Self confidence improvement tips in hindi-सफलता के लिए सृजनशीलता एक अनिवार्यता है

Self confidence improvement tips in hindi

Self confidence improvement tips in hindi- सफलता के लिए सृजनशीलता एक अनिवार्यता है (Creativity is A ‘Must For Success) 

1.यदि आप एक-एक कदम रचनात्मक ढंग से उठाते हुए चोटी पर पहुँचते हैं तो आपको अत्यधिक आनन्द की अनुभूति होगी. यदि आप हेलीकॉप्टर द्वारा सीधे ही चोटी पर पहुँच जाते हैं, तब आप रचनात्मक आनन्द से वंचित रह जायेंगे. जमीन से जुड़ी चढ़ने की अनुभूति से वंचित रह जायेंगे. याद रखें, सृजनशीलता में ही असली आनन्द है और आनन्द ही सफलता है. जिस सफलता से आनन्द की अनुभूति न हो, वह कुछ भी हो सकती है, परन्तु सफलता नहीं हो सकती.

2. आप कोई भी कार्य करें, उसमें अपनी सृजनशीलता का भरपूर उपयोग करें. किसी भी कार्य को आरम्भ करने से पूर्व तत्सम्बन्धी समस्त तथ्य एकत्रित करें, तथ्यों का विश्लेषण करें, तुलनात्मक अध्ययन करें. फिर किसी सर्वसम्मत निर्णय पर पहुँचे. लक्ष्य निर्धारित करें। कार्य योजना तैयार करें. उपलब्ध संसाधनों का कलात्मक ढंग से उपयोग करते हुए अपने लक्ष्यों की ओर बढ़े. कार्य सम्पादन के दौरान नये-नये विचारों, नवाचारों का प्रयोग करते हुए कर्म क्षेत्र की सीढ़ियाँ चढ़ें. तब जो भी सफलता मिलेगी, वह कलात्मक सफलता होगी, एक विशिष्ट सफलता होगी. तब हर कदम में आपकी रचनात्मकता की झलक मिलेगी.

3. आपकी पहचान आपके काम से होती है. काम की पहचान कार्य प्रणाली से होती है. कार्यप्रणाली की पहचान कल्पनाशीलता से होती है. और कल्पना की पहचान सृजनशीलता से होती है. आप जितने कल्पनाशील होंगे, उतने ही सृजनशील होंगे. जितने सृजनशील होंगे, उतने ही प्रगतिशील होंगे. कार्य सम्पादन में जितनी विविधतायें होंगी, उतने ही आप लोकप्रिय होंगे, उतने ही आप आकर्षक व्यक्तित्व के धनी होंगे.

4. वस्तुतः आपके सभी कार्यकलापों का स्रोत आपका मस्तिष्क होता है. मस्तिष्क जितना कल्पनाशील रहेगा, उतना ही सृजनशील रहेगा. याद रखें, कल्पनाशील मस्तिष्क बिना थके अन्त तक क्रियाशील रहता है. सृजनशीलता से एक-रसता, नीरसता टूटती है, चेहरे पर अनुपम आनन्द की आभा फूटती है. सृजनशीलता आपके आभामण्डल में विस्तार करती है.

5. सृजनशीलता के लिए सोचना जरूरी है और सोचना ही सबसे अधिक परिश्रम का काम है. परिश्रम के लिए प्रोत्साहन जरूरी है और प्रोत्साहन महज सृजनशीलता का ही परिणाम है. सृजनशीलता से प्रशंसा, प्रशंसा से प्रोत्साहन और प्रोत्साहन से सफलता आसान होती है. अर्थात् सृजनशीलता के अभाव में हर सफलता अधूरी होती है. सफलता से अधिक सृजनशीलता जरूरी होती है. सृजनशीलता के बिना जिन्दगी, जिन्दगी नहीं होती. 

