Self-confidence quotes-जिन्दगी का मतलब ही जोखिम है (Risk is The Synonym of Life) 

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Self-confidence quotes-जिन्दगी का मतलब ही जोखिम है (Risk is The Synonym of Life) 

1.याद रखें, कोई जोखिम न लेना ही सबसे बड़ी जोखिम है. जोखिम के डर से कोई काम ही न करना, जिन्दगी को बर्बाद करना है, जोखिम तो गर्भ में आने के साथ ही शुरू हो जाती है, जो मौत तक साथ निभाती है, कुछ महान आत्माओं की जोखिम तो उनकी मौत के बाद भी पीछा नहीं छोड़ पाती है, यानी जोखिम तो जीने की शर्त है. बिना जोखिम तो जीना ही व्यर्थ है.

2. जिस प्रकार ‘परमात्मा’ को किसी एक शब्द में कैद नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार ‘सफलता को भी किसी शब्द में नहीं पिरोया जा सकता. ठीक इसी प्रकार ‘जोखिम’ को भी शब्दों तक सीमित नहीं किया जा सकता. लेकिन जहाँ जोखिम है, वहीं सफलता है. जहाँ सफलता है, वहीं जोखिम है. यानी जोखिम और सफलता जिन्दगी रूपी सिक्के के दो पहलू हैं.

3. जब तक जीना है, तक तक सीना है. और यह न भूलें कि सीने में जोखिम ही जोखिम है. बिना जोखिम उठाये तो आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकते. यहाँ तक कि खड़े होने में भी जोखिम है. हमारी विफलताओं का, यथास्थिति-वाद का एक मात्र कारण यही है कि हम जोखिम उठाने के लिए तैयार नहीं हैं. साधारणतः हम सरल काम करना पसंद करते हैं, इसीलिए जोखिम उठाने वाले व्यक्तियों की तुलना में बहुत अधिक पिछड़ जाते हैं,

4. सफलता प्राप्त करना कठिन हो सकता है, किन्तु असंभव नहीं. देखा जाय तो सोचना भी कम जोखिम भरा नहीं है. जिन्दगी का कौनसा जख्म हरा नहीं है. कुछ होने से पहले कुछ न कुछ करना पड़ता है और कुछ करने से पहले कुछ सोचना पड़ता है. अर्थात् कुछ होने के लिए सोचने की जोखिम तो उठानी ही पड़ेगी. याद रखें, सोचने की जोखिम उठाने वाला ही आगे बढ़ सकता है. व्यक्ति उस सीमा तक जोखिम उठाने से बचना चाहता है, जिस सीमा तक वह डरा हुआ होता है. इसलिए जोखिम उठाने के लिए डर को निकालना पड़ेगा. जोखिम उठाकर तो देखिये, डर अपने आप ही निकल जायेगा.

5. आप संकल्प का साहस तो करें, हर विकल्प पर विचार तो करें, संकल्प-विकल्प को जोखिम न समझें. आगे बढ़ने के लिए पहला कदम तो बढ़ाइए, अगला कदम तो अपने आप ही उठ जायेगा. यात्रा कितनी ही लम्बी क्यों न हो, कदम तो एक-एक करके ही उठाने पड़ेंगे. और यह भी सदा याद रखें कि जोखिम तो कदम-कदम पर होती है, इसलिए हर जोखिम के लिए हरदम तैयार रहें. तब आपका हर कदम आसान होगा. किसी भी कदम को कभी अन्तिम न समझें, सफलता में हर कदम का समान महत्व होता है.

6. जो सही समय पर सही रास्ता चुन लेता है, उसे सफल होने से कोई नहीं रोक सकता. जो जोखिम उठाने की आदत डाल लेता है, वो हर जोखिम को आसानी से पार कर लेता है, जो खतरों से खेलना जानता है, उसे जीतने से कोई नहीं रोक सकता. जो वस्तुतः काम करना चाहता है, उसके लिए तो जोखिम का कोई अर्थ नहीं होता, जोखिम तो उसके काम का ही हिस्सा होती है. याद रखें, जीवन का खेल एक बार ही मिलता है, कहीं ऐसा न हो कि संभावित खतरों के कारण आप ठीक से खेल ही न पायें.

