छायावाद और रहस्यवाद 

छायावाद और रहस्यवाद 

छायावाद और रहस्यवाद 

आधुनिक हिन्दी की खड़ी बोली की वह कविता जिसकी शुरूआत लगभग 1918 में होती है और जिसका लगभग समापन 1936 में होता है, उसे छायावादी कविता के नाम से जानते हैं। यानी इसके प्रमुख कवियों में प्रसाद, पंत, महादेवी और निराला का नाम लिया जा सकता है। शुरूआती दौर में छायावादी काव्य की जो विशेषताएं उभरकर सामने आयीं, उनमें इस कविता को सुशील कुमार ने अपने ‘छायावाद’ (सरस्वती, जून 1921) शीर्षक निबंध में टैगोर स्कूल की चित्रकला के समान ‘अस्पष्ट’ तो बताया ही, इसे निर्मल ब्रह्म की विशद छाया, वाणी की नीरवता, निस्तब्धता का उच्छ्वास, एवं अनंत का विलास के रूप में रेखांकित किया। इसके अलावा छायावादी कविता की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता के बारे में द्विवेदी युग के मशहूर कवि लोचन प्रसाद पांडेय के भाई पं. मुकुटधर पांडेय, जिन्होंने ‘छायावाद’ नामकरण किया, को इस कविता में ‘मिस्टिसिज्म’ की ध्वनि सुनाई पड़ी। 

जिन कविताओं को लोग छायावादी कहते थे, उन्हीं को महावीर प्रसाद द्विवेदी रहस्यवादी समझते थे और उसमें प्रयुक्त छंद को रबर समझते थे। लेकिन मुकुटधर पांडेय छायावादी कविता में आध्यात्मिकता देखते थे, जबकि द्विवेदी जी इस प्रकार की कविताओं को बहुत ज्यादा तरजीह न देते हुए अन्योक्ति पद्धति से ज्यादा कुछ और मानने को तैयार नहीं थे। शायद कविता की बदलती शक्ल को वे अपने बनाये खांचे के हिसाब से देख रहे थे, इसलिए उन्होंने अपने उक्त निबंध में लिखा- “छायावाद से लोगों का क्या मतलब है, कुछ समझ में नहीं आता। शायद उनका मतलब है कि किसी कविता के भावों की छाया यदि कहीं अन्यत्र आकर पड़े तो उसे छायावादी कविता कहना चाहिए।” यानी छायावाद को कभी ‘छायावाद’ तो कभी ‘रहस्यवाद’  समझा जाता रहा। 

दरअसल इसके नामकरण में ही पेच है। मुकुटधर पांडेय ने ‘सरस्वती’ के संपादक और द्विवेदी जी के उत्तराधिकारी, बाबू पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी से ‘मिस्टिसिज्म’ के लिए हिंदी का पर्यायवाची शब्द पूछा था। बख्शी जी ने उसके लिए नाम सुझाया था ‘भक्तिवाद’ लेकिन पांडेय जी ने न जाने क्यों उसे ‘छायावाद’ कर दिया। बख्शीजी द्वारा ‘भक्तिवाद’ नाम सुझाये जाने के पीछे उनके दिमाग में ‘सरस्वती’ की 1912 से 1918 तक की छपी वे कविताएं थीं जिनमें कुछ प्रकृति प्रेम था, तो कुछ मानव प्रेम, तो कुछ ईश्वर के प्रति भक्ति का भाव। ऐसे कवियों में बदरीनाथ भट्ट, मुकुटधर पांडेय और मैथिलीशरण गुप्त आदि की उस दौर की कविताएं उनके जेहन में थीं। बख्शी जी ने स्वयं स्वीकार किया है-“1920 में छायावाद नाम का कोई काव्य था ही नहीं। इस शब्द के प्रवर्तन का श्रेय पं. मुकुटधर पांडेय को है। जब पांडेय जी 1920 में श्री शारदा’ में इसके संबंध में एक लेख लिख रहे थे, तब उन्होंने मुझसे ‘मिस्टिसिज्म’ के लिए हिंदी पर्यायवाची शब्द पूछा था। मैंने भक्तिवाद’ शब्द सुझाया था, क्योंकि मेरी अभी भी मान्यता है कि मिस्टिक कविताओं में भक्ति की प्रधानता रहती है। मिस्टिक कवि भी सूफी या हिंदी के निरंकारवादी संतों की तरह भक्त कवि रहे हैं। परंपरा से हटकर रचित और नूतन काव्योन्मेष से युक्त रचनाएं ‘सरस्वती’ में बराबर छपती रही हैं। बदरीनाथ भट्ट, मुकुटधर पांडेय, मैथिलीशरण गुप्त आदि की उस समय प्रकाशित हाने वाली रचनाओं में मिस्टिक या छायावादी काव्य की विशेषताएं देखी जा सकती हैं।”  