6.सफलता के लिए विश्वास, विश्वास के लिए दृढ़ संकल्प, संकल्प के लिए शान्ति और शान्ति के लिए सृजनशीलता आवश्यक है. सृजनशीलता के लिए मौन आवश्यक है. इसलिए यथा संभव मौन में उतरो, मौन में उतरने पर ही कल्पना के पंख लगना संभव है. याद रखें, जो सृजनशील होता है, वही नैतृत्व प्रदान कर सकता है.

7. प्रेम, कोमलता और क्षमा की भावना का उदय सृजनशीलता पर ही निर्भर करता है. दया, करूणा और मित्रता की भावना का प्रादुर्भाव कलात्मकता पर ही निर्भर करता है. कृषि, व्यापार, उत्पादन, उद्योग और सेवाओं से सम्बन्धित आपके विभिन्न कार्य हो सकते हैं. यदि आप प्रत्येक कार्य के रचनात्मक पहलुओं पर अधिक ध्यान देंगे तो कार्य करने में अत्यधिक आनन्द आयेगा. आपके सम्पर्क में आने वाले सभी व्यक्ति आपकी रचनात्मकता के कायल होंगे.

8. यदि हम सृजनशील नहीं हैं तो हमें जीवन के दर्पण में दरारें ही दरारें नजर आयेंगी. यदि हम सृजनशीलता के प्रति व्यवस्थित रूप से बहरे बने रहेंगे तो चेतना की सूक्ष्म-वाणियाँ व्यर्थ ही जायेंगी. जब हमारा सोच रचनात्मक होगा, तब हमारा हर कार्य कलात्मक होगा. हमारी कलात्मकता ही हमारे बहरेपन को तोड़ने में सहायक होगी.

9. कला के लिए बुद्धि और हृदय की आवश्यकता होती है, धन की नहीं. व्यक्ति और प्रकृति का समन्वय ही कला है. कला तो ईश्वरीय प्रेरणा है, इसलिए किसी कलाकृति का मूल्यांकन उसके गुण-दोषों से नहीं, भावनाओं से किया जाना चाहिए. सबसे महान कलाकार वही है, जो अपने समूचे जीवन को ही कला का विषय बना लेता है. कला अति सूक्ष्म और कोमल होती है. कला व्यक्ति के मस्तिष्क को भी सूक्ष्मदर्शी और कोमल बना देती है. मस्तिष्क की कोमलता ही रचनात्मकता का सृजन करती है. रचनात्मकता ही सबसे बड़ी शक्ति है.

निष्कर्ष –उठने-बैठने, सोने-जगने, नहाने-धोने, खाने-पीने, सजने-संवरने, सुनने-सुनाने आदि दैनिक कार्यों में सृजनशीलता द्वारा सौन्दर्य भरा जा सकता है. जिसके हर कार्य में सौन्दर्य हो, उसे सब पसंद करते हैं. घर, दुकान, फैक्ट्री, ऑफिस आदि को किस प्रकार आकर्षक बनाया जा सकता है ? कौन-सा निर्माण कहाँ और कैसे करवाया जाना है ? कौनसी डिजाइन कहाँ देनी है ? कहाँ कौन-सी वस्तु रखनी या है ? किसी उत्पाद को कलात्मक और अधिक उपयोगी कैसे बनाया जा सकता है ? दिल में उतर जाने वाले विज्ञापन का आधार क्या हो सकता है ? आदि प्रश्नों के उत्तर हमारी सृजनात्मक प्रवृत्ति में ही निहित है. वैसे इस सृष्टि में सबसे बड़ा कलाकार तो परमात्मा ही है, जिसकी सृजनात्मक गतिविधियाँ निरन्तर चल रही हैं. किन्तु हम भी तो परमात्मा के ही प्रतिनिधि हैं, कुछ न कुछ सृजित करते रहना हमारा भी स्वभाव है. हम अपने स्वभाव को कैसे छोड़ सकते हैं. 