7. जरा सोचिए, शेयर मार्केट में पैसा लगाना सचमुच कितना जोखिम भरा होता है, फिर भी शेयर्स में सबसे अधिक धन लगा होता है. कुछ लोग रातों-रात करोड़पति हो जाते हैं और कुछ लोग रोड़ पति. याद रखें, करोड़पति होने में तो वक्त लगता है, किन्तु रोड़पति होने में कोई वक्त नहीं लगता. पर यह भी सच है कि ‘रोड़पति’ होने की रिस्क उठाने वाले ही ‘करोड़पति हो सकते हैं. ‘रोड़’ से पहले ‘क’ जोड़ने की जोखिम तो उठाइए, ‘करोड़पति’ होने में वक्त ही कितना सा लगता है.

8. कहते हैं कि जिसे बाजार में दस रुपये भी उधार न मिलते हों, वही लिमिटेड कम्पनी बनाकर इसी बाजार से दस करोड़ रुपये शेयर्स के जरिए एकत्रित कर सकता है. परन्तु इसके लिए कितनी बड़ी जोखिम उठानी पड़ती है. जोखिम के साथ मेहनत भी करनी पड़ती है. निवेशकों का विश्वास भी जीतना पड़ता है. संभावित रिस्क फैक्टर्स भी समझने पड़ते हैं. साथ ही यह भी सच है कि रिस्क उठाने के बदले कम्पनी के कर्ता धर्ता एवम् पदाधिकारी कितने एशो-आराम के साथ रहते हैं.

9. जरा सोचिए, रिस्क कहाँ नहीं है ? छत गिर सकती है, पंखा गिर सकता है. कोई भी दुर्घटना घट सकती है. बिजली गिर सकती है. भूकम्प आ सकता है. बाढ़ आ सकती है. आसमान गिर सकता है, आग लग सकती है. चोरी हो सकती है. मारपीट हो सकती है. कोई प्रिय वस्तु खो सकती है. आप किसी मुकदमें में फंस सकते हैं. हार्ट अटेक आ सकता है, कुछ भी हो सकता है, व्यापार में घाटा हो सकता है. यदि आप मानसिक रूप से इन सबके लिए तैयार रहें तो हर जोखिम से लड़ा जा सकता है. जो जोखिम से लड़ना जानता है, वही जीना जानता है.

दृष्टान्त- एक बिल्ली चूहे के पीछे दौड़ रही थी. चूहा भी काफी तेजी से दौड़ रहा था, किन्तु मौत बिल्कुल नजदीक थी. अचानक चूहे को एक बिल नजर आ गया और चूहा उसमें घुस गया. बिल्ली बिल के पास आकर रूक गई. वह बेबस थी. मानो खुद से ही पूछ रही हो-‘चूहा हाथ से कैसे निकल गया ?’ बिल के अन्दर चूहा चहक रहा था. मानों कह रहा हो-‘मुझे पकड़ना तुम्हारा लक्ष्य था और अपने आपको बचाना मेरा लक्ष्य था. मैं अपने लक्ष्य में सफल रहा.’ अर्थात् जो अपने को बचाने का लक्ष्य लेकर चलता है, वह तमाम जोखिमों के बावजूद सफल होकर रहता है. 

जिन्दगी अपने आप में एक प्रतियोगिता है (Life is It Self A Competition) 

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1.प्रकृति प्रतियोगिता पर टिकी हुई है. जिन्दगी प्रकृति के हाथों बिकी हुई है. तब जिन्दगी प्रतियोगिता से बाहर कैसे हो सकती है ? याद रखें, यहाँ जो सक्षम है, वही टिक सकता है, और सक्षमता सिद्ध करने के लिए प्रतियोगिता में बने रहना एक अनिवार्यता है. हर पल एक प्रतियोगी पल होता है. हम प्रतियोगिता में तब तक ही बने रह सकते हैं, जब तक कि हम हर पल की चुनौती स्वीकारते चलें…

2. प्रतियोगिता कोई भूत नहीं, जिससे डरा जाय. प्रतियोगिता कोई शत्रु नहीं, जिससे लड़ा जाय. हार जीत का कोई महत्व नहीं है, महत्वपूर्ण तो बस यही है कि प्रतियोगिता में बने रहा जाय. इसलिए यदि आप प्रतियोगिता में बने रहेंगे तो कोई न कोई स्थान तो आपका भी होगा ही. याद रखिए, जो भी स्थान आपका होगा, वह कम महत्वपूर्ण नहीं होगा.

