पानीपत का द्वितीय युद् |Second Battle of Panipat history in hindi

पानीपत का द्वितीय युद्ध (Second Battle of Panipat) (5 नवम्बर, 1556 ई०) 

सन् 1545 ई० में शेरशाह का निधन हो गया। उसके निधन के बाद दिल्ली सत्ता का तेजी से बिखराव हुआ। शेरशाह का पुत्र सिकन्दर शाह था, उसने सत्ता को सम्भालने की चेष्टा की पर असफल रहा। सिकन्दर शाह की सत्ता की विफलता से लाभ उठाकर सेना का एक सरदार हेमू (हेम चन्द्र) ताकतवर बना। अफगानों के शासनकाल में (1540 ई० से 1552 ई०) हेमू एक मात्र हिन्दू था, जिसे दिल्ली के सिंहासन पर बैठने का सौभाग्य मिला। अफगान सेना का नेतृत्व करते हुए वह मुग़ल सेना के विरुद्ध पानीपत के मैदान में आ डटा था। हेमू को एक ऐतिहासिक योद्धा कहा जाता है। उसने सिकन्दर शाह के निधन के बाद दिल्ली की सत्ता पर अधिकार कर लिया था।

हुमायूं की भारत वापसी 

शेरशाह से युद्ध हारने के बाद हुमायूं को भारत से भागना पड़ा था। पर उसके साथ उसका बहादुर, जांबाज सेनापति बैरम खां तथा कुछ विश्वस्त सैनिक थे। अपने वफादार सेनापति और गिने-चुने सैनिकों के साथ हुमायूं फारस में जाकर काफी समय तक घुमक्कड़ों का सा जीवन व्यतीत करता रहा। बैरम खां की कोशिशों से फारसवासी शिया धर्मगुरु मीर अली अकबर जामी की पुत्री हमीदा बानो से 29 अगस्त, 1541 को हुमायूं का विवाह हो गया। इस विवाह के परिणाम स्वरूप शिया युवा योद्धाओं का हुमायूं को समर्थन मिल गया। नई सेना बनाकर हुमायूं ने 1545 में कांधार और काबुल पर धावा बोलकर अपने अधिकार में कर लिया। 

विवाह के एक साल बाद हुमायूं को पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गयी। जो कि अकबर के नाम से मुग़ल इतिहास में प्रसिद्ध हुआ। अकबर के जन्म के बाद हुमायूं की किस्मत के सितारे बुलन्द होने शुरू हो गए थे। 5 सितम्बर, 1554 को हुमायूं ने पेशावर को तथा 1555 में लाहौर पर कब्जा कर लिया। उस समय तक शेरशाह और उसके पुत्र का निधन हो चुका था। 

सन् 1555 में मच्छीवाड़ा, 22 जून, 1555 को सरहिन्द जीतती हुई मुग़ल सेना दिल्ली की ओर बढ़ी। 23 जुलाई, 1555 को एक बार फिर दिल्ली के सिंहासन पर हुमायूं को बैठने का अवसर मिल गया। केवल 7 महीने तक पुनः सत्ता का सुख भोगने के बाद 22 जनवरी, 1556 ई० में पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरने के कारण हुमायूं का निधन हो गया। 

हुमायूं के निधन के समय अकबर अल्प वयस्क था और बैरम खां के संरक्षण में था और दिल्ली से दूर था। बैरम खां ने हुमायूं का निधन का समाचार पाते ही अल्प वयस्क अकबर को बादशाह घोषित करते हुए उसका राज्याभिषेक कर दिया। 

इस तरह अल्प वयस्क अकबर जनवरी, 1556 ई० में दिल्ली पर सिंहासनासीन हुआ। बैरम खां उसका संरक्षक बनकर अपनी वफादारी निभाता रहा।

पानीपत युद्ध की तैयारी 

पानीपत का द्वितीय युद्ध

हुमायूं के निधन का समाचार पाते ही जौनपुर के निकट 50,000 अफगान आ डटे। वे हेमू के नेतृत्व में दिल्ली की ओर बढ़ने लगे। हेमू के नेतृत्व में 50,000 की पैदल और घुड़सवार, 1,000 हाथियों, 51 बड़ी तोपें और 500 हल्की तोपों से लैस सेना थी।

