शिक्षाप्रद कहानी- रूपवती

शिक्षाप्रद कहानी- रूपवती

 रूपवती 

शिक्षाप्रद कहानी– यह कहानी हरियाणा के गांव सोनपुर की है जहां पर लगभग 200 परिवार निवास करते थे| उन्हीं परिवारों में से एक था किशन सिंह का परिवार। किशन सिंह गांव के एक सम्मानित साथ ही धनी व्यक्ति भी थे। 

किशन सिंह का विवाह पानीपत में रहने वाली एक सुंदर स्त्री रूपवती से हुआ। किशन सिंह के विवाह का एकमात्र उद्देश्य अपनी जमीन जायदाद को वारिस प्रदान करना था। किशन सिंह लड़का लड़की में बहुत भेदभाव करते थे उनका मानना था कि केवल लड़का ही अपने कुल का नाम रोशन कर सकता है। 

कुछ समय पश्चात रुपवती गर्भवती हुई। अब किशन सिंह उससे एक ही बात प्रतिदिन कहता की मेरा लड़का मेरे कुल का नाम रोशन करेगा। किशन सिंह के दिमाग को लड़के के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता था।वह भूल चुका था कि भगवान ने इस संसार की रचना के समय मानव प्रजाति के दो वर्ग बनाए थे स्त्री तथा पुरुष।दोनों जीवन रूपी रथ के दो पहिए है एक के बिना दूसरे का अस्तित्व ही नहीं। 

समय निकट आता जा रहा था और रूपवती को बस एक ही डर सताया जा रहा था कि कहीं अगर लड़की हो गई तो क्या होगा? फिर वह दिन आया जिसका सभी को लंबे समय से इंतजार था। रूपवती कमरे के अंतर कराह रही थी उसके साथ गांव की दाईं मां भी थी। जो बच्चों का जन्म सफलतापूर्वक करवाती थीं। 

कमरे के बाहर परिवार के बाकी लोगों के साथ किशन सिंह भी थे।वह एक अच्छी खबर के लिए बेताब हुए जा रहे थे। फिर अचानक कमरे के अंदर से रुपवती की आवाज आना बंद हो गया बाहर सभी लोग चिंतित महसूस करने लगे। लेकिन फिर थोड़ी देर बाद एक बच्चे के रोने कि आवाज आई जिसे सुनकर सभी की जान में जान आई। 

एकाएक कमरे का दरवाजा खुला ,दाईं मां बाहर आयीं उनकी आंखे झुकी हुई थी और चेहरा थोड़ा उदास था। शायद वह वो सच जानती थी जिसका बारे में रुपवती पूरी तरह से अनभिज्ञ थी। दाईं मां ने धीमे स्वर में कहा “बेटी हुई है” 

किशन सिंह पहले थोड़ा निराश हुआ फिर उसने दाईं मां को कुछ इशारा किया इसके बाद दाईं मां बच्ची को लेकर बाहर जाने लगीं। 

यह घटना किसी को आश्चर्य में डाल सकती थी लेकिन किशन सिंह का परिवार आश्चर्यचकित न था क्योंकि वह उनके परिवार में लड़की होने का परिणाम भली भांति जानते थे। 

दाईं मां कुछ समय के बाद जब वापिस लौटकर आयीं तो रूपवती ने पूछा कि बची कहां है। दाईं मां ने कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन जब रूपवती रोने लगी तब दाईं मां ने उसे समझाते हुए कहा कि यहां पर लड़की होना गुनाह यदि यहां लड़की पैदा होती है तो उसे पैदा होते ही मार दिया जाता है। यह सुनकर रूपवती बेहोश हो गई। 

रूपवती को अगले दिन होश आया लेकिन तब तक सब कुछ खत्म हो चुका था। एक मां जिसने 9 महीने अपने बच्चे के लिए इतनी पीड़ा सहन की आज उसे वह मात्र 9 मिनट भी नहीं देख पाई। 

अगली बार रूपवती को फिर एक बार लड़की हुई और इसके साथ भी वही हाल हुआ जो पहली लड़की के साथ हुआ था।वह कभी कभी भगवान से पूछती कि मैने ऐसा क्या गुनाह किया है जो तुम मेरे साथ ऐसा अन्याय कर रहे हो। रूपवती तीसरी बार गर्भवती हुई इस बार उसे फिर से लड़की हुई लेकिन वह इस लड़की को मरता हुआ नहीं देखना चाहती थी। उसने दाईं मां से इसका पालन पोषण करने को कहा साथ उन्हें विश्वास दिलाया कि इसके पालन पोषण में जितना भी खर्च आएगा मैं तुम्हे उसका दोगना खर्च दूंगी। 

आखिरकार दाईं मां ने उस बच्ची की जान बचा ली और उसे अपने साथ अपने घर ले गई। तीन लगातार लड़कियों के बाद रूपवती को दो जुड़वा लड़के हुए। जिन्हे देखकर किशन सिंह खुश हो गया। वह रूपवती के लिए लाखों रुपए के आभूषण ले आया। किशन सिंह ने बेटों की खुशी में पूरे गांव में जुलूस निकलवाया, मिठाईयां बांटी, नाच गाना कराया। 

समय अपनी रफ़्तार में बहा चला जा रहा था। पता ही भी चला कि कब किशन सिंह के दोनों बेटे भी शादी के लायक हो गए लेकिन किशन सिंह के दोनों बेटों की परिवार में बिल्कुल रुचि नहीं थी। 

