Self belief in Hindi:लाभ-हानि का आकलन भी करते चलिए (Profits & Losses Be Assessed At Every Stage) 

Self belief in Hindi

Self belief in Hindi:लाभ-हानि का आकलन भी करते चलिए (Profits & Losses Be Assessed At Every Stage) 

1.जिन्दगी की साइकिल के नफा-नुकसान रूपी दो पहिए लगे हैं. नफा रूपी पिछले पहिए पर हम जितने पैडिल मारते हैं, नुकसान रूपी अगला पहिया उतना ही आगे बढ़ता है और नुकसान को पाटता चलता है. यह भी सही है कि साइकिल का संतुलन बनाये रखना और दायें-बायें मोड़ना अगले पहिए पर ही निर्भर करता है. अर्थात् संतुलन के लिए नुकसान भी नफे के साथ जुड़ा हुआ है.

2. सदैव हानि ही हो या लाभ ही हो, ऐसा संभव नहीं है. लाभ-हानि तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इनमें से किसी एक को पकड़ पाना संभव नहीं है. अर्थात् दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर करता है. इसलिए यदि आप कार्य अथवा व्यवहार के साथ-साथ लाभ-हानि का मूल्यांकन भी करते चलेंगे तो लाभ-हानि का ग्राफ आइने की तरह हर वक्त साफ रहेगा. और यही आपकी सफलता का सबसे बड़ा रहस्य होगा..

3. आप कुछ भी करें, किन्तु उसे लाभ-हानि की दृष्टि से अवश्य परख लें. लाभ की गणना करने से पहले सभी ज्ञात-अज्ञात एवम् संभावित खर्चों को जोड़ लें. किसमें लाभ है ? कितना लाभ है ? इसे कैसे बढ़ाया जा सकता है ? किसमें घाटा है ? कितना घाटा है ? घाटे को कैसे घटाया जा सकता है ? आदि प्रश्नों को साथ-साथ हल करते चलें, वरना बाद में पछताने के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा.

4.लाभ-हानि के आँकड़े तो टिप्स पर होने चाहिए. एक के खोने पर दो पाने के हौंसले होने चाहिए. आपका प्रत्येक कार्य कलाप और हर चिन्तन घाटे को कम करने और लाभ को बढ़ाने की दिशा में होना चाहिए. यदि आप लाभ-हानि के प्रति सदैव सजग एवम् सावधान नहीं रहे तो एक दिन बाजी आपके हाथ से निकल चुकी होगी.

5. यदि भविष्य में लाभ की आशा न हो तो सौ रुपये की वस्तु को नब्बे रूपये में बेच सकते हो और अधिक घाटे से बच सकते हो. घाटे को एक निश्चित बिन्दु पर तत्काल रोकना ही सबसे बड़ी समझदारी है. इस तरह संभावित घाटे को काल्पनिक लाभ में बदला जा सकता है और इस नब्बे रूपये को किसी अन्य वस्तु में निवेशित करते हुए वास्तविक घाटे को वास्तविक लाभ में बदला जा सकता है. याद रखें, पैसा जितनी तेजी से चक्कर लगायेगा, उतनी ही तेजी से बढ़ता चला जायेगा.

6. यदि आपकी लागतें बढ़ रही हैं तो कीमतें कम करने के प्रयास करें, ताकि उत्पाद बिक सकें. यदि प्रतियोगितायें बढ़ रही हैं तो लागत को कम करने के प्रयास करें, ताकि आप प्रतियोगी बाजार में टिक सकें. कभी अंधेरे में न रहें, किसी गलतफहमी में न रहें. वास्तविक लाभ-हानि का आंकलन करते रहें, ताकि आप यथा समय अपनी परिस्थितियों को नियन्त्रित कर सकें. 7. यदि किसी व्यवसाय या कार्य में लगातार घाटा हो रहा हो तो घाटे के कारणों का पता लगाइए. भविष्य में घाटा बढ़ेगा या घटेगा, इसका भी पता लगाइए. यदि घाटे के बढ़ने की अधिक संभावना हो और क्षतिपूर्ति की संभावना कम हो तो घाटे को इसी बिन्दु पर तत्काल रोकना जरूरी है. शेयर मार्केट में इसे “Stop Loss” यानी घाटे को रोकने का सिद्धान्त कहते हैं. इस सिद्धान्त को जीवन के हर क्षेत्र में लागू किया जा सकता है.

8. जब हम किसी वस्तु की कीमत जरूरत से ज्यादा चुकाते हैं तो इसे समझदारी नहीं कहा जा सकता. वस्तु कितनी ही आवश्यक अथवा महत्वपूर्ण क्यों न हो, बाजार दर से अधिक कीमत चुका कर सम्पन्नता या दरियादिली दिखाने को बहादुरी नहीं कहा जा सकता. अपने देश को और नैतिक परिवेश को अपने व्यक्तिगत लाभ से सदा ऊपर रखा जाना चाहिए. याद रखें, दूसरों को नुकसान पहुँचाकर आप कभी लाभ में नहीं रह सकते. अपने लाभ की अवश्य सोचें, परन्तु दूसरे उपभोक्ताओं की कीमत पर नहीं.

