में वे बड़े दुखी हुए। 

कृष्ण कथा-पारिजात वृक्ष

समुद्र मंथन के दौरान देवताओं को पारिजात वृक्ष मिला, जिसकी सुगंध दिव्य थी। वह पेड़ देवताओं के राजा इंद्र के बाग में लगाया गया। एक दिन नारद मुनि ने पारिजात वृक्ष के कुछ पुष्प रुक्मिणी को भेंट किए। रुक्मिणी बहुत प्रसन्न हुईं। लेकिन जब उस पुष्प की सुगंध सत्यभामा के महल में पहुंची, तो उन्हें बहुत जलन होने लगी। वे अपनी जिद पर अड़ गईं कि श्रीकृष्ण उनके बाग में भी पारिजात वृक्ष लगाएं।

 

श्री कृष्ण कथा इन हिंदी

भगवान कृष्ण पारिजात वृक्ष लाने के लिए स्वर्ग गए। जब इंद्रदेव ने विरोध किया, तो उनके बीच संघर्ष छिड़ गया। इंद्र को हराने के बाद श्रीकृष्ण पारिजात वृक्ष धरती पर ले आए। अब रुक्मिणी और सत्यभामा के बीच लड़ाई होने लगी कि उसे किसके बाग में लगाया जाए। 

लेकिन भगवान कृष्ण भी कम चतुर नहीं थे। उन्होंने वृक्ष को इस तरह सत्यभामा के आंगन में लगाया, ताकि वृक्ष के फूल रुक्मिणी के आंगन में गिरें। इस तरह उनकी दोनों रानियां प्रसन्न हो गईं। 

सत्यभामा को यह घमंड हुआ कि भगवान कृष्ण ने स्वर्ग से लाया हुआ पेड़ उनके आंगन में लगाया है और रुक्मिणी को इस बात की खुशी हुई कि उस दिव्य वृक्ष के फूल अपने-आप ही उनके आंगन में गिरते हैं। 

कृष्ण कथा इन हिंदी-नारद की चंचलता

सत्यभामा को अपनी सुंदरता पर बहुत अभिमान था। वे सोचती थीं कि वही भगवान कृष्ण को सबसे अधिक चाहती हैं। लेकिन रुक्मिणी भी बहुत सुंदर थीं, इसलिए सत्यभामा उनसे जलती थीं। 

कृष्ण कथा इन हिंदी-नारद की चंचलता

एक दिन नारद मुनि ने सत्यभामा से पूछा, “क्या यह सच है कि भगवान कृष्ण रुक्मिणी को आपसे अधिक चाहते हैं?” नारद मुनि को इस तरह लोगों के बीच फूट डालने में बड़ा आनंद आता था। नारद मुनि की बात सुनकर सत्यभामा आश्चर्य चकित रह गईं। उन्होंने नारद से कहा, “मुझे ऐसा क्या करना चाहिए कि मेरे पति का पूरा ध्यान मेरी ही ओर रहे।”

 

नारद बोले, “मेरे पास एक ऐसी योजना है, जिसे अपनाकर आप अपने पति को अपने साथ रख सकती हैं।” सत्यभामा ने कहा कि कृपया मुझे वह योजना बताएं। वे जल्दी से जल्दी उस योजना पर काम करना चाहती थीं। 

नारद मुनि ने सलाह दी, “तुम यह संकल्प लो कि भगवान कृष्ण को मेरे हाथों दान कर दोगी। जब तुम उनके बदले में उतना ही धन दोगी, तो मैं भगवान कृष्ण को तुम्हें वापस कर दूंगा। इस तरह भगवान कृष्ण तुम्हारे 

त्याग से बहुत प्रसन्न होंगे। उनका और तुम्हारा साथ सदैव बना रहेगा।” नारद मुनि की बात सुनकर सत्यभामा श्रीकृष्ण के पास गईं और उनसे कहा कि वे उन्हें नारद मुनि को दान करना चाहती हैं। भगवान कृष्ण बड़े धीरज से सब कुछ सुनते रहे और हामी भरते रहे। 

