Santo ki Prerak Kahaniya-छोटा बड़ा,संत की परीक्षा,मातृभूमि के लिए बलिदान

Santo ki Prerak Kahaniya-छोटा बड़ा,संत की परीक्षा,मातृभूमि के लिए बलिदान

Santo ki Prerak Kahaniya-छोटा-बड़ा

एक बार अपने आश्रम में गांधी जी ने यह योजना बनाई कि भोजनोपरांत जूठे बर्तनों को सब लोग मिलजुल कर ही साफ किया करें। पहले यह नियम था कि हर व्यक्ति अपने जूठे बर्तन स्वयं ही धोता था और उन्हें रसोई में रखता था। इस नियम का उद्देश्य यह था कि प्रत्येक व्यक्ति अपना काम स्वयं करे और ज्यादा से ज्यादा स्वावलंबी बनने पर ध्यान दे। 

Santo ki Prerak Kahaniya-छोटा-बड़ा

बाद में नियम बनाया गया कि बारी-बारी से दो-तीन व्यक्ति सबके जूठे बर्तन मांजा करें। इससे आश्रमवासियों में प्रेम बढ़ेगा तथा दूसरों के जूठे बर्तन साफ करने से जो घृणा होती है उससे भी छुटकारा मिलेगा। इस नियम के पीछे अलग-अलग बर्तन मांजने में हर व्यक्ति के लगने वाले समय और श्रम से बचने की भावना तो थी ही। 

महात्मा गांधी ने जब इस नियम का महत्व आश्रमवासियों को समझाया तो उनकी बात का स्वागत नहीं हुआ। आश्रमवालों को यह बात गले नहीं उतरी। कुछ तो इसका विरोध करते हुए यह भी कहने लगे कि सबके जूठे बर्तन मांजने से व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न हो जाएगा। 

इस पर गांधी जी ने कहा, “व्यवस्था को सुचारू बनाए रखना ही तो मेरा काम है। मैं इस नियम का महत्व समझाने की ज्यादा सामर्थ्य नहीं रखता हूं।” इतना कहकर बापू और बा दोनों बर्तन मांजने लगे। 

शुरू में तो किसी ने समझा नहीं, पर जब बा और बापू बर्तन मांजने बैठ गए तो आश्रमवासियों का मन बदला, तब उन पर इसका प्रभाव पड़ा और वे भी उनके साथ बर्तन मांजने में जुट गए। कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता। 

santo ki katha संत की परीक्षा

एक संत का संपूर्ण जीवन परमात्मा के चरणों में समर्पित था। उनका विचार था कि ईश्वर के निरंतर चिंतन से जीवन अमृतमय हो जाता है। संसार की सभी वस्तुएं नश्वर और क्षणभंगुर होती हैं। इनमें अनुरक्ति हमें कष्ट पहुंचाएगी। 

एक दिन संत एकांत में बैठकर साधना कर रहे थे कि उनके एक मित्र वहां पहुंचे। उनके वह मित्र उस दिन सोचकर आए थे कि वह संत की परीक्षा लेंगे। उन्होंने कुछ इस तरह की भाव-भंगिमा बनाई जैसे किसी बात को लेकर बहुत चिंताग्रस्त हों। 

santo ki katha- संत की परीक्षा

उनकी ऐसी स्थिति देखकर संत ने पूछा, “आप बहुत चिंतित दिखाई दे रहे हैं। आखिर बात क्या है?” 

मित्र बोले, “कुछ मत पूछो मित्र! शायद हम लोगों के भाग्य में ऐसा बरा दिन देखना ही लिखा था। क्या आपको मालूम नहीं हुआ कि आज रात को ही संपूर्ण संसार काल के गाल में समा जाएगा। रात को प्रलय आ जाएगी।” 

यह सुनकर संत आनंद से झूम उठे। उन्होंने हंसकर कहा, “मित्र! यह तो आपने बड़ी अच्छी बात बताई। इससे बढ़कर दूसरा कोई शुभ समाचार हो ही क्या सकता है। इस जीवन के विषय में कुछ भी तय करने वाले हम तो नहीं हैं। इसका रहना या नष्ट होना उस अदृश्य शक्ति के हाथ में है। फिर हम क्यों इसे लेकर चिंतित हों। मनुष्य इसलिए इतने कष्ट झेलता है, क्योंकि वह स्वयं को ही नियंता मान बैठता है जबकि नियंता तो कोई और है। इसलिए जब तक जीवन है तब तक हम प्रसन्न होकर जीएं और सत्कार्यों से दूसरों का जीवन भी सुखी बनाने का प्रयास करें।” 

