सामाजिक ज्ञानवर्धक कहानियां-सूरज और चांद में झगड़ा क्यों

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सामाजिक ज्ञानवर्धक कहानियां-सूरज और चांद में झगड़ा क्यों

जब सूरज निकलता है तो चांद छुपा रहता है और जब चांद के निकलने की बारी आती है, तो सूरज छिप जाता है। सूरज व चांद को देखकर कभी उनके बारे में यह सोचा है कि दोनों हमेशा अलग-अलग क्यों रहते हैं ? दोनों के इस संबंध के पीछे एक लोक कथा भारत के कई अंचलों में प्रचलित है। 

बहुत समय पहले की बात है। एक जगह एक बुढ़िया रहती थी। उस बुढ़िया के दो बच्चे थे-सूरज और चांद । बुढ़िया अपने छोटे बेटे से खेती में मेहनत करके साग-पात उगाती और उसी से अपने इस छोटे से परिवार का भरण-पोषण करती। इस प्रकार उन तीनों की जिंदगी आराम से कट रही थी। 

उस क्षेत्र का जमींदार एक बार तीर्थ यात्रा करने गया। जब वह यात्रा से लौट कर आया तो इसकी खुशी में उसने एक भोज का आयोजन किया। बुढ़िया के दोनों बेटों, सूरज और चांद को भी जमींदार के भोज में बुलाया गया था। निश्चित दिन पर जब दोनों भाई भोज में जाने लगे तो बुढ़िया ने उनसे कहा, “बेटो, तुम दोनों तो भोज में जा रहे हो, मेरे लिए भी वहां से कुछ खाने के लिए ले आना।” 

दोनों भाई भोज में पहुंचे। बड़े अच्छे-अच्छे पकवान बनाए गए थे। भोज शुरू होते ही विभिन्न तरह के पकवान देखकर सूरज खाने में जुट गया। वह खाने में इतना मशगूल हो गया कि उसे मां की बात एकदम भूल गई। उधर चांद को मां की बात याद थी। उसने स्वयं तो भरपेट खाया ही, साथ ही साथ कुछ पकवान मां के लिए भी रख लिए। भोजन समाप्त हुआ। घर पहुंचने पर मां ने सूरज से खाने की चीज मांगी, तो उसने खाली हाथ दिखा दिया। मां को गुस्सा आ गया और उसने कहा, “जा तू हमेशा जलेगा और दूसरों को भी जलाएगा।” 

तभी चांद आ पहुंचा, मां ने उससे भी खाने की चीज मांगी तो उसने अपने साथ लाई सामग्री मां के सामने रख दी। मां पकवान देखकर प्रसन्न हो उठी और उसे आशीर्वाद दिया, “बेटा तू हमेशा ठंडा रहेगा और दूसरों को भी ठंडक पहुंचाएगा।” 

मां के कहने का दोनों पर तुरंत असर होने लगा-सूरज गरम होने लगा व चांद शांत-शीतल । इस स्वरूप परिवर्तन के बावजूद दोनों भाइयों में भाईचारा अभी भी बना हुआ था। 

कालांतर में दोनों भाइयों की शादी हुई और शादी के बाद धीरे-धीरे बच्चे भी हुए। एक दिन बात-बात में दोनों भाइयों में शर्त लगी कि देखें कौन जल्दी से अपने बच्चों को छिपा सकता है। सूरज ने अपने बच्चों को किसी अनजानी जगह पर छिपाने की सोची। उसने बच्चों को बहुत गहरे गड्ढे में डाल दिया, लेकिन चांद ने बच्चों को ऐसी जगह छिपाया, जहां से उन्हें आसानी से प्राप्त किया जा सके। 

बाद में चांद ने सूरज से कहा, “सूरज भाई, चलो अपने-अपने बच्चे लाएं।” सूरज मान गया। चांद ने तो तुरंत अपने बच्चों को छिपाने की जगह से लाकर खडा कर दिया, लेकिन सूरज चिंतित हो उठा। अब वह अपने बच्चों को उस गड़े से निकाल तो कैसे? चांद ने यह देखा तो उसे बड़ा दुख हुआ। उसने दुखी स्वर में कहा, “सूरज भाई, तुम्हारा यह कार्य देखकर मुझे बहुत कष्ट पहुंचा है। आज से न तातू मरा भाई है और न हममें मेलजोल रहेगा। मैं अब से तुम्हारी परछाईं भी नहीं देखूगा। आज से हम दोनों कभी नहीं मिलेंगे।” 

और उसी दिन से चांद ने सूरज को अपने से अलग कर लिया। कहते हैं, तभा से सूरज आग का गोला बना अकेला जलता रहता है और चांद सारे संसार में शीतलता बिखेरता रहता है। चांद के साथ उसके ढेर सारे बच्चे भी रहते हैं, जिन्हें हम सितारे कहते हैं।

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