तत्पश्चात सत्यभामा ने आदेश दिया कि उनके सारे आभूषण और धन महल के बाग में लाए जाएं। शीघ्र ही भगवान कृष्ण की अन्य रानियां भी वहां आ गईं। सत्यभामा ने सबके सामने भगवान कृष्ण का दान किया। फिर नारद मुनि ने कहा, “यदि तुम अपने पति को वापस पाना चाहती हो, तो इनके वजन के बराबर धन और आभूषण का दान करो।” सत्यभामा मान गईं। उन्होंने बाग में बड़ी तुला मंगवा ली। 

फिर तुला के एक ओर भगवान कृष्ण को बिठाया गया और दूसरी ओर वे अपने रत्नों तथा आभूषणों का ढेर लगाने लगीं। लेकिन यह क्या!! भगवान कृष्ण का पलड़ा तो टस से मस ही नहीं हो रहा था। सत्यभामा का सारा घमंड टूट गया। उन्होंने दूसरी रानियों से भी गहने रखने का आग्रह किया। 

कृष्ण कथा इन हिंदी-नारद की चंचलता

धीरे-धीरे द्वारका का सारा सोना तुल गया, लेकिन भगवान कृष्ण के बराबर नहीं हो रहा था। सत्यभामा किसी भी । हाल में अपने पति को वापस पाना चाहती थीं। 

 

लेकिन भगवान कृष्ण को वापस पाने का एक ही उपाय था कि किसी भी तरह उनके भार के बराबर धन और आभूषण जमा किए जाएं। वे अपने सारे आभूषण और धन तुला पर रख चुकी थीं। 

ऐसी स्थिति में सत्यभामा दौड़ती हुई रुक्मिणी के कक्ष में गईं और उनसे सहायता करने को कहा। रुक्मिणी ने तुलसी का एक पत्ता तोड़ा और भगवान कृष्ण की प्रार्थना करते हुए उसे धन एवं आभूषण वाले पलड़े पर रख दिया। ऐसे में वह पलड़ा तुरंत नीचे हो गया। 

भगवान कृष्ण के कहने पर सत्यभामा ने अपने सारे गहने और धन पलड़े से उतार लिए, फिर भी तुलसी के पत्ते का भार सबसे ज्यादा था। भगवान कृष्ण बोले, “तुमने अपने सारे गहने और धन मेरे नाम कर दिया, लेकिन उसमें समर्पण और श्रद्धा नहीं थी। रुक्मिणी ने तुलसी का केवल एक पत्ता मुझे अर्पित करते हुए चढ़ाया और मैं उससे ही तुल गया।” 

यह सुनकर सत्यभामा की आंखें खुल गईं। उन्होंने नारद मुनि से कहा, “मैं आपको धन्यवाद देना चाहती हूं। आपके कारण ही मैं यह सबक पा सकी। प्रभु के प्रति प्रेम और श्रद्धा ही सबसे बड़े हैं।” यह सब देखकर नारद मुनि रुक्मिणी की प्रशंसा किए बिना न रह सके। 

कृष्ण कथा इन हिंदी-नारद की चंचलता

सत्यभामा का सिर शर्म से झुक गया था। उन्होंने अपने पति भगवान कृष्ण से क्षमा मांगी और बोली, “स्वामी! मैं नहीं जानती थी कि आपका हृदय जीतने के लिए धन या आभूषण नहीं, बल्कि सच्चे प्यार और श्रद्धा की जरूरत होगी। मेरी प्रिय बहन रुक्मिणी ने मेरी आंखें खोल दीं। मैं आप दोनों को सादर प्रणाम करती हूं।” 

रुक्मिणी ने हंसकर सत्यभामा को अपने गले से लगा लिया और भगवान कृष्ण बांसुरी बजाने लगे। इस दौरान नारद मुनि ‘नारायण-नारायण’ का जप करते हुए देवलोक की ओर प्रस्थान कर गए। 

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