दूसरी हरित क्रांति upsc | द्वितीय हरित क्रांति Drishti IAS

दूसरी हरित क्रांति upsc

दूसरी हरित क्रांति upsc | द्वितीय हरित क्रांति Drishti IAS

यह सच है कि पहली हरित क्रांति के अनेक सकारात्मक परिणाम सामने आये। मसलन, देश में पैदावार बढ़ी, जिससे खाद्यान्न के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर बने। भारतीय कृषि के परंपरागत ढांचे में बदलाव आया तथा उसे आधुनिक व वैज्ञानिक संस्पर्श मिला। जहां रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई, वहीं कृषि बचतों में वृद्धि से खेती किसानी में किसानों का भरोसा जागा। इसके बावजूद कुछ ऐसी खामियां रह गईं, जिनकी वजह से देश में दूसरी हरित क्रांति की आवश्यकता महसूस की गई। इन खामियों में पहली खामी यह थी कि प्रथम हरित क्रांति में खुश्क भूमि खेती (Dryland Farming) को कोई लाभ नहीं पहुंचा। इसकी दूसरी बड़ी खामी यह थी, कि यह क्रांति ‘आकार तटस्थ’ (Scale Neutral) नहीं थी। इस कमी की वजह से पहली हरित क्रांति का लाभ केवल बड़े किसानों और फार्मों तक ही पहुंचा। छोटे और सीमांत किसान इससे वंचित रह गये। आंकड़ों से पता चलता है कि 62 प्रतिशत सीमांत जोतें, जिनके अंतर्गत संकार्य क्षेत्रफल का 17% था और 31% छोटी जोतों, जिनके अंतर्गत 55% संकार्य क्षेत्र (Operational Area) था, को पहली हरित क्रांति का कोई लाभ नहीं पहुंचा। इसे हम इस तरह से भी देख सकते हैं। उपज तो बढ़ी, किंतु ग्रामीण निर्धनता नहीं घटी। ये बातें पहली हरित क्रांति की बड़ी विफलताओं के रूप में सामने आयीं, जिन्हें दूर करने के उद्देश्य से वर्ष 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने एक ऐसी दूसरी हरित क्रांति का आह्वान किया, जिसमें जहां खुश्क भूमि खेती को लाभ पहुंचाने पर जोर दिया गया है, वहीं यह कोशिश की गई है कि छोटी व सीमांत जोतों को इसके दायरे में लाकर छोटे व सीमांत किसानों को लाभ पहुंचाया जाए। 

