Self development tips in hindi-जिन्दगी में सुख और दुःख बराबर ही होते हैं (The Quantum of Pleasures and Sorrow is Equal to Each Other) 

Self development tips in hindi-

Self development tips in hindi-जिन्दगी में सुख और दुःख बराबर ही होते हैं (The Quantum of Pleasures and Sorrow is Equal to Each Other) 

1.सुख और दुःख का सम्बन्ध मन से है और आनन्द का सम्बन्ध आत्मा से है. जिस प्रकार मन का स्थायी भाव ‘सुख-दुःख’ होता है, उसी प्रकार आत्मा का स्थायी भाव ‘आनन्द’ होता है. चूँकि मन कभी स्थिर नहीं रह सकता, इसलिए सुख और दुःख भी स्थिर नहीं रह सकते, दोनों बारी-बारी से आते रहते हैं, आत्मा सदा स्थित रहती है, इसलिए आनन्द भी स्थिर है, शाश्वत है. आनन्द का कोई विलोम नहीं होता, किन्तु सुख का विलोम दुःख होता है और संख्यात्मक दृष्टि से दोनों बराबर ही होते हैं.

2. कोई कितना ही छोटा हो या बड़ा हो, कोई कितना ही खोटा हो या खरा हो, सुख और दुःख तो हर व्यक्ति के जीवन में बराबर ही होंगे. यह अवश्य है कि संख्यात्मक दृष्टि से गरीब व्यक्ति के ‘सुख-दुःख’ कम होंगे और अमीर के ‘सुख-दुःख’ अधिक होंगे. चूँकि हर व्यक्ति अपने सुखों में निरन्तर अभिवृद्धि करता रहता है, इसलिए दुखों में तदानुसार वृद्धि तो स्वतः ही होती रहती है. अर्थात् जितने सुःख, उतने ही दुःख. सारे उपद्रवों की जड़ बस यही है.

3. जो दुःख को भी सुख का ही हिस्सा समझता है, वस्तुतः वही सुखी होता है. जो सुख में भी दुःख को ही खोजता रहता है, वही दुःखी होता है. जिस प्रकार दिन और रात संख्यात्मक दृष्टि से बराबर होते हैं, उसी प्रकार सुख और दुःख भी बराबर ही होते हैं. दिन और रात की तरह ही सुख-दुःख भी बारी-बारी से आते रहते हैं.

4. सुख और दुःख तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इसलिए दोनों साथ-साथ रहेंगे ही. जब तक सुख-दुःख रूपी सिक्का आपके पास है, तब तक आप सुख-दुःख से ऊपर नहीं उठ सकते. दोनों शब्दों में ‘ख’ तो कॉमन है, समान है. ‘ख’ अर्थात् ‘आकाश’ ‘शून्य’. अच्छे आकाश को सुख और बुरे आकाश को दुःख कह सकते हैं. वस्तुतः आकाश तो आकाश ही होता है, न अच्छा होता है, न बुरा होता है. ‘ख’ से पहले ‘सु’ या ‘दु’ हम अपनी सुविधा से लगाते चलते हैं. यदि हम अपना नजरिया बदल लें तो हमें सुख ही सुख नजर आयेगा. इस तरह हम अपने दुःखों की संख्या व मात्रा को कम कर सकते हैं. किन्तु यदि हमें सुख और दुःख दोनों से ऊपर उठना हो तो हमें सुख-दुःख का सिक्का ही बदलना पड़ेगा. तब आनन्द ही आनन्द होगा.

5. देखा जाए तो सुखों और दुःखों के कारण ही संसार में संतुलन बना हुआ है. संसार का अर्थ है, समय. समय अर्थात् मन. मन और समय एक ही ऊर्जा के दो नाम हैं. दोनों में समन्वय होने पर ही हम आनन्दित रह सकते हैं. और परमानन्द ही जीवन का परम लक्ष्य होता है. व्यक्ति यदि हर परिस्थिति में अपने को सुखी अनुभव करे, तब उसे कौन दुःखी कर सकता है. व्यक्ति अपने सकारात्मक सोच और स्वभाव से दुःखों की मात्रा कम कर सकता है. 

6.सफल व्यक्तियों में कुछ बातें समान पायी जाती हैं. सभी सफल व्यक्ति सुख और दुःख को एक ही भाव से ग्रहण करते हैं. वे हर दुःख के बाद आने वाले सुख की कल्पना कर लेते हैं. वस्तुतः जो सुख और दुःख को समभाव से पकड़ लेते हैं, वे ही क्रान्ति के हकदार होते हैं. जो सुख को पकड़ना और दुःख को छोड़ना चाहते हैं, वे ऐसा करने में सफल नहीं हो सकते.

