सिलाई मशीन का आविष्कार किसने किया |Sewing Machine avishkar kisne kiya

सिलाई मशीन का आविष्कार किसने किया

सिलाई मशीन का आविष्कार किसने किया |Sewing Machine avishkar kisne kiya

आज बाजार में सिलाई मशीनों की विविध किस्में दिखाई पड़ती हैं, जिनमें कपड़ा सिलने वाले कारीगर (दर्जी) एक से बढ़कर एक सुन्दर व आकर्षक परिधान तैयार करते हैं। आज की सिलाई मशीनों में एक किस्म ऐसी भी है, जो बहुत ही कम वजन वाली और आकार में काफी छोटी है। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में सिलाई मशीन नामक इस यंत्र के नाम से भी कोई परिचित नहीं था। 

उन दिनों जब इस सिलाई मशीन का आविष्कार नहीं हुआ था, तब लोगों को कपड़े सिलने में बहुत कठिनाई होती थी। उस समय हाथों द्वारा सुई की सहायता से कपड़े सिले जाते थे। इससे आंखों पर अधिक जोर पड़ता था, जिससे सिलाई करने वालों की आंखें शीघ्र ही खराब हो जाती थीं। इसके अलावा कपड़ा तेजी से न सिले जाने के कारण दर्जियों की कम आय होती थी और साथ ही कपड़ा ज्यादा मजबूती के साथ नहीं सिला जाता था। 

उन्हीं दिनों अमेरिका के एक इस्पात के कारखाने में इलियास होवी नामक एक व्यक्ति कार्य करता था। उसके परिवार में उसकी पत्नी और बच्चे थे। वह जब रात के समय अपने काम से लौटता, तो प्रायः अपनी पत्नी को कपड़े सिलते हुए देखता था। वह अपने घर के कपड़े स्वयं सिलकर तैयार करती थी। एक दिन अपनी पत्नी की परिश्रम-साधना को देखकर इलियास होवी को मन-ही-मन बड़ा दुःख हुआ। वह सोचने लगा कि उसकी पत्नी को तो कुछ कपड़े ही सिलने पड़ते हैं, मगर उन लोगों की क्या हालत होती होगी, जो कपड़े-सिलकर ही अपना पेट पालते हैं। 

क्या उनका स्वास्थ्य खराब नहीं होता होगा? क्या पूरा-पूरा दिन मेहनत करके भी उन्हें इतनी आय हो जाती होगी कि उस आय से पूरे परिवार का गुजारा हो सके?

इलियास के दिमाग में रह-रहकर यही विचार चक्कर काटने लगा। अचानक उसके मन में विचार आया कि यदि कोई ऐसी मशीन बन जाए तो लोगों की कठिनाई सहज ही दूर हो सकती है। 

उसी रोज से इलियास मशीन बनाने की चेष्टा में लग गया। उसने सबसे पहले एक सुई बनाई; सुई के बीच में डोरा डालने का एक छेद था, जिसके दोनों सिरे बहुत तेज थे। इस सुई के लिए मोटे धागे की आवश्यकता पड़ती थी, जो मजबूत तो होता था, किन्तु आकर्षक नहीं। महीन और बारीक धागा उस सुई में बार-बार टूट जाता था। इससे इलियास को सन्तोष नहीं हुआ। इसके बाद उसने और भी अनेक प्रकार के प्रयोग किए। 

अन्त में, अत्यधिक परिश्रम के बाद सन् 1844 ई. में इलियास ने कपड़े सिलने की मशीन बनाकर तैयार की। उसकी यह मशीन लकड़ी और तारों से बनी थी।

इलियास ने जब मशीन बना ली, तो उसे उसके प्रचार की चिन्ता हुई। उसने सोचा, यदि इस मशीन का प्रचार हो गया, तो बहुत धन और सम्मान प्राप्त होगा।

 इलियास अपनी मशीन का प्रचार करने के लिए घर से चल दिया। मगर प्रचार कार्य के लिए उसके पास रुपये नहीं थे। भाग्य से उसकी कैम्ब्रिज के एक व्यक्ति से भेंट हो गई। वह व्यक्ति इलियास की सिलाई मशीन देखकर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने इलियास की बहुत सहायता की। बदले में वह इलियास की मशीन में साझीदार बन गया। इलियास उसके प्रोत्साहन से एक नई तरह की मशीन बनाने लगा।

 कुछ दिनों बाद इलियास की मेहनत रंग लगाई। उसने एक ऐसी मशीन बनाकर तैयार की जो एक बार धागा डालने से चार गज कपड़ा सिल लेती थी। इस तरह इलियास की मशीन दर्जियों के हाथ द्वारा सिले कपड़े से अधिक कपड़ा सिलने लगी। इस पर दर्जियों की धारणा थी कि इलियास की मशीन से उनके व्यवसाय को धक्का पहुंचेगा। 

