Shiva Story in Hindi-अर्धनारीश्वर और दक्षिणमूर्ति 

Shiva Story in Hindi

Shiva Story in Hindi-अर्धनारीश्वर और दक्षिणमूर्ति 

भंगी ऋषि शिव के अनन्य भक्त थे। उनका यह अनन्य विश्वास था कि यदि प्रभु का आशीर्वाद और पूजा का सम्पूर्ण फल प्राप्त करना है तो पार्वती को छोड़कर केवल प्रभु शिव की ही पूरे मन और शक्ति से पूजा अर्चना करनी चाहिए। पर अन्य ऋषि मुनियों तथा देवों का ऐसा विचार नहीं था। वे प्रभु शिव और उनकी शक्ति पर्वती दोनों की अर्चना में विश्वास करते थे। इस बात से रुष्ट श्रृंगी ऋषि ने उन सभी को बुलाकर कहा, “हे देवों तथा ऋषियों! आप सभी जानते हैं कि मैं शिव भगवान का अनन्य भक्त हूँ। उनके आशीर्वाद से मुझे अलौकिक शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। आप भी जब ध्यानमग्न हों तो मात्र उन्हीं पर ध्यान केन्द्रित करें। उनकी बामांगी शक्ति पर ध्यान लगाने से फल आधा हो जाता है। मेरे मत में, आप अपनी शक्ति को केन्द्रित कर मात्र शिव भगवान पर ही ध्यान लगाया करें।” 

उनके इस उपदेश को पार्वती माता ने भी बड़े ध्यान से सुना। शिव पार्वती बिना अधूरे हैं… ऋषि को यह बताना उन्होंने आवश्यक समझा। यह विचारकर उन्होंने साधनारत ऋषि की शक्ति हर ली। इस बात से अनभिज्ञ ऋषि, समय के साथ स्वयं को दुर्बल अनुभव करने लगे। एक समय ऐसा आया कि उनका शरीर हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया और वे चलने से भी लाचार हो गए। निर्भय ऋषि ने शिव की और कठोर तपस्या प्रारम्भ कर दी। तपस्या से प्रसन्न शिव ने प्रकट होकर कहा, “हे ऋषिवर! इतनी दुर्बल अवस्था में भी ऐसी कठिन तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न 

शिव भगवान ने एक छड़ी ऋषि को प्रदान करते हुए कहा, “इस छड़ी को स्वीकारें। एक पैर की भांति यह चलने में आपकी सहायता करेगी।” 

भंगी ऋषि शिव का आशीर्वाद पाकर कृत कृत्य हो गए। शिव में उनकी भक्ति और भी गहरा उठी। शिव पर नारी शक्ति के प्रभाव को समझाने का भगवती पार्वती का प्रयत्न असफल रहा था। उन्होंने शिव भगवान से जाकर प्रार्थना करी, “हे प्रभु! आपके प्रति ऋषि की अनन्य भक्ति से मैं प्रभावित हूँ। मैंने उन्हें दुर्बल बनाकर उनकी शक्ति छीन ली थी। उन्हें यह समझाने के लिए शक्तिहीन किया कि आप मेरे बिना अधूरे हैं… फिर भी ऋषि नहीं डिगे।” 

शांतिपूर्वक सुनकर शिव भगवान ने कहा, “और वह मैं नहीं देख सका… इसीलिए मैंने उन्हें छड़ी दी…” 

भगवती पार्वती ने कहा, “मेरे प्रभु! आप उन्हें स्पष्टतया यह क्यों नहीं बता देते हैं कि मैं भी आपका एक भाग हूँ?” 

आश्चर्यचकित होते हुए शिव ने पूछा, “कैसे?” 

