Self Confidence in hindi-जिन्दगी को भार मत समझिए (Do Not Consider “Life” A Burden) 

Self Confidence in hindi

Self Confidence in hindi-जिन्दगी को भार मत समझिए (Do Not Consider “Life” A Burden) 

1.वस्तुतः मानव जीवन अपने आपमें अनुपम, अनमोल एवम् दुर्लभ है. हमारे लिए तो यही प्रथम एवं अन्तिम है, बस यही सुलभ है. इसके आगे-पीछे का हमें कोई पता नहीं है, तब इस एकमात्र जीवन को बोझिल क्यों बनायें, बेगार क्यों समझें, याद रखें, जिसने जन्म दिया है, वह दुश्मन तो हो नहीं सकता. फिर हमें इस इकलौते जीवन के साथ दुश्मनी करने का अधिकार किसने दे दिया ? तो आइए, जीवन को दोस्त समझें, न बेकार समझें, न बेगार समझें.

2. हम व्यर्थ में ही विगत की गलतियों-विसंगतियों का भार अपने सिर पर उठाये फिरते हैं. अस्तित्व हीन हुए अतीत के भूत को वर्तमान के कंधो पर जबरदस्ती उठाये फिरते हैं. यही हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य है. ‘भूत’ के कारण ही हमारा जीवन भार युक्त है. इसलिए भूत को भगाइए, जीवन को भार मुक्त बनाइए.

3. हमें जीवन भार लगता है, भविष्य की आशंकाओं के कारण. और भविष्य अनिश्चित लगता है, वर्तमान की गलत धारणाओं के कारण. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भविष्य का तो कोई अस्तित्व ही नहीं है. भविष्य तो वर्तमान बन कर ही आता है. बस वर्तमान का ही अस्तित्व है और वर्तमान भी बहुत ही तेजी से भूत बनता चला जाता है, इसलिए निर्भार रहना हो तो हमें केवल वर्तमान को ही पकड़ना होगा.

4. हमारी अधिकांश चिन्तायें धन को लेकर होती हैं, धन के बाद कल को लेकर होती हैं. ‘धन’ और ‘कल’ को हम जितना सुनिश्चित कर लेना चाहते हैं, उतने ही उलझनों में फंसते चले जाते हैं. ‘धन’ और ‘कल’ की अनिश्चितता हमारी आज की सफलता को प्रभावित करती है, हमारी असली सफलता तो यही है कि ‘धन’ और ‘कल’ की चिन्ता न करते हुए अपने कार्य को बढ़िया से बढ़िया तरीके से करते रहें. ‘धन’ और ‘कल’ का भार अपने आप उतरता चला जायेगा. 

5.आदमी खुद के लिए नहीं, अपने परिवार के लिए जीता है. परिजनों के लिए जमाने भर के गम पीता है. यदि वह परिवार और पारिवारिक उत्तरदायित्वों को सीमित रखता है, तो जीवन उसे कभी भार नहीं लगेगा. याद रखें, जीवन को समग्रता, सहजता और सफलता के साथ सार्थक तरीके से जीने के लिए बहुत अधिक ‘अर्थ’ की आवश्यकता नहीं होती. बस हमें जीने की कला आनी चाहिए. जिन्दगी को धूम-धड़ाके से जीना चाहिए. जीवन जितना हल्का होगा, उतना ही सार्थक होगा.

6. ईश्वर ने हमको बहुत ही सुन्दर, सहज और आनन्दयुक्त जीवन दिया है. इसे असुन्दर, असहज एवम् कष्ट युक्त बनाने का हमें कोई अधिकार नहीं है. समाज ने हमको जीवन धर्म निभाने हेतु कुछ न कुछ प्रयोजन भी दिया है. हम अपने प्रयोजन में जितने व्यस्त रहेंगे, उतने ही हल्के, चुस्त, दुरूस्त और स्वस्थ्य रहेंगे. जीवन भार न लगे, इसके लिए जरूरी है कि हम व्यस्त रहें, पर अस्त-व्यस्त न रहें. 

7.कहते हैं, देवता उड़ते हैं, क्योंकि वे अपने को हल्का महसूस करते हैं. याद रखें, उड़ने के लिए हल्का होना जरूरी नहीं है, हल्का महसूस करना जरूरी है. बचपन में हम जो सपने देखते हैं, उनमें से बहुत कम ही पूरे हो पाते हैं. हम सदैव तनावग्रस्त रहते हैं, क्योंकि सपनों की तुलना में जीवन को अत्यधिक छोटा पाते हैं. इसलिए हमें व्यर्थ एवम् अव्यावहारिक सपनों को भूलते हुए, जो कर रहे हैं, उसी के सपने देखने चाहिए. तब ही हम तनाव एवम् भार मुक्त होकर आगे बढ़ सकते हैं.

