सरस्वती पूजा पर निबंध-Saraswati Puja essay in hindi(बसंत पंचमी पर निबंध)

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सरस्वती पूजा पर निबंध-Saraswati Puja essay in hind

 सरस्वती पूजा पर निबंध- माँ सरस्वती विद्या की सर्वमान्य देवी हैं, उस विद्या की, जो कामधेनु है, जो अखिल कामनाओं की पूर्ति करनेवाली है, जो अमृतत्व प्राप्त कराती है—’विद्या मृत मश्नुते’. तथा जो मुक्ति प्रदान करती है—’सा विद्या या विमुक्तये । वे साहित्य और संगीत की अधिष्ठात्री देवी हैं। साहित्य, जो हमारे मरझाते हृदय को हरा-भरा कर देता है, जो हमारा अनुरजन-मनोरंजन ही नहीं करता, वरन् हमारी चित्तवृत्तियों का परिष्कार करता है, जो हमें भौतिक आनंद ही नहीं, वरन ब्रह्मानंद-सहोदर आनंद की उपलब्धि कराती है और जो टूटे हुए हृदय की महौषधि है, जो देवदूतों की भाषा है, 

जो आत्मा के ताप को शांत करता है तथा जिसका अनुगमन स्वयं परमात्मा करता है। जिस साहित्य और संगीत के बिना मानव पुच्छ-विषाणहीन पशुतुल्य है, उसी वरद साहित्य और संगीत की वरदायिनी वागीश्वरी का नाम है-सरस्वती। अतः, जो जितना बड़ा कवि, साहित्यकार, पंडित, ज्ञानी एवं वक्ता है, उसपर माता सरस्वती की अनुकंपा का मेह उतना ही बरसा है। 

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परमेश्वर की तीन महान शक्तियाँ हैं—महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती । शक्ति के लिए काली, धन के लिए लक्ष्मी तथा विद्या के लिए सरस्वती की समाराधना होती है। 

‘सरस्वती’ का सरलार्थ है ‘गतिमती’ । वाग्देवी या सरस्वती आध्यात्मिक दृष्टि से निष्क्रिय ब्रह्म को सक्रियता प्रदान करनेवाली हैं। इन्हें आद्या, गिरा, श्री, ईश्वरी, भारती, ब्राह्मी, भाषा, महाश्वेता, वाक्, वाणी, वागीशा, विधात्री, वागीश्वरी, वीणापाणि, शारदा, पुस्तकधारिणी, जगद्व्यापिनी, हरिहरदयिता, ब्रह्मविचारसारपरमा आदि नामों से पुकारा गया है। इससे ज्ञात होता है कि इनकी महिमा अपरंपार एवं अकथनीय है। 

सरस्वती का उज्ज्वल वर्ण ज्योतिर्मय ब्रह्मा का प्रतीक है। इनकी चार भुजाएँ हैं, ये चारों दिशाओं की प्रतीक हैं, जो सर्वव्यापित्व का लक्षण है। इनके एक हाथ में पुस्तक है। स्थूल रूप से यह ज्ञान-प्राप्ति का प्रधान साधन है और आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वज्ञानमय वेद का स्वरूप । दूसरे हाथ में माला है। स्थूल रूप से यह एकाग्रता का चिह्न है। किंतु, सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर यह विष्णु की वैजयंती और काली की मुंडमाला तथा विश्वजननी मातृका की वर्णशक्ति की माला है। ये अपने दो हाथों से वीणा धारण किए हुई हैं। वीणा स्थूल रूप से जीवन-संगीत का प्रतीत है। हमारी जितनी क्रियाएँ और विचार हैं, उनका सर्जनात्मक नादरूप पुंजीभूत होकर महाविश्वसंगीत में परिणत हो जाता है। 

सरस्वती कमल के आसन पर ज्ञानमुद्रा में बैठती हैं। कमल सृष्टि का प्रतीक है। इससे यही अभीष्ट है कि आद्याशक्ति सारी सृष्टि में व्याप्त हैं। कमल से निर्लिप्तता का भाव भी व्यक्त होता है। सष्टि में रहकर भी सष्टि के प्रभाव से मुक्त रहने की ओर सरोजासना का संकेतार्थ है। सरस्वती का वाहन राजहंस है। इनका निष्कलंक श्वेत वर्ण और नीरक्षीरविवेक से संपन्न वाहन हंस इनके आराधक के निष्कलंक चरित्र तथा गुणदोषविवेचन-सामर्थ्य के प्रतीक हैं। सरस्वती का उज्ज्वल वर्ण ज्योतिर्मय ब्रह्म का प्रतीक है। ज्ञान की देवी होने के ही कारण इनका और इनके वाहन का वर्ण उज्ज्वल है। 

सरस्वती-पूजन को केवल पोंगापंथीपन या रूढ़िवादिता की निशानी मानना उचित नहीं । संसार का शायद ही ऐसा कोई देश है, जिसमें किसी-न-किसी रूप में विद्यादेवी की उपासना न होती हो। वाणी के आलोक से अज्ञान की कुहेलिका दूर करने के लिए इनकी पूजा-पर्युपासना तो होनी ही चाहिए। 

ऐसे मंगल-अवसर पर ध्वनिविस्तारक यंत्रों से भद्दे गीतों का प्रचलन बिलकुल रोक देना चाहिए; क्योंकि माता अंतस की सात्त्विक मूक श्रद्धा से रीझती हैं, भावों के तपःपूत पुष्प से प्रसन्न होती हैं, कर्णकटु कोलाहल, अर्थापव्यय और बहुवर्णी विद्युत्-प्रदीपों के प्रदर्शन से नहीं। छात्रों के बीच यह भी गलतफहमी है कि इन दो दिनों में पुस्तक छूने से विद्यादेवी रुष्ट हो जाती हैं। 

जो सरस्वती किसी क्षम अपने हाथ से पुस्तक अलग नहीं करतीं, वही भला पुस्तक-स्पर्श से रूठ जाएँगी, यह संभव नहीं। इन्हें खुश करने के लिए ऐसे समय में तो डटकर पढ़ना चाहिए। यदि इनकी कृपा हई, तो हम कालिदास की तरह विश्ववंद्य हो सकते हैं। यदि ये मति फेर दें, तो हम कैकेयी की भाँति ‘अजस पिटारी’ बन जाएँ। गोस्वामी तुलसीदास के अक्षय कीर्तिभाजन होने तथा उनके ‘रामचरितमानस’ की सफलता का यही रहस्य था कि उन्होंने वाणी-वंदना से ही अपने महाकाव्य का शुभारंभ किया, वाग्देवी के प्रारंभिक अमृताक्षर ‘व’ से ही अपने रामचरित के मणि-माणिक्य को संपुटित किया।

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