बाद के कवियों में पंत के हिंदी मंदिर, प्रयाग से 15 पृष्ठों के 1921 में छपे काव्य संकलन ‘उच्छ्वास’ (सावन भादों) से ऐसी कविताओं की विधिवत शुरूआत होती है। पंत जी की 1923 से 1928 तक ‘सरस्वती’ में प्रकाशित कलरव, निर्झर गान, मुस्कान, मौन निमंत्रण, शिशु, स्वप्न, बादल, आंसू, पल्लव और छाया आदि कविताएं छायावादी काव्य के नाम पर ही छपी हैं, लेकिन इनमें रहस्यवाद की झलक सीधे-सीधे दिखाई पड़ती है। इन कविताओं पर पंत जी कीट्स, शैली, वर्ड्सवर्थ और टेनीसन का प्रभाव मानते हैं। शायद इसीलिए अंग्रेजी के रोमैंटिक कवियों के वजन पर इस दौर की हिंदी कविता को रोमैटिक पोयट्री’ भी कहा जाता है। 

यह महज संयाग नहीं है कि 1928 में पं. रामचंद्र शुक्ल न अपनी पुस्तक काव्य में रहस्यवाद’ में इन कविताओं को तात्विक दृष्टि से रहस्यवादी तथा रूप विधान की दृष्टि से छायावादी माना। आगे चलकर जब महादेवी वर्मा की प्रियतम को संबोधित करते हुए में मतवाली इधर, उधर प्रिय मेरा अलबेला सा है, तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय क्या, कमलदल में किरण अंकित चित्र हूं, क्या मैं चितर, मधुर-मधुर मेरे दीपक जल युग-युग प्रतिदिन, प्रतिक्षण, प्रतिपल जैसी बहुत सारी कविताएं प्रकाशित हो गयीं तब रहस्यवाद या मिस्टिसिज्म की वे पर्याय हो गयीं। फिर तो रहस्यवाद और छायावाद धीरे-धीरे अलग हो गये। और कदाचित् रहस्यवाद को वेदों, उपनिषदों से शुरू करके कबीर, जायसी एवं मीरा से होते हुए महादेवी वर्मा तक रेखांकित किया जाने लगा। यही नहीं, महादेवी जी की कविताओं पर उपनिषदों का प्रभाव जैसे शोधपरक निबंध लिखे जाने लगे। महादेवी पर निकले अभिनंदन और संस्मरण ग्रंथों में पी.वी. नरसिद्मा राव जैसे नेताओं से लेकर हिंदी के अनेक बड़े लेखकों ने लंबे लेख लिखे। इस प्रकार छायावाद तो 1936 तक ही सीमित हो गया लेकिन रहस्यवाद सनातन और चिरंतन हा गया। 

नामवर सिंह ने ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां’ शीर्षक पुस्तक में लिखा है कि रहस्य भावना प्राचीन है, लेकिन रहस्यवाद आधुनिक और हिंदी में छायावादी काव्य आंदोलन से सम्बद्ध है। बकौल सिंह हिंदी साहित्य में ‘रहस्यवाद’ शब्द का इस्तेमाल 1920 से पहले दिखाई नहीं पड़ता। उनके मुताबिक इस शब्द का प्रचलन मुकुटधर पांडेय, पंत और प्रसाद की कविताओं की आलोचना-प्रत्यालोचना के सिलसिले में हुआ। कवीन्द्र रवीन्द्र की ‘गीतांजलि’ को क्योंकि देशी विदेशी आलोचकों ने ‘मिस्टिक’ कहा था, इसलिए हिंदी में भी उसी तरह की कविताओं को ‘मिस्टिक’ और उनमें निहित भावधारा को ‘मिस्टिसिज्म’ समझकर हिंदी में उसके लिए ‘रहस्यवाद’ शब्द चल गया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘सुकवि किंकर’ नाम से लिखे अपने निबंध ‘आजकल के हिंदी कवि और कविता’ में मिस्टिक या मिस्टिसिज्म पर विचार करते हुए लिखा है- “अंग्रेजी में एक शब्द है ‘मिस्टिक’ या ‘मिस्टिकल’। पं. मथुरा प्रसाद दीक्षित ने अपने त्रैमासिक कोश में उसका अर्थ दिया है—गूढार्थ, गुह्य, गुप्त, गोप्य और रहस्य। रवीन्द्रनाथ की यह नये ढंग की कविता इसी ‘मिस्टिक’ शब्द के अर्थ की द्योतक है। इसे कोई रहस्यमय कहता है, कोई गूढार्थ बोधक कहता है, और कोई छायावाद की अनुगामिनी कहता है।” लेकिन नामवर सिंह ने लिखा है कि रहस्यवाद का एक निश्चित दर्शन है जिसके अनुसार सत्य ‘रहस्य’ है और उसका केवल ‘दर्शन’ होता है। सत्य का दर्शन सबको सब समय नहीं होता। विशेष व्यक्ति विशेष क्षण में ही सत्य को देख सकते हैं। ऐसे विशेष व्यक्ति को विशेष प्रकार की दृष्टि प्राप्त होती है जिसे कभी-कभी ‘अंतर्दृष्टि’ भी कहते हैं। लेकिन छायावादियों को इस दृष्टि को अपनी कविता में उतारने में कितनी सफलता प्राप्त हुई, नहीं कहा जा सकता। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को तो यह पूरा विश्वास था कि जिस प्रकार की कविताएं रवीन्द्रनाथ टैगोर लिखते थे, वैसी कविताएं पंत वगैरह नहीं लिख सकते। द्विवेदी जी ने अपने ‘सरस्वती’ वाले उसी निबंध में लिखा है- “जो काम रवीन्द्रनाथ ने चालीस-पचास वर्ष के सतत् अभ्यास और निदिध्यास की कृपा स कर दिखाया है, उस द स्टूल छोड़ते ही कमर कसकर कर दिखाने के लिए उतावले हो रहे हैं। कुछ तो स्कूलों और कालेजों में रहते ही छायावादी कवि बनन लग गय हैं।” 