3. यह संसार एक परीक्षा केन्द्र है. हम सब परीक्षार्थी हैं. हर परीक्षा केन्द्र एक नियामक है और हम सब न्यायार्थी हैं. प्रश्न पत्र कैसा भी हो, कोई महत्व नहीं रखता, परीक्षा में सम्मिलित होना ही हमारी परीक्षा है. हर परीक्षा हमारी कसौटी है और कसौटी ही सफलता है.

4. हँसता हुआ प्रतियोगी ही आगे बढ़ सकता है. रोता हुआ प्रतियोगी पिछड़ जाता है. आपके भीतर सदा  नयी उमंग, नयी आशा जगनी चाहिए. आपके चेहरे पर सदा नयी आभा, नयी चमक दिखाई पड़नी चाहिए. आप जहाँ भी जायें, आपके व्यक्तित्व की एक अलग छाप पड़नी चाहिए. आस-पास के लोगों को आपके होने का अहसास हो, यही आपकी सफलता है.

5. उन लोगों के बारे में पढ़ें, उन लोगों से प्रेरणा प्राप्त करें, जो आपसे पहले सफलतायें प्राप्त कर चुके हैं. साथ चलने वालों से शुद्ध स्पर्धा भले ही करें, किन्तु जलन न रखें. सबको सहयोग दें, सबका सहयोग लें. किसी को गिरा कर नहीं, दौड़ में अपने बलबूते पर आगे बढ़कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करें. यह भी याद रखें कि लोग आपको प्रतियोगिता से सदैव बाहर करने के प्रयास में रहेंगे. इसलिए लोगों को अपना काम करने दें और आप अपना काम करते रहें.

6. मजा तो तब है, जब आप दूसरों से नहीं, बल्कि अपने आपसे मुकाबला करते हुए आगे बढ़ते रहें. दूसरों से तुलना करने की बजाय अपने आप से तुलना करें. दूसरों की कमियाँ नहीं, बल्कि अच्छाइयाँ तलाश करें. अपनी अच्छाइयाँ नहीं, बल्कि कमियाँ तलाश करें. जब आप खुद से प्रतियोगिता करना सीख जायेंगे, तब दूसरों से प्रतियोगिता करने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी.

7. प्रतियोगिता में तो बने रहें, किन्तु प्रथम स्थान की आस न रखें. प्रथम स्थान पर तो वस्तुतः आज तक कोई पहुँच भी नहीं पाया है. संसार में व्यक्ति के लिए शीर्ष स्थान का कोई अस्तित्व भी नहीं है. यदि होता तो व्यक्ति इतनी प्रगति हर्गिज नहीं कर पाता. किसी स्थान विशेष पर पहुँचना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि प्रतियोगिता में बने रहना है. कोई न कोई स्थान तो आपका भी होगा ही. पर हाँ, आप अपने स्थान से कभी संतुष्ट मत होइए. लगातार आगे बढ़ते रहने की लालसा के कारण ही दुनिया निरन्तर प्रगति कर रही है. प्रगति की दौड़ से कभी बाहर मत होइए.

8. याद रखें, प्रतियोगिता तो जीवन की सार्थकता है. इसलिए सर्वप्रथम प्रतियोगिता में सम्मिलित होने की योग्यता अर्जित करें. जब प्रतियोगिता में सम्मिलित हो जायें, तब निरन्तर आगे बढ़ते हुए नये-नये स्थान सृजित करें. याद रखें, प्रतिपक्षियों की कमजोरियों का लाभ तो आपको स्वतः ही मिलता चला जायेगा. किसी को धक्का देकर आगे मत बढ़िए, बल्कि उससे तेज चलने की क्षमता अर्जित करते हुए उसकी धीमी गति का लाभ उठाइए.

