द्वितीय कर्नाटक युद्ध | Second Carnatic War History in hindi

Second Carnatic Wa

 द्वितीय कर्नाटक युद्ध (Second Battle of Karnataka) (1749-1754 ई०) 

द्वितीय कर्नाटक युद्ध ने दिल्ली में मुग़ल साम्राज्य की कमजोरी और मुगलिया साम्राज्य के बिखराव को ही न केवल उजागर किया, बल्कि इस बात को भी प्रत्यक्ष दिखाया कि यूरोपीय देश (ब्रिटेन और फ्रांस) भारत की राजनीति और शासन व्यवस्था में पूरी दखलअन्दाजी कर सकते हैं। उनकी दखल अंदाजी को स्वीकार करते हुए भारतीय शासक उनके अंगुलियों के इशारों पर नाचने के लिए विवश हैं। 

सन् 1707 ई० में, अर्द्धशताब्दी तक भारत पर शासन करने के बाद औरंगजेब का निधन हो गया। औरंगजेब ने भारतवर्ष में मुग़ल सल्तनत को अपने पूर्ववर्ती शासकों से कहीं अधिक विस्तृत साम्राज्य स्थापित किया। परन्तु उसकी कट्टरता के नीति तथा उसके बाद के निकम्मे वारिसों के कारण मुग़ल साम्राज्य का बिखराव होना आरम्भ हो गया।

द्वितीय कर्नाटक युद्ध के समय भारत में राजनीतिक परिस्थितियां

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 औरंगजेब के बाद, उसका 63 वर्षीय उत्तराधिकारी मुअज्जम शाह आलम उर्फ बहादुर शाह सिंहासनासीन हुआ। वह केवल 5 वर्ष 1707 से 1712 तक हुकूमत कर सका। 

उसके बाद बहादुर शाह का ज्येष्ठ पुत्र जहांदार शाह (1712-13 ई०) अयोग्य शासक साबित हुआ। फर्रुखशियर (1713-1719 ई०) तृतीय सम्राट बना। उसके बाद तीन अन्य उत्तराधिकारी गद्दी पर बैठते उतरते रहे। 

अहमदशाह (1748-54 ई०) उत्तरकालीन 7वां मुग़ल सम्राट बना। उसका जन्म एक नर्तकी से हुआ था। उसका राजकाल ‘हिजड़ों और औरतों के हाथों में रहा। इसके शासन काल में सल्तनत की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो गयी थी। 

सेना को वेतन देने के लिए शाही सामानों की बिक्री करनी पड़ी। द्वितीय कर्नाटक युद्ध के परिप्रेक्ष्य में अहमदशाह का विवरण इसलिए प्रासांगिक है ताकि जाना जा सके कि यूरोपियनों को क्योंकर भारत की राजनीति में दखल देना का अवसर मिल गया था। 

द्वितीय कर्नाटक युद्ध इसी अहमद शाह के शासनकाल में हुआ। अहमद शाह को इस बात की खबर रखने की कोई आवश्यकता न महसूस हुई थी कि साम्राज्य में कहां क्या हो रहा है। किस प्रान्त में किसने सत्ता पर कब्जा जमा लिया है, किसने स्वतन्त्र शासक खुद को घोषित कर दिया है, या विदेशी अपना पैर किस तरह फैलाते जा रहे हैं। 

कर्नाटक का द्वितीय युद्ध हैदराबाद तथा कर्नाटक के सिंहासनों के विवादास्पद उत्तराधिकारियों के कारण आरम्भ हुआ। दिल्ली के बादशाह अहमद शाह को अपने सूबेदारों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि कहां कौन सूबेदारी कर रहा है। 

मुजफ्फर जंग नामक प्रभावशाली व्यक्ति दकन की सूबेदारी का दावा कर रहा था तो कर्नाटक की सूबेदारी के लिए चन्दा साहब नामक व्यक्ति आगे आ रहा था।

 फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने मुजफ्फर जंग को दकन में अपना समर्थन देते हुए, अपनी सूबेदारी पुख्ता करने के लिए सेना दी, तथा चन्दा साहब को कर्नाटक की सूबेदारी के लिए समर्थन और सेना दी। 

मुजफ्फर जंग और चंदा साहब का विरोधी अनवरुद्दीन नामक व्यक्ति था। मुजफ्फर जंग, चंदा साहब ने संयुक्त होकर फ्रांसीसी सेना के बल पर 1749 में बैल्लूर के समीप अम्बूर नामक स्थान पर अनवरुद्दीन को हराया तथा कर्नाटक व दकन की सूबेदारी सम्भाल ली। 

ब्रिटेन ने जब इस बात को देखा कि फ्रांसीसी, भारत की रियासतों में सूबेदारों के भाग्य का निर्णय करने लगे हैं तो वे फौरन सजग हुए-क्योंकि सूबों में जो शासक फ्रांसीसियों के समर्थन से बन रहे थे, जाहिर था वे फ्रांसीसियों का ही हित साधते। ऐसे में ब्रिटेन के हित पर कुठाराघात होता। ब्रिटेन ने फ्रांसीसियों के इस रवैये पर सख्त एतराज जताया। ब्रिटिश गवर्नर जनरल लार्ड क्लाइव ने फ्रांसीसियों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। अकोटाप नामक स्थान पर युद्ध हुआ। युद्ध लम्बा चला। फ्रांस के गवर्नर लार्ड डूप्ले को हार का मुंह देखना पड़ा। इस हार के बाद डूप्ले को फ्रांस सरकार ने वापस बुला लिया। 1754 ई० में गोडेहू को नया गवर्नर बनाकर भेजा गया। गोडेहू ने लार्ड क्लाइव से आकर सन्धि की। वर्चस्व की लड़ाई में फ्रांसीसी ब्रिटेन से हार गए थे। 

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