9. जिन्दगी के हर कार्य कलाप का समुचित लेखा नियमित रूप से संधारित करते चलें. कुछ ऐसा मैकेनिज्म तैयार करें, ताकि लाभ-हानि का तत्काल पता लगाया जा सकें. अनुमान या अंधेरे में आगे बढ़ते रहने पर अपने आपको धोखे में ही रखेंगे. होश आने तक बहुत देर हो चुकी होगी. और तब घाटे की भरपाई नहीं कर सकेंगे. घाटे और सन्नाटे पर अंकुश लगाते चलें.

दृष्टान्त- एक शहर में सिटी बसों का न्यूनतम किराया दो रुपये था. हिसाबीलाल घर से दुकान तक रोजाना पैदल ही आता-जाता था और इस तरह प्रतिदिन चार रुपये बचा लेता था. किसी कारणवश कम दूरी के यात्रियों की संख्या कम होती चली गई. इस पर नगर परिवहन विभाग ने विचार कर बसों का न्यूनतम किराया दो रुपये के स्थान पर एक रुपया ही कर दिया. इस पर हिसाबीलाल को गुस्सा आ गया. वह तत्काल सिटी बस ऑफिस पहुँचा और अपना विरोध प्रकट करते हुए प्रबन्धक को बताया कि बसों का न्यूनतम किराया कम कर देने से अब उसे दो रुपये प्रतिदिन के हिसाब से नुकसान होने लग गया है. प्रबन्धक ने आश्चर्य के साथ पूछा-‘नुकसान कैसा ? हमने तो किराया कम किया है.’ हिसाबीलाल ने समझाया-‘महोदय, मैं तो घर से दुकान पैदल आता-जाता हूँ, इससे मुझे रोजाना चार रुपये का लाभ हो रहा था, अब यह लाभ दो रुपये ही रह गया है.’ हिसाबी लाल के तर्क में दम था. 

लापरवाही, सुस्ती एवम् फिजूलखर्ची के कारण ही आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं (48) (Financial Problems Are Arised Out of Sheer Negligence, Inactiveness & Wastefull Expenditure) 

1.याद रखें, लापरवाही काम बिगाड़ती है और सुस्ती जिन्दगी एवं वक्त दोनों बिगाड़ती है. चुस्ती, फुर्ती और सतर्कता व्यक्तिगत एवम् सार्वजनिक जीवन में कामयाबी के झण्डे गाढ़ती है, यह भी याद रखें, आपकी समस्यायें आप द्वारा ही सृजित हैं. अधिकांश कठिनाइयाँ आप द्वारा ही अर्जित हैं. अर्थात् आपकी समस्याओं के कारण भी आप ही हैं और निवारण भी आप ही हैं.

2. यदि आप खुद के प्रति लापरवाह रहेंगे तो अपने परिवार, समाज, देश, व्यवसाय सबके प्रति लापरवाह रहेंगे. आपकी यह लापरवाही ही आपकी तबाही की सबसे बड़ी वजह होगी. जब आप खुद की परवाह करेंगे तो भगवान और भाग्य भी आपकी परवाह करेंगे. जब आप दूसरों की परवाह करेंगे तो दूसरे भी आपकी परवाह करेंगे. जब आप वक्त की परवाह करेंगे तो वक्त भी आपकी परवाह करेगा. जब आप धन की परवाह करेंगे तो धन भी आपकी परवाह करेगा.

3. जिस प्रकार बड़ी-से-बड़ी नाव को डूबोने के लिए छोटे-से-छोटा छेद ही काफी होता है, उसी प्रकार मजबूत से मजबूत माली हालत को डाँवाडोल करने के लिए फिजूलखर्ची का छोटासा छिद्र ही काफी होता है. एक पैसा बचाने का अर्थ होता है, दो पैसे अतिरिक्त कमाना. आय के बराबर खर्च करने का अर्थ होता है, भविष्य को दाव पर लगाना. आय से अधिक खर्च करने पर भविष्य की तो छोड़िए, वर्तमान की खुशियाँ भी छिन्न-भिन्न हो जाती हैं.

4. आदमी अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा अक्सर फिजूल ही खर्च कर देता है. समझदार व्यक्ति पानी, बिजली, फोन, वाहन, वस्त्र, विलासिता, आने-जाने, खाने-पीने, मिलने-जुलने, सजने-संवरने आदि में काफी बचत कर सकता है. याद रखें, जो बचाता है, वही कमाता है. बचत के बिना तो कमाई का कोई अर्थ ही नहीं है. चुस्ती-फुरती के बिना जिन्दगी का कोई मतलब नहीं है. सावधानी और सजगता के बिना किसी कार्य का कोई औचित्य नहीं है.

