संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी की स्वीकार्यता | संयुक्त राष्ट्र में हिंदी | sanyukt rashtra men hindi

संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी की स्वीकार्यता | संयुक्त राष्ट्र में हिंदी | sanyukt rashtra men hindi

संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी की स्वीकार्यता 

गूजी हिंदी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार

राष्ट्र संघ के मंच से, हिंदी की जयकार

हिंदी की जयकार हिंद हिंदी में बोला

देख स्वभाषा प्रेम, विश्व अचरज से डोला

कह कैदी कविराय, मेम की माया टूटी

भारत-माता धन्य स्नेह की सरिता फूटी 

उक्त पंक्तियां भारत के कवि हृदय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की हैं, जो विश्व मंच पर हिन्दी का जयघोष करती प्रतीत होती हैं। इन पंक्तियों द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ के मंच से, जो दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत है, हिन्दी की जयकार की गई। इन पंक्तियों में उन असंख्य हिन्दी अनुरागियों की आंखों में झिलमिलाते उस सपने को साकार होता दिखाया गया है, जो उन्होंने हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की सातवीं भाषा बनने के रूप में पाल रखा है। जब हम स्वप्न देखते हैं, तभी वे साकार होते हैं। यदि हम स्वप्न देखेंगे ही नहीं, तो वे साकार कैसे होंगे? यह कविता वाजपेयी जी के हिंदी प्रेम का प्रमाण है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में दो बार भाषण हिंदी में दिया। एक बार जब वे विदेश मंत्री थे और एक बार प्रधानमंत्री के पद से। यकीनन उनकी यह पहल संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी की स्वीकार्यता की प्रासंगिकता को आधार प्रदान करती है। इस पहल को आगे बढ़ाने का श्रेय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी जाता है, जिन्होंने सितंबर, 2014 में अपने अमेरिकी दौरे के दौरान न सिर्फ संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दिया अपितु अनेक सभाओं को हिंदी में ही संबोधित किया। ऐसा करके उन्होंने हिंदी की स्वीकार्यता एवं प्रासंगिकता पर मोहर जड़ने का काम किया। सूरीनाम में सम्पन्न हुए सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में भारत ने जिस मजबती से संयुक्त राष्ट्र की सातवीं भाषा हिन्दी को बनाए जाने की वकालत की, उससे हिन्दी के इस मुकाम तक पहुंचने की संभावनाएं बढ़ी थीं। 

आचार्य विनोबा भावे ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को मान्यता प्रदान करवाने के प्रयास में तेजी लाने की बात की थी। 1975 में नागपुर में संपन्न प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में रूस के एक हिंदी विद्वान प्रो. येगेनी चेलीशैव ने कहा था, “समसामयिक विश्व में बढ़ती सकारात्मक भमिका अदा कर रहे महान एशियाई देश की एक सर्वाधिक विकसित और प्रचलित भाषा हिंदी को ‘विश्व भाषा’ बनाना चाहिए।” 

संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की अनिवार्यता की बात ही हिंदी वालों के लिए हर्ष की सिहरन पैदा कर जाती है। इस स्थिति की कल्पना भावनात्मक रूप से प्रभावकारी है। हिन्दी में वे सारी खूबियां भी हैं, जो इसे वैश्विक भाषा बनने की सामर्थ्य और क्षमता प्रदान करती हैं। इधर हिन्दी ने अपने तेवर-कलेवर भी बदले हैं और उसने समय के साथ चलने का हुनर सीख लिया है। वह बाजार की भाषा बन चुकी है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भाषा बन चुकी है। साहित्य की शीर्ष भाषा तो यह पहले भी थी और आज भी है। अंतरजाल यानी इंटरनेट से जुड़े उस भ्रम को भी हिन्दी तोड़ चुकी है, जो इस तकनीक पर अंग्रेजी के वर्चस्व को लेकर पश्चिमी देशों एवं अमेरिका के लोगों ने पाल रखा था। अपनी सम्प्रेषणीयता के कारण हिन्दी व्यवहार की भाषा बन चुकी है। इस लिहाज से हिन्दी की प्रासंगिकता संयुक्त राष्ट्र में उन छह भाषाओं (अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच, चीनी, स्पेनिश व अरबी) से कमतर नहीं है, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्रदान की जा चुकी है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को वैधानिक भाषा का दर्जा दिलाने का मामला मौजूदा स्थितियों में तर्क की कसौटी पर शत प्रतिशत खरा उतरता है। इसे सिर्फ भावात्मक आलोड़न नहीं कहा जा सकता। विश्व हिंदी सम्मेलन करने के पीछे मुख्य प्रेरणा भी यही थी कि हिंदी को विश्व भाषा के रूप में कैसे स्थापित किया जाय और विश्व भाषा का सबसे आसान नुस्खा यही था कि इसे 