9. अर्थशास्त्र का सिद्धान्त है कि खोटे एवम् पुराने सिक्के असली एवम् नये सिक्कों को चलन से बाहर कर देते हैं. इसी तरह धूर्त लोग भले व सच्चे लोगों को प्रतियोगिता से बाहर कर देते हैं. पर यह मत भूलिए कि भले लोगों का भी वक्त आता है. अन्ततः सच्चाई और ईमानदारी की ही जीत होती है. पतोधर्मस्ततो जयः. प्रकृति बनाम प्रतियोगिता 

(क) हमारे जीवन में ही नहीं, प्रकृति के हर क्षण में प्रतियोगिता निरन्तर चलती रहती है. हर वस्तु अपने अस्तित्व के लिए प्रतियोगिता में सम्मिलित है. यदि आपने कहीं पर एक वृक्ष लगाया और उसके आस-पास उसी वर्ग का दूसरा वृक्ष नहीं लगाया तो आपका वृक्ष बहुत ही धीमी गति से बढ़ेगा. उसका समुचित विकास भी नहीं हो पायेगा. कारण कि प्रतियोगिता के लिए दूसरा वृक्ष उपलब्ध नहीं है. अकेला पेड़ मुकाबला किससे करेगा. इसलिए जब भी पेड़ लगायें, उसके आस-पास उसी किस्म के कुछ पेड़ अवश्य लगायें. एक दूसरे की हौड़ में ही पेड़ जल्दी बढ़ेंगे. पेड़ों की ऊँचाई भी काफी होगी और भरपूर फलेंगे-फूलेंगे. प्रतियोगिता के बिना तो प्रगति ही रूक जायेगी. (ख) बादलों और हवा के बीच प्रतियोगिता चलती रहती है. बिजली और पानी के बीच प्रतियोगिता चलती रहती है. नदी-नाले एक-दूसरे से मुकाबला करते रहते हैं और समुद्र में पहुंचने पर ही शान्त हो पाते हैं. मछलियाँ जल के प्रवाह से मुकाबला करती हुईं विपरीत दिशा की ओर बढ़ती रहती हैं. अर्थात् प्रकृति की सभी वस्तुऐं, चाहे सजीव हों या निर्जीव, सदैव किसी न किसी प्रतियोगिता में संलग्न रहती हैं, तब हम प्रतियोगिता से बाहर कैसे हो सकते हैं?

Self confidence Story in Hindi-हम भी तो प्राकृतिक ही हैं, प्रकृति की ही देन हैं. (Life is Uncertain & Short But Not Meaningless) 

१.यह तो तय है कि जिन्दगी बहुत ही छोटी है, इतनी छोटी कि अगले क्षण का भी पता नहीं है. किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि इस छोटी एवम् अनिश्चित जिन्दगी में अर्थपूर्ण कुछ भी न हो. जिन्दगी जब तक है, तब तक मजेदार एवम् महत्वपूर्ण है. यह कतई महत्वपूर्ण नहीं है कि आदमी मरता किस प्रकार है, महत्वपूर्ण तो यही है कि वह जीता किस प्रकार है. वह कितना लम्बा जीवन जीता है, यह भी महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण तो यही है कि वह जब तक जीता है, कितने आनन्द के साथ जीता है.

2. छोटी-छोटी बातों से दुःखी रहकर अपनी बड़ी-बड़ी खुशियाँ बर्बाद मत कीजिए. अपने आपसे अकारण नाराज रहकर अपनी इकलौती जिन्दगी बर्बाद मत कीजिए. अपने से आगे वालों के कारण आहत रहकर अपना वर्तमान बर्बाद मत कीजिए. अपने आप से प्यार करके तो देखिए, जिन्दगी न खोटी है, न छोटी.

3. जो कुछ भी अब तक मिला है वह कम नहीं है. जो कुछ मिल रहा है, वह भी कम नहीं है और जो कुछ आगे मिलेगा, वह भी कम नहीं रहेगा. इसलिए जो भी मिलता है, उसे सधन्यवाद् स्वीकार करते चलें. जो कुछ आप प्राप्त कर सकते हैं, हर संभव प्रयास करते हुए प्राप्त करते चलें. जिन्दगी के हर क्षण को आनन्द, उत्साह एवम् उमंग के साथ जीते चलें, यही जीवन की सम्पूर्णता है.