भगवती पार्वती ने व्याख्या करी, “आप एक ऐसा रूप धरें जिसमें मैं भी आपका एक अविभाज्य भाग होऊँ जिससे भंगी ऋषि के साथ-साथ अन्य भक्तों को भी यह बात समझ में आ जाएगी।” 

इस प्रकार शिव भगवान ने प्रसन्नतापूर्वक अर्धनारीश्वर का रूप धरा जिसमें आधे में शिव भगवान थे और आधे में भगवती पार्वती। 

सृष्टि के प्रारम्भ के समय की एक और प्रचलित कथा है… सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम कुछ विशिष्ट आत्माओं को धरती पर रचा। उन्हें आने वाली पीढ़ियों का जनक बनाया और उनके पालन का भार सौंपते हुए निर्देश दिया, “हे विशिष्ट प्राणियों! सृष्टि में सर्वप्रथम आपका आगमन होने के कारण आने वाली पीढ़ियों के पालन का उत्तरदायित्व अब आपका ही है। अब से आप ही अन्य प्रजापतियों के जनक होंगे।” 

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विशिष्ट प्राणियों ने ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार अपना उत्तरदायित्व निभाना प्रारम्भ कर दिया। कुछ समय पश्चात् ही उन्हें अपने लालन-पालन में कुछ कमी सी लगने लगी। पुनः ब्रह्मा जी के पास जाकर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए 

उन्होंने कहा, “हे ब्रह्मदेव! हम लोग अपने बच्चों के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह पूरी निष्ठा से कर रहे हैं पर हमें ऐसा लगता है कि ऐसी कुछ तो कमी है जिसे हम व्यक्त नहीं कर पा रहे हैं। कृपया आप हमारी सहायता करें, हमारा मार्गदर्शन करें।” 

ब्रह्मा जी विचारमग्न हो गए। अंततः उन्हें कारण समझ में आ गया। शिव भगवान के पास जाकर उन्होंने कहा, “हे प्रभु! आप ही इस सृष्टि में सर्वशक्तिमान हैं। आप ही में नारी शक्ति समाहित है या वह आप ही का अंश है। इसका स्पष्टीकरण देते हुए आप कृपया सभी प्राणियों को आशीर्वाद दें।” 

ब्रह्मा जी की बातों से सहमत होकर शिव भगवान ने अर्धनारी श्वर का रूप धरा और सभी विशिष्ट प्राणियों को आशीर्वाद दिया। उन सभी की समझ में यह आ गया था कि शरीर का निर्माण नर और नारी शक्ति के मेल से ही संभव है। ऐसा होने पर ही वह परिपूर्ण होता है। 

एक अन्य कथा दक्षिणमूर्ति की कुछ इस प्रकार है… सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्र हुए- सनक, सनंदन, सनातन और सनत कुमार। वे ब्रह्मा के पुत्र तो थे पर ऋषि थे। वे आत्मज्ञान की खोज में लगे रहे तथा अपने जीवन के निमित्त को जानना चाहते थे। उसे जानने में असफल होने पर वे चारों शिव भगवान की शरण में गए। उन्होंने शिव भगवान से प्रार्थना करी, “हे महेश्वर! हमारे जीवन से अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर हमें मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताएँ। कृपया हमारी सहायता करें।” 

उन चारों के अनुरोध पर शिव भगवान ने एक तरुण बालक ‘दक्षिणमूर्ति’ का रूप धरा और बरगद के वृक्ष के नीचे दक्षिण की ओर मुँह करके बैठ गए। उस तरुण बालक के दिव्य तेज से ब्रह्मापुत्र अत्यंत प्रभावित हुए। उसे अपना परम गुरु मानकर उन्होंने अत्यंत ध्यानपूर्वक उसे सुनना प्रारम्भ कर दिया। अपनी जिज्ञासा पूर्ति के लिए जीवन के रहस्यों के संबंध में भांति-भांति के प्रश्न पूछने लगे। दक्षिणमूर्ति ने शीघ्र ही समझ लिया कि उनके प्रश्नों का समाधान बौद्धिक स्तर पर संभव नहीं… उसे तो अनुभवों के आधार पर ही जाना जा सकता है। यह विचारकर उन्होंने मौन धारण कर उन ब्रह्मापुत्रों को यह समझाने की चेष्टा करी कि ‘परम मौन’ ही सब कुछ का निदान है।

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