संत के मुख से ऐसे शब्द सुनकर उनका मित्र अवाक् होकर उन्हें देखता रह गया। 

संत ने आगे कहा, “यह भविष्यवाणी तुम नहीं सुनाते, तो मृत्यु का कोई निश्चय नहीं था कि वह कब आएगी, अब तो निश्चय हो गया, अब तो आखिरी समय के लिए स्वयं को तैयार कर लो। कुछ शुभ कर्मों का आयोजन और परमात्मा का स्मरण, यही तो मृत्यु को सहज स्वीकार करने के योग्य बनाते हैं। जिसके पास ये हैं, उन्हें मृत्यु का कैसा भय? वह तो मृत्यु को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने का साधन बना लेता है।” 

santo ki katha in hindi-मातृभूमि के लिए बलिदान 

यह घटना आजादी से कुछ वर्ष पहले की है। उड़ीसा के ढेंकानाल जिले मा में अनगुल नाम का एक गांव है। उन दिनों देश में आजादी के आंदोलन की लहर दौड़ रही थी, अत: ढेंकानाल की जनता भी जोश में थी। वहां के लोग अपने राजा के विरुद्ध एकजुट होने लगे थे। वे लोग प्रजा परिषद के गठन की मांग कर रहे थे। 

santo ki katha in hindi-मातृभूमि के लिए बलिदान 

ढेंकानाल का राजा अंग्रेजों के हाथ की कठपुतली बना हुआ था। उसने प्रजा के लिए कुछ करने के स्थान पर उसे दबाना चाहा और इसके लिए अंग्रेजों से सहायता मांगी। अंग्रेजों ने सहायता देने के बदले उसके सामने यह शर्त रखी कि आंदोलन दबाने के बाद उस राज्य का संचालन उन्हें सौंपना होगा। राजा ने अंग्रेजों की यह शर्त मान ली। 

अंग्रेज अनगुल जाने के लिए नदी के उस पार आ गए। नदी के किनारे एक 12 वर्षीय लड़के से कप्तान ने कड़ककर कहा, “ए लड़के! हमें उस पार जाना हैं|

लड़का तमककर खड़ा रहा और उसने आज्ञा नहीं मानी। कप्तान ने गुस्से में आकर फिर से लड़के को नाव लाने के लिए कहा, किंतु उसने नदी पार कराने से स्पष्ट इनकार कर दिया। कप्तान ने सभी सैनिकों को नाव पर चढ़ने का आदेश दिया, किंतु लड़का पतवार लेकर बीच में अड़ गया। फिर भी एक अंग्रेज सिपाही आगे बढ़ा तो लड़के ने पतवार से उसके सिर पर वार कर दिया। वह खून से लथपथ होकर नीचे गिर पड़ा। छह यह देख कप्तान ने पिस्तौल निकाल ली और गोली चलाकर लड़के की जान ले ली। अनगुल का यह सबसे साहसी किशोर बाजीराव अपने राज्य के लिए शहीद हो गया। 

दरअसल, न्याय और सत्य का साथ देने के लिए साहस और आत्मत्याग अति आवश्यक उपादान हैं। 

 sant ki kahani-चंचल मन की आकांक्षाएं

 एक कवि महोदय थे, जिनका नाम था बैरन। उन्हें जहां कहीं भी कोई सुंदर नारी नजर आती, वे उसे लोलुप निगाहों से घूरने लगते। एक बार की बात है कि बैरन एक सुंदर लड़की का बहुत दिनों से पीछा कर रहे थे। उनकी हरकतें कुछ इस प्रकार की थीं कि वह लड़की परेशान हो गई। फिर वह लड़की बैरन की इन परेशानियों से निजात पाने के लिए बैरन से शादी करने को तैयार हो गई। लेकिन उसने बैरन के सामने यह शर्त रखी कि वह ऐसी हरकतों की पुनरावृत्ति नहीं करेंगे। 

बैरन ने कहा, “मैंने इतने सारे यत्न तुम्हें पाने के लिए ही किए थे, अब जब मैं तुम्हें पा चुका हूं तो मेरे पास और कोई आशा शेष नहीं बची।” दोनों एक चर्च में गए और पादरी के सामने विवाह कर लिया। 

जिस समय वे शादी करके चर्च की सीढ़ियां उतर रहे थे, उसी समय एक दूसरी सुंदर लड़की चर्च के अंदर जा रही थी। बैरन तुरंत अपनी नई-नवेली पत्नी का हाथ छोड़कर उस नई लड़की की ओर मुखातिब हो गए। उनकी पत्नी ने उन्हें पादरी के सामने ली गई शपथ की याद दिलाई। 

बैरन ने जवाब दिया, “देखो डार्लिंग! यह तो तुम जानती ही हो कि मनुष्य का मन बहुत ही चंचल होता है। उसे जो नहीं मिला रहता, उसे पाने की बड़ी आशा लगी रहती है। इंतजार और पीछा करने में जो आनंद था, उसकी सफलता यह रही है कि तुम मुझे प्राप्त हो गईं। अब मैं इस ओर से निश्चित हो गया, क्योंकि तुम मेरी हो चुकी हो।” 

कथा का निहितार्थ यह है कि जो वस्तु हमें मिल जाती है, उसकी ओर से हम निश्चित हो जाते हैं और जो चीज हमारी पहुंच से दूर होती है, उसे पाना चाहते हैं। 

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