4. आपको जिन्दगी से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. आपको जमाने से भी कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. शिकायत ही करनी हो तो अपने आप से करनी चाहिए. खुद की शिकायत वैसे करोगे भी तो किससे? जो गुजर गया, उसकी तरफ न देखें. जो बचा है, उसे संभाल कर रखें. होश और जोश के लिए, सफल आक्रोश के लिए, बहुत अधिक समय की नहीं, सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है.

5. जिन्दगी को जरा नजदीक से देखो. तन की नहीं, मन की आँखों से देखो. कितने ही अस्त-व्यस्त रहो, परन्तु सदैव मस्त रहो. याद रखें, आपको इस संसार से केवल एक बार ही गुजरना है. आपका यहाँ होना प्रथम भी है और अन्तिम भी. स्वाभिमान, आत्म-संयम एवम् आत्मज्ञान से जीवन में आलोकिक शक्ति प्राप्त होती है और इसी शक्ति के माध्यम से आप मृत्यु के बाद भी याद किये जा सकते हैं.

6. जीवन तो खुदा का तोहफा है, समाज की अमानत है, ईश्वर की इबादत है. इसलिए इस प्रकार जीओ कि किसी को कोई शिकायत न रहे. अपने आपको कम से कम इतना तो जान लो कि खुद से कोई शिकायत न रहे. जीवन में धन का उतना महत्व नहीं है, जितना कि जीवन का है. जीवन का महत्व प्रसन्नता में निहित है और प्रसन्नता धन से नहीं, मन से आती है. तन और मन को स्वस्थ रखोगे तो आवश्यकतानुसार धन मिलता चला जायेगा.

7. जहाँ पैदा होना था, हो गये. जैसा रंग, रूप आकार प्रकार, मिलना था, मिल गया. जैसे माँ-बाप मिलने थे, मिल गये. जैसी शिक्षा-दीक्षा होनी थी, जहाँ शादी होनी थी, जैसी सन्तान होनी थी, हो गई. इन सबके लिए आपके पास कोई विकल्प भी तो नहीं थे. परन्तु जीवन को अपने ढंग से जीने, सुखी या दुःखी रहने, गरल या सुधारस पीने के विकल्प तो आपके पास ही हैं. इसलिए सही समय पर सही 

८.स्वस्थ तन, स्वस्थ मन, स्वस्थ धर्म, स्वस्थ कर्म, भरपूर नींद, गीत-संगीत, आमोद-प्रमोद, शांति एवम् प्रसन्नता के लिए व्यक्ति रात-दिन भटकता रहता है और अपने काम में इतना व्यस्त हो जाता है कि इन मूलभूत आवश्यकताओं को स्थगित करता रहता है. आँख तब खुलती है, जब आँख बन्द होने की घड़ी आ जाती है. इससे बड़ी दुर्भाग्य की बात और क्या हो सकती है. वर्तमान के सुख को स्थगित करना छोड़ दोगे तो दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदल दोगे.

9. दुनिया तो पता नहीं कब से चल रही है और पता नहीं कब तक चलती रहेगी. पर याद रखें, आपकी दुनिया तो आपके साथ ही समाप्त हो जायेगी. इसलिए जो भी क्षण मिल रहा है, वह अमूल्य है, पर्याप्त है. हर क्षण का सदुपयोग करो, यही जीवन की सार्थकता है, यही सफलता है. इससे बड़ी खुशी और हो भी नहीं सकती. यानी ‘हम है’ यही क्या कम है. ऐसा सोच लेने पर हर विपरीत परिस्थिति अनुकूल होती चली जायेगी.