8. मानसिक, शारीरिक एवम् आध्यात्मिक स्वास्थ्य, भरपूर नींद, गीत-संगीत, हास-परिहास, भ्रमण-मनोरंजन आदि जीवन के मजेदार पहलू हैं, जो जीवन को सहज व सरल बनाये रखने के लिए जरूरी हैं. कहा जाता है कि मानसिक दर्द, शारीरिक दर्द से भी कई गुना भयानक होता है. अर्थात् तनावग्रस्त मानसिक स्थिति के कारण ही हमें जीवन भार लगता है. तो आइए, मन को नियन्त्रित करें, मस्तिष्क को सम्यक रूप से विकसित करें और निर्भार होकर आगे बढ़ते रहें.

9. गुब्बारा अपने रंग के कारण नहीं उड़ता, बल्कि उसके भीतर भरी हल्की गैस के कारण उड़ता है. व्यक्ति अपने रूप-रंग के कारण नहीं, बल्कि अपने भारमुक्त नजरिए के कारण ऊपर उठता है. याद रखें, चट्टान जब गिरती है तो चूर-चूर हो जाती है और पानी जब गिरता है तो सौन्दर्य दोगुना हो जाता है. इसलिए हमें चट्टान की तरह नहीं, पानी की तरह सहज, सरल, निर्मल और पारदर्शी होना चाहिए.

दृष्टान्त- हाथी के बच्चे को एक पतली सी रस्सी के सहारे किसी छोटी सी छूटी से बाँध दिया जाता है. आरम्भ में हाथी का बच्चा रस्सी के साथ जोर आजमाइश करता है, किन्तु सफल नहीं हो पाता है. धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता है, किन्तु रस्सी व खूटी में कोई परिवर्तन नहीं होता. जवान होने पर भी हाथी उसी पतली रस्सी के सहारे आराम से बंधा रहता है. वह चाहे तो हल्के से झटके से रस्सी को तोड़ सकता है, खूटी को उखाड़ सकता है, किन्तु वह ऐसा नहीं कर पाता. कारण कि वह बचपन से इसी रस्सी से बंधता चला आ रहा है, बचपन की नाकामयाबी अब भी उसके जहन में बसी हुई है. अभी भी वह अपने आपको उस रस्सी की तुलना में कमजोर महसूस करता है. इसी तरह हम भी पतले-पतले कई कच्चे धागों से बंधे हुए हैं और जिन्दगी को भार समझ बैठे हैं. 

Self confidence improvement tips in hindi-सकारात्मक सोच ही जिन्दगी का निचोड़ है (Positive Thinking is the Crux of Life) 

1.अपना जीवन स्तर ऊँचा उठाने, समाज में सम्मानजनक स्थान बनाने एवम् अपना बाजार मूल्य बढ़ाने के लिए दौलत की नहीं, सकारात्मक सोच की आवश्यकता होती है. सकारात्मक सोच वाला व्यक्ति ही उत्तरदायी, व्यावहारिक, स्वाभिमानी, आशावादी, लक्ष्यवादी, स्वप्नदृष्टा, भविष्यदृष्टा, शांतिप्रिय, प्रतिबद्ध और रचनात्मक हो सकता है. इसलिए ‘मैं यह नहीं कर सकता, यह मत सोचिए. यही सोचिए कि ‘मैं क्या नहीं कर सकता.’ यही सकारात्मक सोच है.

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2. सकारात्मक सोच विकसित होता है, सकारात्मक ऊर्जाओं से. सकारात्मक ऊर्जायें उपलब्ध हैं, जिन्दगी के हर मौड़ पर. शारीरिक, मानसिक एवम् आध्यात्मिक आरोग्यता, बाह्य एवम् आन्तरिक प्रकाश, पर्यावरणीय सन्तुलन, घर, कार्यस्थल एवम् आस-पास की स्वच्छता, अहम् शून्यता, लालच विहीनता, घृणा से रिक्तता, ज्ञान की प्रचुरता आदि से विशेष सकारात्मक ऊर्जायें प्राप्त होती हैं.

3.सकारात्मक सोच के बिना हम न तो विफलता से सफलता की ओर बढ़ सकते हैं और न ही सफलता से महानता की ओर बढ़ सकते हैं. सकारात्मक सोच के बिना हम न तो अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर सकते हैं और न ही दूसरों के व्यक्तित्व को स्वीकार कर सकते हैं. सकारात्मक सोच के बिना तो वस्तुतः हम कुछ भी नहीं कर सकते. किसी भी कार्य के प्रति जैसा हमारा नजरिया होगा, वैसे ही कार्य परिणाम होंगे. ईश्वर ने आपको शक्ल दी है, पर उस पर भाव तो आपको ही लाने हैं.