दूसरी हरित क्रांति को अमलीजामा पहनाने के उद्देश्य से वर्ष 2004 में किसानों पर राष्ट्रीय आयोग (National Commission on Farmers) का गठन किया गया और इसकी अध्यक्षता प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक डॉ. एमएस. स्वामीनाथन को सौंपी गई। इस आयोग द्वारा कुछ ऐसी सिफारिशें व पहलें की गई हैं, जिससे भारतीय किसानों की कायापलट सकती है। हर वर्ग और कोटि के किसान लाभान्वित हो सकें, इसे ध्यान में रखकर किसान की परिभाषा को व्यापकता प्रदान करते हुए इसमें शामिल किये गये हैं-छोटे, सीमांत व उपसीमांत कृषक, भूमिहीन कृषि मजदूर, फसल सहभाजक, मुजोर, बड़ी जोतों वाले किसान, मछली पकड़ने वाले पुरुष और महिलाएं, डेयरी, मुर्गीपालन और पशुपालन का काम करने वाले, पशुचारी तथा खेती से संबंधित वे ग्रामीण एवं जनजातीय व्यक्ति, जो रेशम उत्पादन, कीट-पालन, जैव उर्वरकों और जैव कीटनाशकों के उत्पादन और कृषि परिसाधन (Agricultural Processing) व्यवसायों में लगे हैं। इसमें छोटे किसानों को संस्थानात्मक सहायता (Institutional Support) पर विशेष बल दिया गया है, ताकि उनकी स्थिति में सुधार आए। चूंकि छोटे कृषकों में जोखिम तथा अनिश्चितता सहन करने की क्षमता अधिक नहीं होती है, अतएव न सिर्फ उन्हें संबल प्रदान किया गया है, बल्कि उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के भी प्रयास किये गये हैं। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि पहली हरित क्रांति में ऋण सुविधाओं के अभाव, निविष्टियों की अप्राप्यता, अज्ञानता, अशिक्षा व अपर्याप्त संसाधन आदि कारणों से छोटे व सीमांत किसान इस क्रांति के लाभों से वंचित रह गये थे। दूसरी हरित क्रांति में उन्हें लाभ के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है, ताकि समावेशी विकास की अवधारणा भी साकार हो सके। कोई भी विकास या प्रगति सार्थक तभी साबित होती है, जब उसका रिसाव निचले स्तर तक हो। यह बात देश की हरित क्रांतियों पर भी लागू होती है। दूसरी हरित क्रांति में जहां फार्म उत्पादिता और लाभदायकता बढ़ाने पर बल दिया गया है, वहीं भूमि की संभाव्य उत्पादिता को भी बढ़ाने का प्रयास वैज्ञानिक शोधों के जरिये किया गया है। दूसरी हरित क्रांति में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि बीजों में सुधार के लिए विज्ञान और जैव टेक्नोलॉजी के प्रयोग के साथ ही जड़ी-बूटियों व अन्य पौधों का प्रयोग भी किया जाए। दूसरी हरित क्रांति में इस बात पर भी विशेष बल दिया गया कि पशुधन और मुर्गियों की उत्पादिता में वृद्धि हेतु पशुपालन के क्षेत्र में विज्ञान का प्रयोग बढ़-चढ़ कर किया जाए। इस दूसरी हरित क्रांति की सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि इसमें पारिस्थितिकी नुकसान (Ecological Harm) को वरीयता दी गई है। यानी कृषि क्षेत्र में उत्पादकता व लाभदायकता को बढ़ाया तो जाए, किंतु यह काम इस तरह से किया जाए कि हमारी पारिस्थितिकी को क्षति न पहुंचे। दूसरी हरित क्रांति के मुख्य अवयव हैं-खुश्क भूमि खेती व छोटे व सीमांत किसानों को लाभ पहुंचाना, भूमि स्वास्थ्य में सुधार लाना, जल संरक्षण तथा पानी का पोषणीय एवं समतावादी प्रयोग, क्षमतानुसार उधार तक पहुंच तथा फसल एवं बीमा सुधार, उचित तकनीकों का विकास व प्रसारण तथा उन्नत अवसर, कृषि उत्पादन के विपणन के लिए उचित अधोसंरचना का निर्माण व विनियमन। वस्तुत; दूसरी हरित क्रांति, कृषि क्षेत्र से जुड़ी वह नई व्यूह रचना है, जो कि भारतीय कृषि की काया पलट सकती है। 

भारत का किसान आज भी बदहाल है। वह ऋण से ग्रस्त है। आत्महत्याएं करने को विवश है। ये बातें पहली हरित क्रांति को विफल व प्रभावहीन करती हैं। ग्रामीण गरीबी भी बढ़ी है और इसके चलते ग्रामीणों में खीझ और असंतोष बढ़ा है। देश का किसान यदि आत्महत्याएं कर रहा है, तो यह बात पहली हरित क्रांति को यकीनन संदिग्ध बनाती है। भारतीय किसानों की इससे बदतर स्थिति और क्या होगी, कि अनेक भारतीय किसान खेती को घाटे का सौदा मानने लगे हैं और अपनी जमीनें बेचकर कृषि कार्यों से विमुख हो रहे हैं। यह स्थिति अत्यंत गंभीर है, जो न सिर्फ पहली हरित क्रांति को प्रश्नगत करती है, बल्कि दूसरी हरित क्रांति की अब तक की प्रगति को भी सवालों के घेरे में ला रही है।

ऐसे में हमारे समक्ष एक बड़ी चुनौती यह है कि हम इन क्रांतियों की सार्थकता पर ध्यान दें। सार्थकता इसी में है कि उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ किसानों के चेहरे भी हंसते-मुस्कराते नजर आएं। वे ऋण ग्रस्तता के अभिशाप से उबर कर एक खुशहाल किसान कहलाएं। यह अच्छी बात है कि दूसरी हरित क्रांति में विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों की समस्याओं की तरफ ध्यान दिया गया है। यह उल्लेखनीय है कि भारत की 93% जोतें, छोटी तथा सीमांत जोतों की श्रेणी में आती हैं, जब इनका उद्धार होगा यानी हमारे छोटे व सीमांत किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी, तभी देश की हरित क्रांतियां मंजिल-ए-मकसद तक पहंच सकेंगी और भारतीय कृषि के दुखद अध्यायों का पटाक्षेप होगा। 

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