सरहुल पर निबंध | Sarhul Festival Essay in hindi

Sarhul Festival Essay in hindi

सरहुल पर निबंध | Sarhul Festival Essay in hindi

पर्व-त्योहार आदिवासियों की संस्कृति के महत्वपूर्ण अंग हैं। आदिवासियों के बहुत से त्योहार हैं। प्रत्येक का अलग-अलग महत्व है। आदिवासियों में भी कई प्रकार के आदिवासी होते हैं। उनके पर्व-त्योहारों में भी थोड़ी भिन्नता पाई जाती है। आदिवासियों में उरांव जाति के आदिवासी भी होते हैं। सरहुल उरांव जाति का एक महत्वपूर्ण एवं प्रिय त्योहार है। 

सरहुल का त्योहार प्रतिवर्ष चैत्र मास की तृतीया को मनाया जाता है। चैत्र के महीने में सभी पेड़-पौधों में नई कोंपलें, कोमल पत्ते तथा फूल-फल आदि निकल आते हैं। पूरा माहौल वासंती रहता है। ऐसे में संपूर्ण वन प्रदेश पेड़-पौधों की हरियाली और सतरंगे फूलों से महक उठते हैं। सरहुल त्योहार आदिवासियों का वसंतोत्सव है। सरहुल आदिवासियों के लिए फूलों का पर्व है, जिसमें प्रकृति देवी की पूजा की जाती है। पूजा में यह भाव रहता है कि प्रकृति प्रसन्न होकर सदा फल-फूलों से हमें प्रसन्न रखेगी अर्थात हमारा जीवन फलता फूलता रहेगा। हम धन-दौलत और ऐश्वर्य-वैभव से परिपूर्ण होंगे। सरहुल पर्व मूल रूप से वन क्षेत्र में मनाया जाता है। इसलिए इस पर्व में होने वाली पूजा शाल-कुंजों में की जाती है, जिसे ‘सरना’ कहा जाता है। 

सरहुल त्योहार मनाने के लिए आदिवासियों द्वारा महीनों पहले से तैयारी प्रारंभ कर दी जाती है। आदिवासी चाहे निकट के नगरों में हों या सुदूर प्रांतों में सरहुल त्योहार के अवसर पर वे अपने-अपने गांव अवश्य पहुंच जाते हैं। लड़कियां अपनी ससुराल से मायके लौट आती हैं। वे अपने घरों की लिपाई पुताई करती हैं और दीपावली की तरह हाथी-घोड़े तथा फूल-फल आदि के चित्रांकन से घरों की सजावट करती हैं। इस दिन बच्चे, बूढ़े और जवान सभी आदिवासी नये-नये कपड़े धारण करते हैं। आदिवासी युवतियां नये वस्त्रों के साथ-साथ फूलों से भी अपना श्रृंगार करती हैं। 

सरहुल के दिन सुबह से ही सभी आदिवासी युवक-युवतियां सरना पूजा हेतु शाल-कुंज में एकत्रित होते हैं। गांव के प्रधान पुजारी, जिसे ‘पाहन’ कहा जाता है, सरना पूजन कराते हैं। पूजन के बाद मुर्गे की बलि दी जाती है और हंडिया (भात से बनी शराब) का अर्घ्य दिया जाता है। अर्घ्य के बाद सभी आदिवासी शाल वृक्ष के पत्ते पर मुर्गा रखकर खाते हैं और नशे के लिए हंडिया का सेवन करते हैं। इसके बाद प्रारंभ होता है-इनके नाच-गान का रंगारंग कार्यक्रम। सभी आदिवासी युवक-युवतियां नगाड़े, मृदंग और बांसुरी की धुन पर थिरककर नाचते-गाते हैं तथा सरहुल के आनंद में सराबोर हो जाते हैं। 

संक्षेप में कहा जा सकता है कि आदिवासी इस दिन जंगल में मंगल मनाते हैं। ऐसे में अगर इनके बीच गौतम बुद्ध आते, तो उन्हें मानव जीवन दुखमय नहीं लगता और वे कह उठते कि ‘जीवन में सुख ही सुख है।’

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