7. सुख और दुःख तो जिन्दगी के अभिन्न अंग हैं. जिन्दगी के असली रंग हैं. क्या आप अपने आपको जिन्दगी से अलग कर सकते हैं ? नहीं. तब आप अपने आपको सुखों और दुःखों से अलग भी नहीं कर सकते. इसलिए हमें सुख और दुःख को सहज एवम् स्वाभाविक रूप से ही स्वीकारना पड़ेगा. हम जगत में जितने पदार्थ देखते हैं, उतने ही हमारे लगाव पैदा हो जाते हैं. सभी पदार्थ तो हमें उपलब्ध हो नहीं सकते, इसी लिए हम दुःखी रहते हैं. जो नहीं है, उसकी अपेक्षा करना ही का सुख थोड़ी देर ही रह पाता है, इसीलिए हम हर सुख के बाद दुःखी हो जाते हैं. होने के सुख को यदि हम लम्बा कर सकें तो फिर हमारे दुःखों की मात्रा अपने आप कम होती चली जायेगी.

8. आदमी अपनी स्व-अर्जित समस्याओं के कारण ही अक्सर दुःखी रहता है. आदमी अपनी ही समस्याओं के जाल में उलझा रहता है. इसीलिए वह किसी को सुखी देखना भी पंसद नहीं कर पाता है. लेकिन इससे किसी और का तो कुछ भी नहीं बिगड़ता, खुद के कष्टों में अभिवृद्धि अवश्य हो जाती है. इसलिए जो दुःखों की तुलना में सुखों की संख्या बढ़ाने में सफल हो जाता है, वही जिन्दगी में सफल हो सकता है.

9. स्वाभाविक सुख-दुःख के भावों को दबाना नहीं चाहिए. अपने परिजनों, सहयोगियों एवम् हितेषियों के समक्ष प्रकट करते रहना चाहिए. अर्थात् न सुख के भाव को पचायें और न दुःख के भाव को दबायें. याद रखें, पचाने और दबाने से मानसिक, शारीरिक एवम् व्यावसायिक समस्यायें उत्पन्न हो जाती हैं. दुःख बाँटने से घटता है और सुख बाँटने से बढ़ता है.

दृष्टान्त –बुद्ध ने चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन किया था-1. संसार में दुःख है, 2. हर दुःख का कारण भी है. 3. हर कारण का निवारण अर्थात् निदान भी है. 4. निदान हो जाने पर सुख अवश्य आता है. और याद रखें, हर सुख अपने साथ कोई न कोई दुःख भी अवश्य लेकर आता है. फिर दुःख का कारण खोजना पड़ता है. कारण का निवारण भी करना पड़ता है. निवारण के बाद फिर सुख की अनुभूति होती है. बस यही क्रम निरन्तर चलता रहता है. जो दुःख को भी सुख का अंग समझने की कला विकसित कर लेता है, वही इस क्रम को तोड़ने में सफल हो पाता है.

Self belief in Hindi-सुख को बाहर नहीं, भीतर खोजिए (Find Out the Pleasure with in, Not with Out) 

1.सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो यही है कि व्यक्ति अपने सुखों की खोज अपने से बाहर करता है. पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहिन, पुत्र-पुत्री, मित्र-सहकर्मी और सामाजिक रिश्तों में सुख खोजता है. याद रखें, इनसे कभी सुख मिल ही नहीं सकता. जो बाहर है ही नहीं, उसे बाहर कैसे पाया जा सकता है. जिस वक्त व्यक्ति यह जान लेता है कि सुख तो स्वयम् में उतरने का नाम है, उसी वक्त क्रान्ति घट जाती है. बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाती है. याद रखें, बाहर जो मिलता है, उसका नाम दुःख है और भीतर जो मिलता है, उसका नाम सुख है.

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2. सुख का सम्बन्ध तो हमारी विचारधारा से है, भौतिक और आर्थिक संसाधनों से नहीं, विचारधारा अन्दर से आती है, बाहरी साधनों से नहीं आती, ध्यान रहे, बाहरी सुख तो महज मिथ्या है. मिथ्या यानी जो है नहीं, केवल प्रतीत होता है, आन्तरिक सुख ही असली सुख है, जिसे अनुभव तो किया जा सकता है, किन्तु अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता. आन्तरिक सुख की प्राप्ति होने पर कोई भी आपको दुःखी नहीं कर सकता.

3. जो आपके पास नहीं है, उसकी अपेक्षा करना ही दुःख है. जैसे ही कोई वस्तु प्राप्त होती है, वह गौण होती चली जाती है. और फिर से नये वस्तु की अपेक्षा आरम्भ हो जाती है और यह दौड़ कभी खत्म होने वाली नहीं है, क्योंकि वस्तुओं की सूची कभी समाप्त होने वाली नहीं है. भौतिक संसाधनों से मिलने वाला सुख तो नितान्त ही अस्थायी एवम् अल्पावधि के लिए ही होता है. सुखों और दुःखों के क्रम में व्यक्ति प्रायः दुःखी ही रहता है, सुख-दुःख से ऊपर उठने पर आनन्द की उपलब्धि होती है, किन्तु आनन्द के लिए तो भीतर ही उतरना पड़ेगा. आनन्द ही स्थायी है और हर व्यक्ति आनन्द का अधिकारी है.

