शिव पार्वती विवाह कथा-मछुआरिन पार्वती 

शिव पार्वती विवाह कथा

शिव पार्वती विवाह कथा-मछुआरिन पार्वती 

एक बार शिव भगवान देवी पार्वती को ब्रह्मज्ञान अर्थात् सृष्टि का ज्ञान दे रहे थे। पार्वती ध्यानमग्न सुन रही थीं। यह सिलसिला लम्बे समय तक चलता रहा। प्रभु द्धारा प्रदत्त सृष्टि के रहस्यों की व्याख्या में पार्वती डूब सी गई थीं। 

एक दिन इसी प्रकार व्याख्यान सुनते-सुनते पार्वती का ध्यान हटकर कल्पना की दुनिया में विचरण करने लगा। शिव भगवान ने तुरंत ताड़ लिया। अपना व्याख्यान रोककर उन्होंने पार्वती से पूछा, “देवी, क्या आप सुन रही हैं?” __ अपने ही विचारों में खोई पार्वती से कोई उत्तर न पाकर शिव भगवान रुष्ट हो गए। उन्होंने पार्वती से कहा, “हे देवी! आपको क्या हुआ है? किन ख्यालों में खोई हैं? आपका ध्यान कहाँ है?” 

पार्वती को अपनी भूल का तुरंत अहसास हो गया। हकलाती हुई बोलीं, “हे प्रभु! मैं… मैं…” 

उत्तेजित शिव भगवान ने कहा, “ब्रह्मज्ञान की अवहेलना… ज्ञान का मूल्य मात्र शिक्षित ही समझ सकता है। शिक्षित होने के कारण आपका ध्यान भंग नहीं होना चाहिए था। अशिक्षित होने पर ही आपको इसका महत्त्व समझ में आएगा… मेरा श्राप है कि आपका जन्म मछुआरों के अशिक्षित परिवार में हो…” 

हतप्रभ सी पार्वती के मुख से कोई बोल न निकल सके। शिव का श्राप रंग लाया। पार्वती को मछुआरों के गाँव में जाना पड़ा। गाँव का मुखिया निःसंतान था। एक दिन मछली पकड़ने के लिए जाते समय उसने एक वृक्ष के नीचे एक बच्ची को पड़ा हुआ देखा। 

आश्चर्य से उसने अपने चारों ओर देखकर सोचा, “हे प्रभु! यह किसका बच्चा है? दिव्य रूप से युक्त यह तो अत्यंत प्यारी बच्ची है…” 

उसने चारों ओर बच्ची के माता-पिता को बहुत ढूँढा पर उसे कोई न मिला। थोड़ी देर वह वहीं बैठकर प्रतीक्षा करता रहा। थक हारकर उसने आकाश की ओर दृष्टि डाली, हाथ जोड़े और बुदबुदाया, “हे प्रभु! हे दया निधान! आपका कोटिशः धन्यवाद। लगता है आपने आशीर्वाद रूप में यह बच्चा मुझे ही दिया है… मैं इसका पालन पोषण पिता की भांति करूंगा…” 

यह कहकर वह बच्ची को ले जाकर पालने लगा। हालांकि उसकी शिक्षा-दीक्षा नहीं हुई पर वह नौकायन और मछली पकड़ने की कला में पूर्णतः कुशल थी। 

कई वर्ष बीत गए। पार्वती धरती पर बड़ी हो रही थीं। इधर समय बीतने के साथ शिव भगवान को अपनी भूल का अहसास होने लगा। पार्वती का वियोग उनके लिए असह्य होता जा रहा था। वे पुनः उसे पाना चाहते थे और अपने कृत्य से दुःखी थे। 

प्रभु के बैल नन्दी ने पार्वती के लिए अपने मालिक की तड़प देखी। वह तड़प उठा। शिव भगवान से जाकर उसने कहा, “हे स्वामी! मुझसे आपकी यह अवस्था देखी नहीं जाती है। पार्वती माता भी आपसे दूर होकर अत्यंत दुःखी होंगी। आप उन्हें यहाँ वापस क्यों नहीं ले आते हैं?” 