निष्कर्ष- माना जाता है कि मानव जाति का आविर्भाव करोड़ों वर्ष पूर्व हुआ था. लगभग दस लाख सालों से तो आदमी इसी रूप में है, ऐसे प्रमाण मिल चुके हैं. इतने बड़े काल खण्ड में एक व्यक्ति का योगदान ही कितना है ? वह प्रारम्भ के पच्चीस वर्ष तो जीवन की तैयारी में व्यतीत कर देता है. मोटे रूप से व्यक्ति को मात्र पैंतीस वर्ष का क्रियाशील जीवन ही मिल पाता है. और वह भी तब, जबकि कोई औसत आयु तक जीवित रहे. इसलिए इस नितान्त ही नगण्य जीवन को गणनीय बनाओ, अल्प जीवन को अनुकरणीय बनाओ, तब आपको अपना जीवन किसी भी दृष्टि से घटिया नहीं लगेगा. जीवन को घटिया या बढ़िया बनाने का विकल्प तो केवल आपके पास ही विद्यमान है. कोई दूसरा आपके जीवन को घटिया अथवा बढ़िया नहीं बना सकता. प्रकृति ने आपको पूरा जीवन दिया है. समाज ने आपको पूर्णतः विकसित होने के पूरे-पूरे अवसर दिये हैं. फिर भी यदि आप जीवन को घटिया समझते हैं या उपयोगी नहीं बना पाते हैं तो निश्चित रूप से आप प्रकृति एवम् समाज के प्रति न्याय नहीं कर पायेंगे. 

अपने आपके प्रति वफादार रहें (Be True To Your Self) 

1.यदि आप अपने प्रति उत्तरदायी, प्रतिबद्ध एवम् वफादार रहेंगे तो आपको दूसरों के विषय में सोचने की आवश्यकता नहीं रहेगी. जब आप अपने आपको देखने के प्रयास करेंगे, तब आपको अपने अलावा किसी में कोई कमी दिखाई नहीं पड़ेगी. इसलिए कुछ भी बनने से पहले खुद के प्रति वफादार बनें. वफादारी-ईमानदारी के विषय में उसी प्रकार सोचें, जिस प्रकार आप किसी तूफान के समय अपने मकान की नींव के विषय में सोचते हैं.

2. आदमी अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए बहाने गढ़ने में माहिर होता है. बहाने गढ़ने का मतलब किसी और को नहीं, खुद को ही धोखा देना होता है. और जहाँ से धोखा आरम्भ होता है, वही से पतन भी आरम्भ हो जाता है. आदमी धोखा किसी को भी दे, हकीकत में धोखा वह खुद को ही देता है. जब आप खुद को धोखे में नहीं रखेंगे, तब दूसरे भी आपको धोखा नहीं दे पायेंगे. जब तक आप दूसरों को धोखा देने की नहीं सोचेंगे, तब तक आप धोखा खाने से बचे रहेंगे. इसलिए धोखा देने और धोखा खाने से बचें. आदमी जितना प्रेम से भरा होगा, उतना ही नम्रता से भरा होगा. जितना नम्रता से भरा होगा, उतना ही वफादार और खरा होगा. प्रेम के बिना नम्रता का और नम्रता के बिना वफादारी का कोई अर्थ नहीं है. वफादारी के बिना किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता. याद रखें, दुनिया आपके भरोसे नहीं है, परन्तु आप दुनिया के भरोसे हैं. और दुनिया का भरोसा तब तक ही है, जब तक कि आप वफादार हैं..

4. सफल होने के लिए आपको अपना जीवन दाव पर लगाना पड़ेगा. हर पल, हर क्षण, हर मोड़ पर अपने आपको सक्षम सिद्ध करना होगा. सक्षमता और प्रामाणिकता के बिना तो आप इस आपाधापी और प्रतियोगी जगत में कुछ भी नहीं कर पायेंगे. और हाँ, प्रामाणिकता के लिए वफादारी एक अनिवार्य शर्त है.

5. यदि आपने अपनी योजना के लिए कुछ सिद्धान्त बनाये हैं, दैनिक कार्यक्रम और लक्ष्य निर्धारित किये हैं, तो गंभीरतापूर्वक पूरी ईमानदारी के साथ समयबद्ध तरीके से उन पर अमल करते चलें, निष्काम-निष्ठा और पूर्ण सत्यनिष्ठा के साथ पहल करें, केवल अपने प्रति ही नहीं, सबके प्रति वफादार रहें, दुनिया के बारे में कही गई हर बात पर आप विश्वास कर सकते हैं, क्योंकि यहाँ असंभव कुछ भी नहीं है. हम विश्वास के आधार पर ही आगे बढ़ सकते हैं, वरना अकेले नेत्रों के आधार पर तो एक कदम बढ़ाना भी संभव नहीं है, और विश्वास वफादारी से ही पनपता है.

