शिव कथा पुराण-मार्कण्डेय को शिव का आशीर्वाद 

शिव कथा पुराण

शिव कथा पुराण-मार्कण्डेय को शिव का आशीर्वाद 

मृकंडु ऋषि और उनकी पत्नी मरुद्वति शिव भगवान के अनन्य भक्त थे। किन्तु वे निःसंतान थे। संतान प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने शिव जी की तपस्या करनी शुरु कर दी। दिन बीते और फिर महीने… उनकी तपस्या कठिन से कठिनतर होती जा रही थी। अंततः शिव भगवान उनकी तपस्या से प्रसन्न हो गए। वे ऋषि के समक्ष प्रकट होकर बोले, “हे महान् आत्मा! मैं आपकी भक्ति से प्रसन्न हुआ। मांगो, क्या वर मांगते हो?” 

ऋषि दम्पति ने एक स्वर में कहा, “हे प्रभु! कृपया हमें संतान का आशीर्वाद दें।” 

शिव भगवान ने उनकी परीक्षा लेने का विचार कर उनसे कहा, “वह तो मैं दूंगा किन्तु तुम्हें दो में से एक को चुनना पड़ेगा… मंद बुद्धि दीर्घायु संतान चाहते हो या फिर तीव्रबुद्धि संतान जिसकी आयु मात्र सोलह वर्ष होगी।” 

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दम्पत्ति ने विचार कर कहा, “हे प्रभु! हमें तीव्र बुद्धिसंतान का आशीर्वाद दीजिए।” शिव भगवान ने उन्हें उनका मनचाहा वरदान दे दिया। 

समय के अंतराल में दम्पत्ति को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। उन्होंने उसका नाम मार्कण्डेय रखा। बड़े ही लाड़-प्यार से माता-पिता ने उसका लालन पालन किया। पर जाने क्यों कभी कभी वे दोनों थोड़ी देर के लिए उदास हो जाया करते थे। 

मार्कण्डेय धीरे-धीरे बड़ा होने लगा। वह अत्यंत मेधावी था। उसमें असाधारण प्रतिभा थी। शीघ्र ही उसने सभी धार्मिक ग्रंथों को सीख लिया। वह भी शिव का परम भक्त था। उसने शिव की स्तुति स्वरूप महामृत्युंजय पाठ में विशारद पा लिया था। नियमित रूप से इस मंत्र के उच्चारण से असमय मृत्यु से बचा जा सकता था। मार्कण्डेय अपने प्रति अपने माता-पिता के प्रेम तथा अनुराग को भली-भांति समझता था फिर भी उसे माता पिता की उदासी का भी बोध होता था। 

 एक दिन उसने अपने पिता से पूछा, “हे तात! मैं आप जैसे प्रिय और अनुरागी माता-पिता को पाकर स्वयं को भाग्यशाली मानता हूँ किन्तु मुझे ऐसा लगता है कि कुछ तो है जो आपको निरंतर पीड़ा देता रहता है, आपको उदास कर देता है… वह क्या है मुझे बताने की कृपा करें।” 

ऋषि मृकंडु ने एक गहरी साँस ली। पुत्र से वे असत्य नहीं कहना चाहते थे। उन्होंने कहा, “प्रिय वत्स! हम दोनों को क्या पीड़ा देता है… यह मैं कैसे बताऊँ… तुम शिव भगवान के आशीर्वाद का परिणाम हो। उन्होंने हमें विकल्प दिया था… सुस्त पर दीर्घायु संतान या फिर मेधावी पर अल्पायु संतान… हमने मेधावी संतान का विकल्प चुना। इस प्रकार तुम हमें मिले…”

भारी मन से ऋषि ने मार्कण्डेय को उसके जन्म से जुड़े राज को बता दिया। मार्कण्डेय ने कहा, “हे तात! आप मेरे अल्पायु होने की चिंता न करें। हमारे प्रभु मुझे हर दुर्भाग्य से बचाएँगे।” 