विश्व पंचायत के सबसे बड़े लोकतांत्रिक केंद्र संयुक्त राष्ट्र में स्थापित कर दिया जाय। इस संदर्भ में यह महज संयोग नहीं है कि पिछले कई दशकों से लगातार हर विश्व हिंदी सम्मेलन में यह प्रस्ताव स्वीकृत किया जाता रहा है। 

संयुक्त राष्ट्र में महाशक्तियों की भाषाओं को मान्यता प्राप्त है। स्पेनिश और अरबी बोलने वाला कोई देश महाशक्ति नहीं है पर इन भाषाओं को बोलने वाले देशों की संख्या बहुत बड़ी है और उन देर्शो में आज भी विश्व राजनीति का मुख्य संचालक पेट्रोल मिलता है। इसी तर्क की तरह हिन्दी के पक्ष में यह तर्क है कि हिन्दी 22 देशों में करीब 100 करोड़ लोग बोलते हैं। अगर राष्ट्र संघ वास्तव में जनतंत्र संचालित संस्था होती तो जनतंत्र का तर्क हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनवाने के लिए काफी था। पर वहां तो महाशक्ति के तर्क का बोलबाला है। भारत के शासक भारत को एक महाशक्ति बनाने के प्रयास में हैं और हिन्दी को विश्व भाषा बनाने का प्रयास उसी दिशा में एक कदम है। 

जिस संयुक्त राष्ट्र को हम ‘जादू की छड़ी’ समझ रहे हैं, आज खुद उसकी स्थिति और चरित्र में बुनियादी बदलाव दिखाई पड़ रहा है। वह अपनी विश्वसनीयता के लिए ही नहीं अस्तित्व रक्षा के लिए भी जूझ रहा है। उसकी लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता और विश्वव्यापी चरित्र भी संदिग्ध हो चले हैं। पिछले दो दशकों से महाबली अमेरिका ने नितांत अपने व्यक्तिगत हितों के लिए इस विश्व संस्था का जैसा मनमाना और निर्मम इस्तेमाल किया है उससे इसकी साख रसातल में जा चुकी है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र द्वारा हिन्दी के प्रति आंखें मूदें रहना भारत के प्रति भेदभावपूर्ण रवैये का द्योतक है। यह भेदभाव सिर्फ हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाए जाने के स्तर पर ही परिलक्षित नहीं होता है, बल्कि सुरक्षा परिषद की सदस्यता के मसले पर भी दिखता है। भारत से जुड़े अन्य अनेक प्रकरणों में भी संयुक्त राष्ट्र तटस्थ भूमिका नहीं निभा पाया। संयुक्त राष्ट्र का यह हठीला रवैया हिंदी की प्रासंगिकता के बावजूद उसकी स्वीकार्यता में बाधक है। 

हिंदी को विश्वभाषा बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र का ठप्पा लगना जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी की अनिवार्यता उसका लोकतांत्रिक अधिकार है और उसे यह अधिकार मिलना ही चाहिए। इसके लिए विश्व भर के हिन्दी अनुरागी जिस ढंग से प्रतिबद्ध हैं, उस प्रतिबद्धता का अभाव हमारी सरकार में साफ दिखता है। संयुक्त राष्ट्र पर हिन्दी का झंडा फहराने के लिए इस अभाव को दूर करना होगा। 

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