 बैरम खां ने जैसे ही अफगानों की दिल्ली ओर बढ़ती सेना के बारे में सुना, वह दिल्ली से सेना लेकर चल पड़ा। एक बार फिर पानीपत के मैदान में मुगलों और अफगानों की सेनाएं आ डटीं। इस बार जो युद्ध होने जा रहा था वह इस बात का निर्णय करने जा रहा था कि भारत में अफगानों की हुकूमत रहेगी या मुगलों की। 

5 नवम्बर, 1556 को दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ। युद्ध का परिणाम मुगलों के पक्ष में गया। इतिहासकारों ने अफगानों की पराजय के कारणों में लिखा है कि, इसका पहला कारण अफगानों का हेमू के विरुद्ध असंतोष था। हेमू ने दिल्ली की ओर बढ़ते समय खुद को राजा घोषित करते हुए विक्रमादित्य की उपाधि धारण कर ली थी। अफगान लोग उसके नेतृत्व में युद्ध करने को तैयार थे, परन्तु उसे प्रमुख सेनापति रूप में ही मानने को राजी थे, उसे राजा रूप में नहीं स्वीकार कर सकते थे। वे किसी अफगान को ही राजा बनाना चाहते थे। हेमू ने स्वयं को राजा घोषित कर दिया था, इससे अफगान योद्धाओं ने पूरे मन से युद्ध नहीं किया। 

दूसरा कारण था-हेमू को अपनी विशाल सेना पर अधिक विश्वास था, तोपखाना की उसने महत्ता नहीं समझी थी। तोपखाने को महत्त्वहीन मानने के कारण, जब घनघोर युद्ध छिड़ा तो सारा तोपखाना मुगलों के अधिकार में चला गया। उन्होंने तोपों का इस्तेमाल कर अफगान योद्धाओं की लाशों से युद्ध भूमि पाट दी। 

युद्ध का नक्शा इस रूप में पलटा था कि बैरम खां के नेतृत्व में तीरन्दाजों की सेना ने निशाना लगाकर हेमू पर तीर छोड़ा-तीर हेमू की आंख में लगा था। तीर से जख्मी होते ही वह मूर्छित होकर भूमि पर गिरा तब अफगान सेना भाग खड़ी हुई थी। हेमू को बैरम खां के सामने लाया गया। किशोर अकबर इस बात पर राजी हुआ कि वह तलवार को उसकी गरदन से स्पर्श करके उसे जीवित रहने देगा। अकबर ने ऐसा ही किया, उसके बाद बैरम खां ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।

 पानीपत के इस द्वितीय युद्ध में युद्ध भूमि में मारे गए सैनिकों की एक छोटी-सी मीनार खड़ी कर दी गयी थी। इस युद्ध में अटूट खजाने और स्वर्ण भंडार पर मुगलों ने कब्जा किया। यद्यपि हेमू की पत्नी सोने से लदे हाथियों के साथ बच निकली थी तथापि जो सोना वह पीछे छोड़ गयी थी, वह इतना अधिक था कि वह युद्ध में भाग लेने वाले सैनिकों को वीरता दिखाने के एवज़ में खुश होकर ढालों में भरकर उपहार स्वरूप दिया गया। 

पानीपत के इस दूसरे युद्ध में बेशक अफगानों का भीषण नरसंहार हुआ, बावजूद इसके बहुत से अफगान युद्ध भूमि से बच निकले थे। वे बिहार-बंगाल की ओर जाकर अपनी शक्ति संगठित करने लगे थे। वे अकबर को अल्प-वयस्क समझकर उसके वयस्क होकर पूर्ण सत्ता अपने हाथ में लेने तक, बीच के वर्षों में छिट-पुट विद्रोह करते रहे-जिन्हें अकबर का संरक्षक और कुशल सेनापति, बैरम खां पूर्ण कुशलता से न केवल दमन करता रहा, बल्कि अकबर के लिए साम्राज्य का विस्तार करता रहा। 

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