लोककथा-सच्ची भक्ति

शिक्षाप्रद कहानियां

लोककथा-सच्ची भक्ति

एक समय की बात है। किसी नगर में एक राजा था। वह बहुत आस्तिक था। उसके एक कन्या थी, जो पिता की तरह ईश्वर में अटूट विश्वास रखती थी। राजा की इच्छा थी कि वह अपनी कन्या का विवाह ऐसे युवक से करे जिसकी ईश्वर में सच्ची आस्था हो। एक दिन उसकी मुलाकात एक ऐसे युवक से हुई, जो भगवान की भक्ति में लीन था। राजा ने उससे पूछा- ‘तुम क्या काम करते हो?’

 युवक ने कहा- ‘प्रभु भक्ति के अलावा मेरे पास कुछ काम नहीं है। भगवान की कृपा से ही मेरा गुजर बसर होता है। उसकी बातें सुनकर राजा ने सोचा कि इसी युवक से वह अपनी कन्या का विवाह करेगा। उसने अपनी बेटी का विवाह उसके साथ कर दिया। 

विवाह के बाद राजा की बेटी अपने पति के साथ चल दी। रास्ते में वे एक जंगल में रुके और पेड़ के नीचे डेरा डाला। राजकुमारी ने देखा कि उसके पति ने पेड़ के कोटर में पानी के एक सकोरे पर रोटी का टुकड़ा रख रखा है। 

उसने सकोरे को उठाकर पति से पूछा- ‘यह क्या है?’ युवक बोला- ‘मैंने कल ही थोड़ी रोटी बचा ली थी ताकि आज खा सकें। 

 यह सुनकर राजकुमारी अपने पिता के घर लौटने के लिए चलने लगी। युवक ने उसे रोका और जाने का कारण पूछा। राजकुमारी ने कहा- ‘आपको ईश्वर पर अटूट विश्वास नहीं है। इसीलिए तो आपने सोचा कि कल क्या खाएंगे और रोटी का टुकड़ा बचाकर रख लिया।

मैं ऐसे युवक से विवाह करना चाहती थी, जिसकी प्रभु-भक्ति  में कोई कमी न हो। लेकिन अब मुझे पछतावा हो रहा है।राजकुमारी की बातें सुनकर युवक ने रोटी का टुकड़ा फेंक दिया और राजकुमारी के साथ आगे के रास्ते पर चल पड़ा। 

 

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