समय बीता और एक दिन मार्कण्डेय सोलह वर्ष का हो गया… उसके जीवन का अंत समय आ गया। पुत्र के चले जाने की कल्पना से माता-पिता अत्यंत शोकाकुल थे। 

वह सोलहवें जन्मदिन की रात थी। मार्कण्डेय शिव भगवान के समक्ष ध्यानस्थ होकर बैठ गया और महामृत्युंजय मंत्रा क जाप करने लगा। उसी समय मृत्युदेव यम उसे अपने साथ लाने के लिए तैयार हो रहे थे। अपने सहायक को बुलाकर उन्होंने निर्देश दिया, “उस बालक का अंत निकट है। सही समय पर धरती पर जाकर उसे ले आओ।” 

यम के सहयोगी धरती पर पहुँचकर ध्यानस्थ मार्कण्डेय के पास गए। मार्कण्डेय के तप के ताप से वातावरण तपने लगा था। यम के सहयोगी उस ताप को सहन न कर सके। वापस जाकर उन्होंने यम से कहा, “हे महाराज! उस बालक में कुछ तो ऐसी महान् शक्ति है जो हम उसके निकट भी न जा सके…” 

अत्यंत क्रुद्ध यम ने कहा, “मूर्यो, तुम लोग किसी काम के नहीं हो। ऐसा कैसे हो सकता है? उसका अंत निकट ही है। उसे कुछ मिनटों में ही लाना होगा।” 

यह कहकर यम स्वयं ही मार्कण्डेय को लाने चल पड़े। अपने पाश के साथ यम मार्कण्डेय के पास पहुंचे। वह अभी भी ध्यानस्थ बैठा शिव भगवान की अराधना में लीन था। 

यम ने भयंकर अट्टहास करते हुए कहा, “हे नन्ही जान! तुममें ऐसी कौन सी शक्ति है जो मेरे सहायक तुम्हारे समीप आने में असफल रहे?” 

यह कहकर यम बालक के पास पहुंचे। उसकी आवाज सुनकर मार्कण्डेय ने उसे रोकते हुए कहा, “हे मृत्युदेव! कृपया रुक जाइए। मैं अपनी प्रार्थना कर रहा हूँ। मुझे इसे पूरा कर लेने दीजिए फिर मैं आपके पास आऊँगा।”

यम ने कुछ पल प्रतीक्षा करी पर मार्कण्डेय की प्रार्थना देर तक चलती रही। यम अधीर होने लगे। अपना पाश मार्कण्डेय की ओर फेंकते हुए उन्होंने कहा, “अधिक चतुराई न दिखाओ, मुझे मूर्ख बनाने की चेष्टा मत करो… चलो, चलो…” 

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ज्योंही यम मार्कण्डेय की ओर बढ़े वह चतुराई से बचकर भागा और शिवलिंग को जोर से भींचकर “ओम् नमः शिवाय” मंत्र का लगातार जाप करने लगा। 

शिव भगवान उसकी भक्ति से पिघलकर यम के समक्ष प्रकट हुए और उस पर हमला कर दिया। दोनों में युद्ध हुआ और यम मारा गया। 

अन्य देव यह सब देख रहे थे। उन्होंने शिव भगवान से आकर निवेदन किया, “हे महादेव! कृपया यम को वापस लाएँ। उनके बिना लोग अविनाशी हो जाएंगे और धरती का संतुलन बिगड़ जाएगा।” 

देवताओं के अनुरोध पर शिव भगवान ने यम को पुनर्जीवित कर कहा, “यम, मैंने मार्कण्डेय को अमरत्व का आशीर्वाद दिया है। वह सदा सोलह वर्ष के बालक के रूप में रहेगा।” 

आज भी ऐसा विश्वास है कि मार्कण्डेय सोलह वर्ष के बालक के रूप में जीवित हैं।

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