4. बाहरी सुखों और दुःखों का हिसाब रखना व्यर्थ है. यह हिसाब ही व्यक्ति के दुःखों का मूल कारण है. क्योंकि हर जोड़-बाकी में दुःखों का पलड़ा भारी लगता है. सुखों को तो आदमी ठीक से आंक ही कहाँ पाता है. सुखों का सही-सही मूल्यांकन करने पर हमारे दुःखों की मात्रा बहुत कम रह जाती है. किन्तु यह तब ही संभव है, जब हम अपने भीतर उतर कर आकलन करें. सफलता का असली रहस्य भी यही है.

5. यदि व्यक्ति को बिल्कुल ही खुला छोड़ दिया जाए, तब वह जल्दी ही जंगल राज से दुःखी हो जायेगा. और यदि उस पर अत्यधिक अनुशासन लाद दिया जाए, तब भी वह इच्छाओं के दमन के कारण दुःखी हो जायेगा. अर्थात् हर हालत में वह दुःखी ही रहेगा. इसलिए यदि आनन्दित रहना है तो भीतर उतरना होगा. अन्तर्यात्रा से ही आनन्द को उपलब्ध हुआ जा सकता है. जिस सफलता से सुख-दुःख नहीं, आनन्द की प्राप्ति हो, वही असली सफलता है. 

6.देखा जाय तो सुख आपकी विचारधारा से जुड़ा हुआ है और दुःख अनचाहे अतिथि की भांति आपसे चिपका हुआ है. अर्थात् सुख या दुख को आमन्त्रित करने की आवश्यकता नहीं है. इसलिए बेहतर तो यही है कि सुख-दुःख को अपना मित्र समझें. सुख को सुख समझें या न समझें, परन्तु दुःख को सुख अवश्य समझें. याद रखें, दुःख के कारण ही सुख का अस्तित्व है. और सुख के कारण ही दुःख की प्रतीति है. दोनों एक दूसरे पर निर्भर हैं. किन्तु यह बिल्कुल आप पर निर्भर है कि आप दुःखी रहें या सुखी रहें.

7. जिस प्रकार शरीर के भीतर शारीरिक अंगो का संगठन होता है, उसी प्रकार शरीर के बाहर भी सांसारिक अंगो का संगठन होता है. दोनों में कोई मौलिक अन्तर नहीं है. अन्तर केवल इतना ही है कि आप बाहरी संगठनों से कभी सुखी नहीं हो सकते. सुखी रहने के लिए तो आपको अपनी मनःस्थिति को प्रबल करना होगा. सुखी रहने के लिए परिस्थितियों की नहीं, बल्कि परिस्थितियों से तालमेल बिठाने की आवश्यकता होती है. और यह तब ही संभव है, जब आपका नजरिया सही हो. याद रखें, नजरिया भीतर से विकसित होता है..

8. सुख-दुःख को ही नहीं, आदमी तो अपने आपको भी बाहर ही खोजता फिरता है. परमात्मा को भी बाहर ही खोजता रहता है. ध्यान रहे, जब इन्द्रियाँ शान्त हो जायें, आप भीतर रह जायें, जगत बाहर रह जाय, बीच में कोई सेतु न हो, तब अन्तरात्मा प्रकट होती है. तब ही आनन्द की अनुभूति होती है. और यह कतई मुश्किल नहीं है. बस थोड़े से अभ्यास की आवश्यकता है, ध्यान में उतर कर तो देखिए.

9. जब तक हवा से भरे होते हैं, तब तक मोटर गाडी के पहिए चलते रहते हैं. गाड़ी के खड़ी रहने पर भी गाड़ी का वजन तो पहिए ही उठाये रहते हैं. कीचड़, गन्दगी एवम् धूल भरे रास्तों पर भी पहिए प्रसन्नता से भरे होते हैं. पहियों की प्रसन्नता का राज वह हवा है, जो उनके भीतर भरी होती है. ध्यान रहे, भीतर की हवा कम होते ही पहिए पिचक जाते हैं. इसी तरह व्यक्ति भी केवल भीतरी प्रसन्नता से भरकर ही जीवनपथ पर आगे बढ़ सकता है. 

दृष्टान्त- ‘दुःखी राम’ रोजाना की भाँति प्रातःकालीन भ्रमण पर था, सामने से एक परिचित व्यक्ति आया और बिना नमस्ते किये ही गुजर गया. वह रोजाना नमस्ते करता था, किन्तु आज तो उसने दुःखी राम की तरफ देखा भी नहीं, इसी बात पर ‘दुःखी राम’ दुःखी हो उठा. शान्त झील में अचानक एक पत्थर पड़ गया. लहरें उठने लगी. बदला लेने के भाव उमड़ने लगे. दुःखी राम का मूड जरा सी बात पर बिगड़ गया. गुजरने वाले व्यक्ति ने तो कुछ भी नहीं किया था. वह तो शान्त भाव से ही गुजरा था. अपने आप में इतना खोया हुआ था कि उसे दुःखी राम का ध्यान भी नहीं रहा. लेकिन दुःखी राम के तन-मन में आग सुलग रही थी. उसके तथाकथित अहम् में बाधा जो पड़ गई थी. सुख को बाहर खोजने वालों की यही दशा होती है. 

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