4.ईश्वर ने आपको अक्ल दी है, पर उसमें विचार तो आपको ही लाने हैं. याद रखें, अच्छे भाव और अच्छे विचार आपके सकारात्मक सोच पर ही निर्भर करते हैं. वस्तुतः जीवन एक उत्सव है. जीवन का हर क्षण आनन्द का क्षण है. यदि आपके पास सकारात्मक सोच है, तब आपको उत्सव व आनन्द को ढूँढ़ने के लिए कहीं भी भटकने की आवश्यकता नहीं है.

5. जब हम आधे भरे हुए गिलास को आधा खाली मानते हैं, तो यही हमारा नकारात्मक नजरिया है. और जब आधे खाली गिलास को आधा भरा हुआ मान लेते हैं तो यही हमारा सकारात्मक नजरिया है. हम अक्सर यह भूल ही जाते हैं कि आधा खाली गिलास आधा भरा हुआ भी होता है. और जो आधा भरा है, उसे पूरा भी भरा जा सकता है.

6. अक्सर हम ऐसी छोटी-छोटी बातों की चिन्ता करते रहते हैं, जिनमें से अधिकांश तो कभी घटित ही नहीं होती. घटना की बजाय विचारों से अधिक चोट पहुँचती है. नकारात्मक नजरिये के कारण हमारी आशंकायें बढ़ती चली जाती हैं. हमारे अवचेतन में निरर्थक एवम् काल्पनिक घटनायें घटती चली जाती हैं. इस तरह हमारी हर गतिविधि बुरी तरह प्रभावित होती रहती है, अर्थात् नकारात्मक नजरिया हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है, जो सबसे नजदीक है. 

7.जरा सोचिए कि आप उदास क्यों है ? जरा हिसाब लगाकर तो देखिए, नब्बे प्रतिशत चीजें तो जिन्दगी में सही ही होती हैं, केवल दस प्रतिशत ही आपकी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होती. आपको दोनों वक्त का भोजन मिल रहा है, फिर भी आप निश्चिन्त नहीं हैं. जरा उसकी तो सोचिए, जिसके लिए एक वक्त की रोटी भी निश्चित नहीं है. अर्थात् आपकी उदासी का कारण आपका नजरिया ही है.

8. वातावरण, अनुभव, शिक्षण-प्रशिक्षण, चिन्तन, ध्यान, धैर्य, गांभीर्य सकारात्मक सोच के साधन हैं. उत्पादन वृद्धि, गुणवत्ता-वृद्धि, लाभ-वृद्धि, बन्धुत्व, रिश्तों की समझ, तनाव में कमी, व्यक्तित्व निर्माण, समाज एवम् राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्वों का भान केवल सकारात्मक सोच के कारण ही संभव है. नयी पीढ़ी के लिए ज्यादा मत सोचिए, केवल इतना ही सोचिए कि वह आयी कहाँ से है.

9. याद रखें, अमीरी की बातें करते करते एक गरीब आदमी भी अमीर हो सकता है और गरीबी की बातें करते-करते एक अमीर भी गरीब हो सकता है. किसी पेट्रोल पम्प पर नौकरी करने वाला एक साधारण व्यक्ति भी अपने सकारात्मक सोच के आधार पर खुद की रिफायनरी स्थापित कर सकता है और पूरे देश में अपने पेट्रोल पम्पों की श्रृंखला खड़ी कर सकता है. अर्थात् अमीरी और गरीबी हमारे नजरिए पर ही निर्भर करती है.

दृष्टान्त –जूते बनाने वाली एक कम्पनी ने अपना कारोबार एक ऐसे  इलाके में फैलाने की योजना बनाई, जहाँ के लोग जूते पहनते ही नहीं थे. योजनानुसार कम्पनी द्वारा अपना एक प्रतिनिधि उस इलाके में सर्वे हेतु भेजा गया. सर्वे के बाद प्रतिनिधि ने ‘ रिपोर्ट प्रस्तुत की कि यहाँ तो लोगों को जूते पहनने की आदत ही नहीं है, आखिर जूते खरीदेगा कौन ? इस पर कम्पनी ने अपना एक दूसरा प्रतिनिधि भेजा. दूसरे प्रतिनिधि ने सर्वे करके रिपोर्ट दी कि जूते खूब बिकेंगे, बस लोगों को जूतों का महत्व समझाना होगा. इस रिपोर्ट पर कम्पनी ने अमल किया. आशा से भी अधिक जूते बिकने लगे. यहाँ प्रथम प्रतिनिधि नकारात्मक सोच वाला था और दूसरा प्रतिनिधि सकारात्मक सोच वाला.

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