अपने दस पृष्ठों के निबंध में मुकवि किंकर ने छायावादियों की खूब हंसी उड़ायी है और खिंचाई करते हुए किसी कवि की कविता की चंद पंक्तियां देकर उसकी आलोचना भी की है। मुकवि किंकर (द्विवेदी जी) लिखे हैं, “एक और उदीयमान बुध या बृहस्पति आदि ग्रहों के सदृश नहीं, सूर्य के सदृश छायावादी कवि की कविता सुनिए। इस कविता का नाम है—“आया!” याद रहे, यह आश्चर्यसूचक चिह्न भी कवि का दिया हुआ है-

ज्यों प्रदीप का अंत हुआ तू अंधकार के संग आया। आ गया मलयानिल सा, क्या इस तम तरंग में छिपा रहा? 

घोर निविड़ में तू आएगा यदि कोई यह बतलाता, इस दीपक का मेरे द्वारा अंत कभी का हो जाता। 

इस गूढार्थ प्रेमी कवि की वह चीज अब पाठक ही ढूंढ़ने की तकलीफ गवारा करें जिसे वह अपने हृदय में दीपक बुझाने के समय तक छिपाये बैठा था…..”  

लेकिन डॉ. नामवर सिंह ने निराला को छोड़कर पंत, प्रसाद आर महादेवी की रहस्य-भावना का दर्शन किया है जिसे वह काव्य में  ‘परोक्ष की जिज्ञासा’ के रूप में व्याख्यायित करते हैं। पंत और महादेवी की तो बहुत सारी उन कविताओं का जिक्र किया जा चुका है जिनमें रहस्यवाद की झलक पायी जाती है लेकिन प्रसाद की इन पंक्तियों, जिनमें उनका प्रियतम आवरण में आता है, का उल्लेख भी प्रासंगिक होगा। मसलन, “शशि मुख पर बूंघट डाले/अंचल में दीप छिपाये जीवन की गोधूलि में/कौतूहल से तुम आये।” इसी प्रकार प्रसाद जी की अनेक कविताएं इकट्ठी की जा सकती हैं जिनमें रहस्यवाद के निदर्शन किये जा सकते हैं। 

अब सवाल यह उठता है कि प्रसाद, पंत और महादेवी ने अपनी कविताओं में प्रियतम का जैसा चित्र प्रस्तुत किया है, क्या वह कबीर, जायसी, और मीरा की तरह ही है या उसमें कुछ फर्क है? इस संबंध में महादेवी वर्मा का निम्न वक्तव्य दृष्टव्य है जिसमें उन्होंने कहा है- “उसने (आधुनिक रहस्यवाद) परा विद्या की अपार्थिवता ली, वेदांत के अद्वैत की छाया मात्र ग्रहण की, लौकिक वेग से तीव्रता उधार ली और इन सबको कबीर के सांकेतिक दांपत्य भाव सूत्र में बांधकर निराले स्नेह संबंध की सृष्टि कर डाली जो मनुष्य के हृदय को पूर्ण अवलंब दे सका, उसे पार्थिव प्रेम के ऊपर उठा सका तथा मस्तिष्क को हृदयमय और हृदय को मस्तिष्कमय बना सका।” यानी इन कवियों ने वेदों से चलकर मध्यकालीन कविता से कुछ न कुछ खासियतें लेकर आधुनिक रहस्यवादी कविता को मुकम्मल शक्ल दी। 

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