6. सकारात्मक सोच, आत्म–विश्वास, ईमानदारी, दृढ़ता, लक्ष्यबद्धता, परिपक्वता और नैतिक मूल्यों के साथ चलकर ही कोई सफलता को उपलब्ध हो सकता है. इन सब योग्यताओं के होते हुए भी यदि व्यक्ति में वफादारी और सच्चाई नहीं हो तो सफलता संभव ही नहीं है, यह सही है कि कफन के जेब नहीं होती, किन्तु सच्चाई की सफेदी और अच्छाई की सुगंध तो होती ही है.

7. आत्म-संतुष्टि, सुन्दर दिखने की चाहत और समय के साथ कदम मिलाने की आकांक्षा अपनी उम्र से कम दिखने के लिए अपेक्षित होती है. किन्तु यह तब ही संभव है, जबकि दिल में सच्चाई हो, सच्चाई में अच्छाई हो. सच्चाई आपकी हर कमजोरी को अच्छाई में बदलने की क्षमता रखती है और अच्छाई आपके विश्वास को सफलता में बदलने की क्षमता रखती है. पर याद रखें, वफादारी के बिना सच्चाई का और सच्चाई के बिना वफादारी का कोई महत्व नहीं है.

8. जब आप अपने आपके प्रति, परिवार के प्रति, समाज के प्रति, राष्ट्र के प्रति और अपने काम के प्रति वफादार रहेंगे तो आपको अपने होने का अहसास होगा. अपने आप पर गर्व होगा. अपना जीवन सार्थक लगेगा. लोग आपका अनुसरण करेंगे, आपका सम्मान करेंगे. तब आप में एक रूपान्तरण घटित होगा. आपकी कार्यशैली को देख कर हर कोई चकित होगा. जीवन की सफलता के लिए तन, मन और चिन्तन की स्वस्थता आवश्यक है. तन, मन और चिन्तन की स्वस्थता के लिए वचनबद्धता, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी यानी वफादारी आवश्यक है.

9. जब तक बून्द अपने आपको सागर में विलीन नहीं कर देती, तब तक वह सागर को नहीं जान सकती. उसी तरह जब तक आत्मा परमात्मा से समरसता स्थापित नहीं कर लेती, तब तक परमात्मा को पहचान नहीं सकती. याद रखें, सागर का अस्तित्व बून्दों के कारण ही है. बरसात का अस्तित्व भी बून्दों के कारण ही है. बरसात के लिए ऊपर से कोई जलधार नहीं गिरती, बून्दें ही गिरती हैं और ये बून्हें ही मिलकर नदी-नालों में उफान ला देती हैं. इसी प्रकार हम सब भी इस संसार रूपी सागर की बून्दें ही हैं. अपने कर्तव्यों का सच्चाई के साथ पालन करके ही हम अपने मानव धर्म का निर्वाह कर सकते हैं, अपने ‘अहम्’ को विसर्जित किये बगैर हम अपने प्रति वफादार नहीं हो सकते.

दृष्टान्त- जलती हुई मोमबत्ती के धागे ने मोमबत्ती से पूछा-‘मैं तो जल रहा हूँ, यह ठीक है, किन्तु तू मेरे साथ-साथ अपने आपको क्यों जला रही है ?’ इस पर मोमबत्ती ने जवाब दिया-‘जिसको मैंने अपने दिल में बसा रखा है, उसे अकेले जलता हुआ भी तो नहीं देख सकती.’ तो यही है दिल की वफादारी, आत्मा की सच्चाई. जब आपको कोई सहयोग करता है, तब आपका भी कर्तव्य बनता है कि आप भी उसे पूरे मन से सहयोग करें. हम अपने तन, मन और विश्वास को भी धोखा दे सकते हैं, किन्तु अपनी अन्तआत्मा को धोखा नहीं दे सकते. वफादार होने के लिए यह अकेला कारण ही पर्याप्त है. 

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