शिव पार्वती विवाह कथा

इस पर शिव भगवान ने उत्तर दिया, “नन्दी देव, मैं ऐसा नहीं कर सकता। मेरे श्रापानुसार पार्वती को किसी मछुआरे से विवाह करना होगा। अपना जीवन जीकर, श्राप पूरा होने पर ही वह मेरे पास वापस आ सकती है।” 

यह सुनकर नन्दी देव विचारमग्न हो गए। वह हर हाल में माता पार्वती और शिव भगवान को मिलाना चाहते थे। फलतः पृथ्वी पर जाकर नन्दी ने एक बड़ी मछली ‘शार्क’ का रूप धरा और मछुआरों की बस्ती की ओर तैरते हुए पहुँचे। उस समय मछुआरे समुद्र में मछली पकड़ रहे थे। एक विशाल शार्क को आया देखकर वे भयभीत होकर चिल्लाने लगे, “अरे, वापस चलो… वह शार्क अत्यन्त भयानक लग रहा है। अपने आपको बचाओ… वापस चलो, जल्दी…” 

शार्क ने उन्हें वापस जाने का अवसर नहीं दिया। उसने उनके नावों पर हमला करना प्रारम्भ कर दिया। कुछ मछुआरे किसी प्रकार बचकर किनारे तक पहुँच गए। वे घबराए हुए अपने मुखिया तथा पार्वती के पिता से जाकर कहने लगे, “सरदार, हम बर्बाद हो गए। एक बड़ी सी शार्क हमारे मछली पकड़ने की जगह आ गई है। उसने हमारी कई नावों को बर्बाद कर दिया है। हम लोग किसी तरह तैरकर, जान बचाकर भागे हैं।” 

सरदार ने एक सभा का आयोजन कर घोषणा करी, “हमारी जाति के बहादुर नौजवानों, आप सबों के लिए एक चुनौती है… 

मैंने सुना है कि किनारे के पास एक बड़ी शार्क कहीं से आ गई है। यदि उसे मारा नहीं गया तो हम सभी का जीवन मुसीबत में आ जाएगा। आप में से जो भी बहादुर वीर उस शार्क से लड़कर उसे हराएगा वह पारितोषिक स्वरुप मेरी पुत्री से विवाह कर पाएगा।” 

कई नौजवान मछुआरों ने चुनौती स्वीकार करी। पर काई भी शार्क के समक्ष टिक न सका। हारकर एक-एक कर सभी पीछे हट गए। यह सब नन्दी देव की लीला थी। किसी भी नवयुवक को वह जीतने देना नहीं चाहते थे। उनकी तो यही इच्छा थी कि उनके इष्ट देव ही देवी पार्वती को अंततः जीतें। 

मछुआरों के सरदार को यह अहसास हुआ कि उनके यहाँ ऐसा एक भी बहादुर नौजवान नहीं है जो पार्वती का हाथ थामे तो उसने शिव भगवान से प्रार्थना करी, “हे महादेव! हम पर कृपा करें। कई दिन हो गए हम में से कोई मछली पकड़ने नहीं जा पाया है। एक शार्क ने हमारा जीवन दूभर कर रखा है। किसी का भी साहस समुद्र में जाने का नहीं होता है। कृपया कुछ चमत्कार करके शार्क से हमारी रक्षा करिए।” 

शिव पार्वती विवाह कथा

सरदार की सच्ची प्रार्थना रंग लाई। शिव भगवान एक नौजवान मछुआरे का रूप धर कर सरदार के सामने प्रकट हुए। उन्होंने सरदार के पास जाकर सगर्व कहा, “श्रीमान्! मुझे आपकी चुनौती स्वीकार है… मैं शार्क से लडूंगा और अवश्य जीतूंगा। आप अपनी पुत्री को दुल्हन बनाइए और विवाह की तैयारियाँ करिए। मैं सफल होकर लौटूंगा और अपनी दुल्हन ले जाऊँगा।”

 नौजवान मछुआरा (शिव) पानी को चीरता हुआ शार्क तक पहुँचा। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। थोड़ी देर बाद नौजवान शार्क को वश में करने में सफल हो गया। शार्क ने भी विनम्रतापूर्वक अपने मालिक के सामने सिर झुका दिया। नौजवान शार्क का खींचता हुआ किनारे पर ले आया। सभी उसकी जय-जयकार कर उठे। 

सरदार ने हाथ जोड़कर नौजवान से कहा, “हे साहसी व्यक्ति! तुम मेरी पुत्री के अधिकारी हो।” 

तत्पश्चात् शिव और पार्वती का विवाह सम्पन्न हुआ। सभी ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वे दोनों कैलाश पर्वत पर वापस, आ गए।

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