संगति पर निबंध

Sangati par nibandh

संगति पर निबंध-Sangati par nibandh

संगति’ का अर्थ है—’साथ’। मनुष्य का जीवन नीरस हो जाए, सूना हो जाए, यदि उसे किसी का साथ न मिले, उसे किसी की संगति न मिले। किंतु, हम किसकी संगति करें, किसकी संगति न करें—यह गंभीरतापूर्वक विचारणीय है। 

उत्तम मनुष्यों की संगति से हमारा जीवन सुधर जाता है और हमारे जीवन में समृद्धि और सम्मान के सारे वातायन खुल जाते हैं। जैसे, खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है, उसी प्रकार अच्छे मनुष्यों की संगति में हमारा रंग बदल जाता है, आचरण सुधर जाता है। काँच भी सूर्य की सुनहली किरणों का संस्पर्श पाकर मरकतद्युति प्राप्त कर लेता है, कीट भी सुमन की संगति से सुरों के सिर पर चढ़ता है। काला-कलूटा सस्ता लोहा जिस प्रकार पारस की संगति पाकर मूल्यवान दमकता सोना बन जाता है, उसी प्रकार एक साधारण मनुष्य भी महापुरुषों, ज्ञानियों, विचारवानों एवं महात्माओं के संग से बहुत ऊँचा उठ जाता है। कबीर ने ठीक ही लिखा है 

कबिरा संगति साधु की, हरै और की व्याधि । 

संगति बुरी असाधु की, आठौं पहर उपाधि ॥ 

गोस्वामी तुलसीदास ने सुसंगति को स्वर्ग और अपवर्ग से भी महत्त्वपूर्ण माना है। सत्संग तो पारसमणि है, जिसके कारण बुरे व्यक्ति भी कंचन की तरह मूल्यवान हो जाते हैं 

भर्तृहरि का कथन है-सत्संगति बुद्धि की जड़ता नष्ट करती है, वाणी को सत्य से सींचती है, मान बढ़ाती है, पाप मिटाती है, चित्त को प्रसन्नता देती है, संसार में नश फैलाती है। सत्संगति मनुष्य के लिए क्या नहीं करती? 

वानर-भालुओं को कौन स्मरण रखता है? किंतु हनुमान, सुग्रीव, अंगद, जांबवान-सभी अविस्मरणीय बन गए हैं, क्योंकि उन्होंने श्रीराम की संगति की थी। इसी तरह गौतम बुद्ध, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गाँधी इत्यादि के संपर्क में आकर कितनों के जीवन की गतिविधियाँ बदल गईं, कितने जीवन के मैदान में विजयी हए तथा संसार के इतिहास में अमर हो गए।  

इसी प्रकार, यदि मनुष्य कुसंगति में पड़ जाए, तो उसका सर्वनाश सुनिश्चित है। काजल की कोठरी में चाहे कैसा भी सयाना क्यों न चला जाए, उसे काजल की रेख अवश्य लग जाएगी। दूध जैसा पवित्र पदार्थ भी कलारिन के हाथ हो, तो मद समझा जाता है। रहीम ने ठीक ही लिखा है 

रहिमन नीचन संग बसि, लगत कलंक न काहि । 

दूध कलारिन हाथ लखि, मद समुझहिं सब ताहि ॥ 

अतः, कभी बुरे मनुष्य की संगति नहीं करनी चाहिए। एक लैटिन लोकोक्ति है-‘यदि तुम सदैव उनके साथ रहोगे, जो लँगड़े हैं, तो तुम स्वयं लँगड़ाना सीख जाओगे।’ जर्मन लोकोक्ति है-‘जब फाख्ने का कौओं से संयोग होता है, तब उसके पैर श्वेत रह जाते हैं, किंतु हृदय काला हो जाता है।

अतः, हमारी सर्वतोमुखी प्रगति की स्वर्णिम कुंजियों में एक यह भी है-सुसंगति । ‘संसर्गजाः दोषगुणाः भवन्ति’-संसर्ग से ही दोष-गुण होते हैं। बहुत प्रौढ़ हो जाने पर महात्माओं को भले ही कुसंगति का विष न व्यापे–’चंदन बिष ब्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग’, किंतु बच्चों एवं सामान्य मनुष्यों को सुसंगति बनाती है और कुसंगति बिगाड़ती है-इसमें कोई संदेह नहीं।

अतः, यदि हम लौकिक और पारलौकिक उन्नति चाहते हैं, तो संगति के महत्त्व को समझें-सुसंगति का मूल्यांकन करें। यह सुसंगति सचमुच सम्यक गमन, ज्ञानप्राप्ति, मोक्ष इत्यादि सभी अर्थों में हमें गति प्रदान करती है-यह बिलकुल सच है। अतः, हम जीवन के क्षण-क्षण को सुसंगति में ही बिताएँ।

एक घड़ी, आधौ घड़ी, आधौ में पुनि आध। 

तुलसी संगति साधु की, हरै कोटि अपराध ॥ 

-रहीम 

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