समुद्र मंथन की कथा | शिव पुराण समुद्र मंथन

समुद्र मंथन की कथा

सागर का मंथन
ऋषि दुर्वासा एक शक्तिशाली ऋषि थे । हालांकि वह महाज्ञानी थे, परन्तु उन्हें गुस्सा जल्दी आ जाता था । एक बार भगवान इंद्र अन्य सभी देवताओं के साथ अपने हाथी पर बैठकर पृथ्वी के चारों ओर यात्रा कर रहे थे । वह सभी दुर्वासा ऋषि के आश्रम में पहुंचे। ऋषि ने भगवान इंद्र को फूलों की एक विशेष माला भेंट की । भगवान इंद्र ने वह माला अपने हाथी के सूंड़ में यह सोचकर डाल दी कि वह उस माला को अपने गले में डाल लेगा, लेकिन उस शरारती हाथी ने माला जमीन पर फेंक दी।

उसकी इस हरकत ने दुर्वासा ऋषि को क्रोधित कर दिया । ऋषि ने कहा, “मुझे इस तरह अपमानित करने कि आपने हिम्मत कैसे की ? इसके लिए मैं आपको और अन्य देवताओं को यह श्राप देता हूं कि आप सभी अपनी वैभव
और शक्तियां खो देंगे।”

उनके शाप के प्रभाव से शक्तिहीन देवों के लिए कुछ दिनों बाद दैत्य और असुर मुसीबत बन गए । अंत में परेशानियों से थककर शक्तिविहीन देवता भगवान विष्णु के पास गए और अपनी समस्याओं के बारे में बताया । उन्होंने कहा,“प्रभु, हमारी मदद करें । अगर यह लगातार जारी रहा, तो शीघ्र हम सब, दैत्य और असुरों द्वारा मार डाले जाएंगे।”

समुद्र मंथन की कथा

भगवान विष्णु ने कहा, “आप सभी को मिलकर समुद्र मंथन करना चाहिए । उस मंथन से निकले हुए अमृत से ही आप सभी अपनी शक्तियों को पुनः प्राप्त कर सकेंगे। परन्तु इस कार्य के लिए आप सभी को दैत्य और असुरों की मदद भी लेनी पड़ेगी।” तब भगवान इंद्र, दैत्यों के राजा दैत्यराज बाली के पास गए। उन्होंने कहा, “दैत्यराज, भगवान विष्णु के आशीर्वाद से हमें समुद्र का मंथन करना चाहिए । इस प्रक्रिया में समुद्र से रत्न निकलेंगे, जिन्हें मैं आपके साथ बांटने का वादा करता हूं।”

असुर और दैत्य लालची थे । इसलिए वह समुद्र मंथन मे देवताओं की मदद करने को तैयार हो गए । एक सभा आयोजित की गई, जिसमें यह तय किया गया कि मन्द्राचल पर्वत एक मथनी के तौर पर इस्तेमाल किया जायेगा और सांपों के राजा नागराज वासुकी को पर्वतनुमा मथनी की रस्सी बना कर पर्वत के चारों ओर लपेटकर दोनों पक्षों की ओर से खींचा जाएगा।

कुछ देवता और असुर मन्द्राचल पर्वत लाने के लिए गए। लेकिन पर्वत इतना भरी था कि वह सब उसे स्थानांतरित करने में असमर्थ थे। उन सब की बहुत कोशिशों के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ रहा था और वह असफल हो रहे थे ।इसलिए सभी भगवान विष्णु के पास गए और उनसे मदद की भीख मांगी।

भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर गए और उन्होंने सिर्फ अपने दाएं हाथ से पर्वत उठा लिया। फिर वह उसे समुद्र में नीचे ले गये।

सबसे पहले हलाहल जहर वासुकी के मुख से निकाला। यह जहर पृथ्वी पर फैलने लगा और कई पौधों और निर्दोष पशुओं को मारने लगा । असुर एंव दैत्य या देवतागण इस जहर को लेने को तैयार नहीं थे, वह सभी मदद के लिए भगवान शिव के पास गए । भगवान शिव ने जहर पीकर अपने कंठ (गला) में एकत्रित कर था। उनकी मृत्यु नहीं हुई क्योंकि वह बहुत ही शक्तिशाली थे। परन्तु जहर के कारण उनका कंठ नीले रंग में बदल गया । यही कारण है कि भगवान शिव को नीलकंठ या नीले कंठ वाला भी कहा जाता है।

लाहल के निकलने के बाद भी मंथन जारी रखा गया । तब कामधेनु नामक दिव्य गाय बाहर आयी । भगवान विष्णु द्वारा यह गाय उपहार स्वरुप ऋषियों को दे दी गई। फिर उस मंथन में एक घोड़ा दिखाई दिया। यह उच्चाश्रव कहलाया। दैत्यों के राजा दैत्यराज ने इसे अपने लिए रख लिया। उसके बाद चार दांतों वाला सर्फद हाथी निकला। यह एरावत कहलाया और भगवान इंद्र ने इस पर दावा कर दिया था। पांचवें उपहार के फलस्वरूप कूतभमनी गुलाब समुद्र से बाहर आया, जो दुनिया का सबसे मूल्यवान गहना था । मंथन में मदद के बदले भगवान विष्णु ने खुद इसे अपने लिए रख लिया था।

कुछ समय के बाद पारिजात नामक पेड़ समुद्र से बाहर आया । उस समय इसे समुद्र के किनारे पर रख दिया था । बाद में देवता इसे अपने साथ स्वर्ग ले गए । उसके बाद रम्भा नामक एक सुंदर युक्ती प्रकट हुई और उसने खुदनिर्णय लिया कि वह आंशिक रूप से धरती और आंशिक रूप से स्वर्ग में रहेगी।

समुद्र मंथन की कथा

मंथन को जारी रखा गया और उसके बाद धन की देवी लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। असुर और देवता दोनों ने ही उनके लिए आपस में लड़ना शुरू कर दिया था। लेकिन भगवान विष्णु ने कहा, “देवी, आप खुद निर्णय लीजिए कि आप किसके साथ रहना चाहती हैं । ” देवी लक्ष्मी ने कहा ” न तो असुरों के साथ और न ही देवताओं के साथ, यदि आप मुझे रखते हैं, तो मैं आप की पत्नी बनकर आपके साथ रहना चाहती हूं ।” इसलिए भगवान विष्णु ने देवी लक्ष्मी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया । उसके बाद वारुणी नामक मदिरा निकली, जिसे असुरों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था। आखिर में देवताओं के चिकित्सक धनवन्तरी अपने हाथों में अमरता का अमृत लिए उत्पन्न हुए। सभी दैत्य, असुरों और देवताओं में लड़ाई शुरू हो गई कि किसे अमृत का बड़ा हिस्सा मिलेगा । जैसे ही उन्होंने लड़ना शुरू किया, वैसे ही कुछ असुरों ने अमृत की सुराही को पकड़कर भागना शुरू कर दिया । इस प्रकार का भ्रम देखकर भगवान विष्णु ने उनकी मदद करने का निश्चय किया
और वह मोहिनी नामक सुंदर अप्सरा में बदल गए।

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