एक बेटा शराब और नशे में अपना पूरा दिन बिताता था तो दूसरा उन्हें छोड़कर दिल्ली चला गया था। किशन सिंह की उम्र भी ढलती का थी थी उसने सोचा क्यों न जल्द ही दोनों बेटों का विवाह करके जमीन जायदाद को दोनों में बांट दिया जाए। 

किशन सिंह ने अपने बेटों का विवाह बड़े ही धूम धाम से कराया।और विवाह के बाद ही सारी जमीन जायदाद को दोनों में बांट दिया। 

किशन की बेटी जिसका कि उन्हें पता भी नहीं था। वह भी अब बड़ी हो चुकी थी। उसकी बेटी पढ़ने लिखने में होशियार होने के साथ साथ कुशल वक्ता भी थी। जमीन जायदाद का बंटवारा होते ही किशन सिंह के दोनों बेटे उसके नियंत्रण से बाहर हो गए।एक बेटा सारी जमीन जायदाद बेचकर दिल्ली में ही रहने लगा।तो दूसरा शराब 

और नशे के लिए अपनी संपत्ति को बेचे जा रहा था। किशन सिंह यह सब देखकर बहुत निराश होते और उनको समझाया करते लेकिन परिणाम स्वरुप उन बेटों ने उसे घर से ही निकाल दिया। 

अब किशन सिंह और रूपवती बुढ़ापे की इस अवस्था में सड़क पर थे। उन्हें पता था कि उन्हें अपनी आगे की जिंदगी अब अनाथालय में ही गुजारनी है। 

उधर रूपवती की लड़की जिसको दाईं मां पाल रही थीं। अपनी व्यावहारिक कुशलता और सगंठन नेतृत्व के बल पर राजनीति में प्रवेश कर चुकी थी।वह उमा भारती और सुषमा स्वराज को अपना मार्गदर्शक मानती थी। वह अपने क्षेत्र से विधायक का चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच चुकी थी। 

जहां पर उसे विधायक दल का नेता चुना गया और अब वह सूबे की मुख्यमंत्री बन चुकी थी। 

जब दाईं मां ने यह खबर अनाथालय में जाकर उसकी मां को बताई, तो रूपवती खुशी से रो पड़ी अब उससे अपने पति को बिना बताए रहा नहीं जा रहा था। 

वह तुरंत उठकर किशनसिंह के पास पहुंची और कहा कि आपको प्रदेश की नई मुख्यमंत्री के बारे में पता है क्या? 

तब किशनसिंह बोला कि हां आज ही अख़बार में उसके बारे में देखा। बड़ी ही होनहार लड़की है आज उसके माता पिता उसपर गर्व करते होंगे। 

तब रूपवती बीच में ही बोल पड़ी कि वह हमारी लड़की है। 

किशन सिंह रूपवती को आश्चर्य भरी नजरों से देख रहा था और एकदम से बोला” हमारी लड़की!” बुढ़ापे में बुद्धि भ्रष्ट हो गई है तेरी। थोड़ा आराम करके फिर बात करते है। 

फिर रूपवती बाहर से दाईं मां को बुलाकर लाई। दाईं मां ने उन्हें पूरी कहानी सुनाई। यह सुनते ही किशन सिंह रो पड़ा आज उसे अपनी गलती का अहसास हो चुका था। अब वह समझ चुका था लड़का लड़की सब एक समान होते है और हम इसमें भेदभाव करके भगवान के आदेश की अवहेलना करते है। 

दाईं मां ने किशन सिंह से कहा कि मैं आज ही बेटी को आपके बारे में बता दूंगी तब किशन सिंह रोया और रोते हुए कहा कि नहीं दाईं मां आप ऐसा बिल्कुल नहीं करेंगी। 

आखिर वह हमारे बारे में जानकर क्या करेंगी ? अगर उसे पता चला कि उसका बाप ही उसे मारना चाहता था तो वह मुझे कभी माफ नहीं करेगी। 

मै अपने बेटों से तो बिछड़ गया हूं लेकिन अब अपनी बेटी से नहीं बिछड़ना चाहता। 

बस आप उसे कुछ भी करके एक बार अनाथालय ले आना जिससे हम मरने से पहले उसकी शक्ल देख सके। इतना कहकर रूपवती और किशनसिंह दोनों रोने लगे। 

रूपवती की लड़की जो कि दाईं मां को अपनी मां समझाती थी उनकी किसी भी बात से इनकार नहीं करती थी। 

दाईं मां ने अपनी बेटी से उसके साथ अनाथालय चलने को कहा तो उसने अपनी मां की बात नहीं टाली और उनके साथ अनाथालय पहुंची। 

सभी लोग प्रदेश की मुख्यमंत्री को अपने अनाथालय में देख कर खुश थे। तो किशन सिंह और रूपवती अपनी बेटी को देखकर खुश थे। 

दोनों ने पहली बार अपनी बेटी को देखा था वो भी इतने करीब से ।अन्य सभी लोग खुश दिखाई दे रहे थे किन्तु किशन सिंह और रूपवती बहुत ही भावुक लग रहे थे। उनकी लड़की सभी लोगों को वस्त्र और कम्बल आदि बांट कर वापिस प्रदेश की सेवा में जुट गई। वहीं किशन सिंह और रूपवती भगवान राम का जाप करके अपनी मुक्ति की कामना करने लगे। 

अतः कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि व्यक्ति को कभी भी लड़का-लड़की में भेदभाव नहीं करना चाहिए।

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