5. पान, बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, गुटखा, शराब, जुआ आदि नशीली, खर्चीली और खतरनाक वस्तुओं से बच कर रहें. यदि कोई बुरा व्यसन आपके साथ जुड़ गया हो तो उसे तत्काल छोड़ दें. छोड़ने से पहले अपनी इच्छा शक्ति को सुदृढ़ करें, फिर बुरी आदतों को एकदम छोड़ दें. यदि आप छोड़ने के लिए सोचते रहे तो याद रखें, कभी नहीं छोड़ पायेंगे. छोड़ने का निर्णय तो तत्काल ही लेना पड़ेगा. एक दो किलोमीटर के लिए वाहन का उपयोग करना, दुपहिया वाहन से काम चलने की स्थिति में चौपहिया वाहन का उपयोग करना, लम्बी दूरी के लिए सार्वजनिक वाहनों के स्थान पर निजी वाहन का उपयोग करना, आवश्यकता से अधिक बड़े भवन का निर्माण करवाना, शादी-समारोहों में दिखावा करना, फिजूलखर्ची में ही आता है.

6. पैसा जो बचाओगे, वो वक्त के साथ-साथ बढ़ेगा ही. बचत के कारण ही आमदनी का ग्राफ ऊपर चढ़ेगा, जब भी खर्च करें, यही सोच कर करें कि पैसा किसी की अमानत है. और उसे वापस लौटाना भी है. जो भी आपने खर्च कर दिया, समझो हमेशा के लिए गया. जो भी आपने निवेशित कर दिया, समझो पैसों का पेड़ लगा दिया. याद रखें, फिजूलखर्ची पर अंकुश लगा कर ही आप पैसों का पेड़ लगा सकते हैं.

7. अमीर लोगों के साथ बाजार की सैर न करें. जाना भी पड़े तो खरीददारी न करें. अपनी कीमत जाननी हो तो किसी से उधार मांग कर देखें. अगर धन की कीमत जाननी हो तो किसी को उधार देकर देखें. फालतू के खर्चों पर यदि रोक नहीं लगाओगे तो एक दिन शोक प्रकट करने के लिए कुछ नहीं बचेगा. सुस्ती की आदत में सुधार नहीं करोगे तो एक दिन आपके पास करने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा.

8. अपनी आमदनी का कम से कम पच्चीस प्रतिशत तो अवश्य बचायें. बचत के लिए अनावश्यक खर्चो  को फिलहाल स्थगित रखें. किसी नये व्यवसाय के लिए यदि बचत से काम न चले तो उधार लें. उधार चुकाने के लिए अपनी बचत को बढ़ायें. पर याद रखें, उधार चुकाने के लिए कभी उधार न लें. ऐसी विलासितायें, ऐसी सुविधायें तो सरकारों के लिए छोड़ दें.

9. लॉटरी का टिकिट खरीदे बिना आप इनाम की आशा कैसे कर सकते हो? याद रखें, लॉटरी उसी की खुलती है, जिसके पास टिकिट होता है. टिकिट खरीदने में यदि लापरवाही करेंगे, फिजूलखर्ची के कारण टिकिट खरीदने जितनी राशि भी नहीं बचा पायेंगे अथवा सुस्ती के कारण यथा समय टिकिट नहीं खरीद पायेंगे, तब इनाम की आशा कैसे कर सकते हो ? अर्थात् यदि सुनहरे भविष्य का निर्माण करना चाहते हो तो लापरवाही, सुस्ती और फिजूलखर्ची छोड़नी ही पड़ेगी.

दृष्टान्त- दो मित्र थे, एक अमीर व दूसरा गरीब, दोनों साथ पढ़ते थे। अमीर लापरवाह एवम् खर्चीला था. गरीब अत्यन्त ही संयमी एवम् परिश्रमी था. गरीब मित्र, अपने अमीर मित्र को खूब टोकता था, किन्तु अमीर पर कोई असर नहीं हुआ. अमीर ने पढ़ाई भी बीच में ही छोड़ दी. गरीब ने प्रथम श्रेणी में एम.ए. किया और अध्यापक बन गया, अमीर ने अपना पुश्तैनी धन्धा संभाला, किन्तु आलस्य, लापरवाही एवम् फिजूलखर्ची के कारण करोड़ों की सम्पत्ति बिक गई. बुरी आदतों एवम् व्यसनों के कारण वह जल्दी ही सड़क पर आ गया. करीब बीस साल बाद दोनों मित्रों की हॉस्पिटल में अचानक मुलाकात हो गई. एक मित्र तब तक प्रिन्सीपल बन चुका था और दूसरा मित्र कर्जदार और मर्जदार. शरीर से काफी कमजोर हो चुका था. मिलते ही एक दूसरे से गले मिल गये. बचपन का अमीर दोस्त फूट-फूट कर रोने लगा. उसने पछताते हुए बताया कि यदि वह अपने दोस्त की सलाह पर चलता तो आज शहर का सबसे अमीर व्यक्ति होता. दूसरे मित्र ने समझाया-‘जो होना था, हो गया. अब भी वक्त है. नये सिरे से जीवन की शुरूआत कर सकते हो.’ 

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