सफलता के लिए निरन्तरता प्रथम एवम् अन्तिम शर्त है (Continuity is The First & Last Condition of Success) 

१.जिस प्रकार एक साइकिल सवार को सन्तुलन बनाये रखने के लिए साइकिल को लगातार चलाते रहना जरूरी है, उसी प्रकार जिन्दगी के सन्तुलन को बनाये रखने के लिए कार्यों की गति को निरन्तर बनाये रखना जरूरी है. अन्यथा जिन्दगी का सफर ही व्यर्थ है. जब भी निरन्तरता का क्रम टूटता है, व्यक्ति औंधे मुँह गिर पड़ता है, तब संभल कर दुबारा चलने में काफी वक्त लग जाता है. पर याद रखें, गिरने का अर्थ लौटना नहीं होता, उठ कर पुनः चलना होता है…

2. जब पूरी प्रकृति और समूची सृष्टि ही निरन्तरता के क्रम से आगे बढ़ रही है, तब हम निरन्तरता को तोड़ने का साहस कैसे कर सकते हैं, जब हर व्यवसाय और हर व्यवस्था में समाज के अमूल्य संसाधन लगे हुए हैं, तब हम अपना काम रोक कर या छोड़कर समाज को क्षति पहुँचाने का दुस्साहस कैसे कर सकते हैं. समाज तो स्थायी है, व्यक्ति तदर्थ है. इसलिए जब तक दौड़ सकते हैं, दौड़ें. जब तक चल सकते हैं, चलें. किन्तु निरन्तरता बनाये रखें. निरन्तर चलने वाला कभी किसी के पीछे नहीं रह सकता. निरन्तरता के लिए तेज गति से चलना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्वपूर्ण है, निरन्तर चलना.

3. किसी फिल्माये गये सीन को जब निरन्तरता एवम् निश्चित गति के साथ चलाया जाता है, तब ही अभिनय सजीव हो पाता है, इसी प्रकार निरन्तर एवम् निश्चित गति के साथ कार्य करते रहने पर ही व्यक्ति का सपना साकार हो सकता है. जिस प्रकार विद्युत लाइन में करंट बनाये रखने के लिए करंट की निरन्तरता जरूरी है, उसी प्रकार कार्य के प्रवाह को प्रभावी बनाये रखने के लिए कार्य की निरन्तरता जरूरी है.

4. घाणी के बैल को एक ही सर्किल में लगातार घुमाने के लिए चालाकी से उसकी आँखों पर पट्टी और गले में घण्टी बाँध दी जाती है, ताकि बैल को यही लगे कि वह सीधे रास्ते पर निरन्तर आगे बढ़ रहा है और मालिक को दूर से ही पता चलता रहे कि बैल घूम रहा है. जरा सोचिए, अगर बैल आदमी की तरह चालाक होता तो एक ही स्थान पर खड़ा रह कर गर्दन हिलाता रहता और घण्टी बजाता रहता. आदमी चालाक है, इसीलिए निरन्तरता भंग करने के अलग-अलग बहाने ढूँढ़ता रहता है.

5. निरन्तर परिश्रम करने वाला और सदैव कार्यरत रहने वाला ही सफल हो सकता है. गिर-गिर कर संभलने वाला ही आगे बढ़ सकता है. इसलिए कभी किसी एक लक्ष्य पर या एक पड़ाव पर कभी मत ठहरिए, विफल होने पर कभी हताश मत होइए. आशा और विश्वास के साथ लगातार प्रयास करते रहिए, क्या पता सफलता बस एक कदम ही दूर हो. प्रकृति सदैव नवीन एवम् विचित्र रूपों में परिवर्तित होती रहती है. परिस्थिति सदैव बदलती रहती है. इसलिए लगातार काम करने वाला ही प्रकृति और परिस्थिति को अपने अनुकूल बना सकता है.