दर्जियों के विरोध का यह परिणाम हुआ कि इलियास के मित्रों ने उसकी सहायता करनी बंद कर दी। इससे इलियास को बड़ी निराशा हुई और वह अपने घर लौट आया।

कुछ दिनों बाद इलियास पुनः अपनी कम्पनी में इंजीनियर का काम करने लगा, मगर उसका स्वास्थ्य अब ठीक नहीं रहता था। उसने इंजीनियरी का काम छोड़ दिया। एक बार फिर उसका ध्यान सिलाई की मशीन पर केन्द्रित हो गया। उसने सिलाई करने की जो मशीन बनाई थी, उसे उसके भाई ने एक व्यक्ति को दो सौ पचास पौण्ड में बेंच दी। वह व्यक्ति इलियास की उस मशीन को खरीद कर बहुत खुश हुआ। उसने इलियास को अपने पास बुलाया और उसे बोरे बुनने के कारखाने में नौकरी पर रख लिया। 

मगर इलियास उस कारखाने में ज्यादा दिनों तक काम नहीं कर सका, क्योंकि उसकी कारखाने के मालिक से उसकी खटपट हो गई। वह कारखाने का काम छोड़कर इंग्लैण्ड चला गया। इंग्लैण्ड में उसे बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा। वहां वह कई दिनों तक भूखा रहा। जब इलियास के मित्र को उसकी परेशानियों का पता चला, तो उसने उसके पास कुछ रुपये भेज दिए। इलियास ने उन रुपयों से अपनी पत्नी व अपने बच्चों को अमेरिका वापस भेज दिया, किन्तु स्वयं इंग्लैण्ड से नहीं गया। उसे उम्मीद थी कि जल्द ही किसी-न-किसी का ध्यान उसकी मशीन की ओर अवश्य जाएगा, किन्तु इलियास की आशा धूल में मिल गई और उसे निराश होकर अपने घर की तरफ रवाना होना पड़ा।

अभी वह न्यूयॉर्क तक ही पहुंचा था, तभी उसे पता चला कि उसकी पत्नी बहुत बीमार है। वह शीघ्र-से-शीघ्र अपने घर पहुंच जाना चाहता था, किन्तु अब उसके पास इतने रुपये नहीं बचे थे कि वह कैम्ब्रिज पहुंच पाए। कुछ दिन इलियास ने न्यूयॉर्क में परिश्रम कर रुपये प्राप्त किए और अपने घर आ गया। दुर्भाग्य से जब वह अपने घर पहुंचा, तब तक उसकी पत्नी का देहान्त हो चुका था। अपनी पत्नी की आकस्मिक मौत से वह बहुत दुःखी हुआ।

इलियास अभी अपने दुःख से उबर भी नहीं पाया था कि उसे पता चला कि इंग्लैण्ड में किसी ने उसकी मशीन की नकल कर ली है। साथ ही वह नकलची खुद को उस मशीन का आविष्कारक बता रहा है। इलियास ने बड़ी मुश्किल से कुछ रकम इकट्ठा की और उसे झूठे व्यक्ति पर मुकदमा चला दिया। अन्त में मुकदमें का फैसला इलियास के पक्ष में हुआ। 

सिलाई मशीन का आविष्कार किसने किया

सन् 1854 ई. में इलियास को सरकार से मशीन का विशेषाधिकार प्राप्त हो गया। धीरे-धीरे लोगों का ध्यान इलियास की मशीन की ओर आकर्षित होने लगा। लोग उसकी उपयोगिता और महत्त्व को समझने लगे। बहुत से कारखानों के मालिकों ने इलियास से सिलाई की मशीन बनवायी। मगर परेशानी यह थी कि इलियास जब मशीनें तैयार करके कारखाने में भेजता, तो दर्जी उन्हें बहुत जल्दी खराब कर देते थे। कुछ दिनों तक इसी तरह झगड़ा चलता रहा। मगर फिर धीरे-धीरे दर्जियों का विरोध कम हो गया और लोग प्रेम व उत्सुकता से इलियास की मशीनों पर काम करने लगे। देखते-ही-देखते सम्पूर्ण विश्व में जब इलियास की मशीनें प्रसिद्ध हो गईं तब इलियास को प्रति वर्ष करीब एक लाख डॉलरों की आय होने लगी। 

सन् 1867 ई. में पेरिस की प्रदर्शनी में इलियास को, उसकी सिलाई मशीन पर खुश होकर, एक बहुत बड़ा पुरस्कार दिया गया। तब से आज तक सिलाई मशीन में काफी बदलाव किए जाते रहे, फिर भी आधुनिक मशीन में कई महत्त्वपूर्ण पुर्जे एवं लक्षण वैसे ही हैं, जैसी इलियास होव की पहली मशीन में थे।

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