शिव विवाह की कथा | शिव पार्वती विवाह कथा

शिव विवाह की कथा

शिव विवाह की कथा | शिव पार्वती विवाह कथा-कामदेव का हस्तक्षेप 

देवताओं की इच्छापूर्ति के लिए कामदेव चल पड़े। शिव भगवान के पास पहुँचकर उन्होंने देखा कि पार्वती पूरी तन्मयता से शिव जी की सेवा में रत हैं और शिव भगवान गहन ध्यानमुद्रा में आसीन हैं। अवसर देख कामदेव ने शिव भगवान पर अपना बाण चला दिया। शिव जी ने तुरंत अपनी आँखें खोलीं। उन्हें अपने भीतर पार्वती के प्रति आकर्षण का अहसास हुआ। उसी पल उन्हें सती का ख्याल आया और कामदेव भी दिखाई दिए। 

पार्वती के प्रति आकर्षण का कारण उन्होंने कामदेव को माना। क्रोधित शिव भगवान ने अपना तृतीय नेत्र खोला। 

परिणामस्वरूप कामदेव जलकर भस्म हो गए। क्रुद्ध शिव भगवान ने अब अपनी दृष्टि पार्वती पर डाली और कहा, “हे पार्वती! कामदेव के साथ मिलकर तुम मेरे साथ यह कौन सा खेल खेल रही हो? ऐसा कदापि मत समझना कि मैं तुम्हारी चाल में फँस जाऊँगा… सती, मेरी पत्नी, का स्थान कोई नहीं ग्रहण कर सकता… अभी तुरंत तुम यहाँ से चली जाओ और फिर कभी वापस मत आना…” । 

इस प्रकार पार्वती अपने घर वापस लौट आईं। शिव से विवाह करने की इच्छा अपूर्ण ही रही। पार्वती ने पुनः घोर तपस्या करने की ठानी। उनकी तपस्या समय के साथ कठिन से कठिनतर होती गई। उन्हें यह भी अहसास हुआ कि वे महादेवी का ही रूप हैं और वही पूर्व जन्म में सती थीं। शिव को पाने की उनकी आशा और दृढ़ हुई। वे कठोर तपस्या में रत रहीं। उनकी तपस्या के ताप से सारी सृष्टि तपने लगी। देवगण चिंतित हो उठे। उन्होंने ब्रह्मा जी के पास जाकर प्रार्थना करी, “हे ब्रह्मदेव! पार्वती को इस घोर तपस्या से रोकिए… शिव भगवान को यह आभास कराना आवश्यक है कि पार्वती ही सती हैं।” 

देवताओं के अनुरोध् पर ब्रह्मा जी और विष्णु भगवान ने शिव से जाकर कहा, “हे महादेव! पार्वती के तप के ताप से सृष्टि तपने लगी है। यदि आपने उन्हें नहीं रोका तो सारी सृष्टि जलकर राख हो जाएगी।” 

शिव भगवान ने एक ब्राह्मण का रूप धरा और पार्वती की परीक्षा लेने गए। उन्होंने पार्वती से पूछा, “हे कुँवारी! यह कठोर तप क्यों कर रही हो?” 

पार्वती ने उत्तर दिया, “शिव में मेरी अनन्य भक्ति है। मैं उनसे विवाह करना चाहती हूँ किन्तु उनकी रुचि मुझमें नहीं 

ब्राह्मण रूपधारी शिव ने पुनः कहा, “हे रूपवती! बाघांबर धारी, जटा धारी तथा शरीर पर भस्म लगाने वाले के प्रति तुम्हारा आकर्षण कैसे हुआ?” 

शिव विवाह की कथा

ब्राह्मण की बात पार्वती को पसंद नहीं आई। कठोर स्वर में उन्होंने कहा, “श्रीमान् ! मेरे प्रभु के विषय में आप अनर्गल बातें न करें। पूर्व जन्म में मैं उनकी पत्नी थी और इस जन्म में भी उनसे मेरा विवाह पूर्वनिर्दिष्ट है। जब तक वे मुझे नहीं स्वीकारते मैं तप में रत रहूँगी।” 

यह कहकर पार्वती पुनः ध्यानमग्न हो गईं। ब्राह्मण रूपधारी शिव भगवान ने पार्वती की भक्ति और सच्चे प्रेम को पहचान लिया। अपने असली रूप में पार्वती के समक्ष प्रकट होकर उन्होंने कहा, “हे पार्वती! आँखें खोलो… मैं तुम्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकारता हूँ… तुम ही मेरी सती हो…” 

शिव भगवान और पार्वती की धूम-धाम से शादी हुई। पार्वती के पिता हिमालय तथा माता मेना ने अन्य देवी देवताओं के साथ उन दोनों को ढेर सारा आशीर्वाद दिया। विवाह के पश्चात् शिव भगवान पार्वती के साथ अपने निवास स्थान लौट आए।

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