6. जो भी कार्य आपके हाथ में है, उसे निरन्तर, नियमित एवम् निर्बाध गति से करते रहें, तब आपको सफलता की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है. मजा तो तब है, जब आपको सफलता की नहीं, सफलता को आपकी फिक्र रहे. और यह संभव है, अगर आप अपने कार्यों में निरन्तरता बनाये रखें.

7. जब सूरज, चाँद, सितारे और प्रकृति के सभी अनुभाग बिना रूके निरन्तर कार्य कर सकते हैं, जब हमारे शरीर के सभी अवयव बिना क्षणिक विराम के निरन्तर सक्रिय रह सकते हैं, तब हम निरन्तर कार्य क्यों नहीं कर सकते ? यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें जीवन में जो कुछ भी मिलता है, उधार ही मिलता है और निरन्तर सजग एवम् सक्रिय रह कर ही हम उधार चुका सकते हैं.

8. वस्तुतः जीवन अत्यन्त ही छोटा एवम् नितान्त अनिश्चित होता है. यहाँ सब कुछ अनिश्चित ही होता है. अनिश्चितता भरे इस जगत में केवल समय का प्रवाह ही निश्चित होता है. काल की गति से कुछ तो सीखें. अपने कार्यों में निरन्तरता और समन्वय बनाये रखें. जब आप निरन्तरता बनाये रखेंगे तो बाकी लोग भी ऐसा ही करेंगे.

9. जब किसी कार्य में निरन्तरता भंग होती है, तो उसमें रूकावट आ जाती है. जब कार्य की गति मन्द होती है तो कर्त्ताओं में थकावट आ जाती है, बार-बार व्यवधान होने पर तो कार्य की सफलता ही संदिग्ध हो जाती है. इसलिए निरन्तर आगे बढ़ते रहें. हवा के रूख का भी ध्यान रखें. याद रखें, हवा के विपरीत निरन्तर चलने वाला भी एक दिन किनारे पहुँच ही जाता है.

दृष्टान्त- एक साधु रात्रि को कहीं से लौट रहा था. अचानक बरसात शुरू हो गई, बस्ती से बाहर किसी घर पर उसने दस्तक दी. मेजवान ने साधु को आश्रय दिया. साधु को अन्दर सुलाकर मेजवान अपने काम पर चला गया. और सूर्योदय से पूर्व ही लौट आया. साधु ने पूछा-‘काम हुआ ?’ मेजवान–’आज तो नहीं हुआ, लेकिन कल हो जायेगा.’ साधु-‘ऐसा कौनसा कार्य है जो केवल रात को ही होता है ?’ मेजवान-‘मेरा काम कुछ ऐसा ही है, होने पर सब बता दूंगा.’ मेजवान दिन भर साधु की सेवा करता और रात को अपने काम पर चला जाता. सुबह लौट आता. साधु की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी. करीब एक पखवाड़े बाद मेजवान एक दिन ढेर सारे आभूषणों के साथ लौटा 

और बोला-‘महाराज आज कामयाबी मिल गई है.’ साधु ने आश्चर्य से पूछा-‘इतने सारे आभूषण ?’ मेजवान ने स्पष्ट किया-‘क्षमा करें, महाराज मैं एक चोर हूँ, लगातार एक हवेली में चोरी करने जा रहा था, किन्तु कभी कुत्ते भौंकने लगते, कभी चौकीदार जग जाता, किन्तु आज कोई व्यवधान नहीं हुआ. मुझे आशीर्वाद दें कि मैं इसी तरह कामयाब होता रहूँ.’ इस पर साधु ने चोर के पैर पकड़ लिए और बोला-‘मैं आज से आपको गुरु मान कर चलूँगा. आशीर्वाद तो अब मुझे आपसे चाहिए, ताकि मैं अपनी साधना में सफल हो सकूँ, मैंने निराश होकर अपनी साधनायें कई बार बीच में ही छोड़ दी हैं, पर अब नहीं छोडूंगा.’ साधु अपने आश्रम को लौट गया. 

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