समाजसेवा पर निबंध| Essay on Social Service

समाजसेवा पर निबंध

समाजसेवा पर निबंध-Essay on Social Service

 एक वाक्य हम सदा सुनते आए हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, किंतु क्या उसने कभी इस वाक्य की अर्थव्याप्ति पर ध्यान दिया हैं? हम छोटे-से सूक्त्यात्मक वाक्य के चाहे जितने भी अर्थ खींचते जाएँ, किंतु इतना तो स्पष्ट ही है कि मनुष्य की सारी विकास-कथा उसके समाज की सुनहली पटभूमि पर ही विनिर्मित हुई है। जल में कुछ काल रहने के पश्चात् भले ही मत्स्यशिशु स्वयमेव संतरण जान जाए, नीड़ में कुछ समय बिताने के बाद विहगकुमार भले ही व्योमविहार आरंभ कर दे, किंतु मानव तो बिलकुल लोथ बनकर पड़ा रहेगा, यदि उसे चलना न सिखाया जाए, वह बिलकुल निर्वाक् हो जाएगा, यदि उसे बोलना न सिखाया जाए।

वह सारे शिष्टाचारों से अनभिज्ञ-सारी विद्याओं से विरहित एक ऐसा प्रस्तरखंड बन जाएगा कि उसे सृष्टि का शिरोभूषण कान स्वीकार करेगा? मानव विधाता की सारी सर्जनाओं की मुकुटमणि है, इसका कारण उसका समाज है। अतः, जिस समाज ने हमें मानव कहलाने का अधिकार ही नहीं दिया, वरन् सृष्टि का सर्वोत्तम वरदान बनने के अनुकूल बनाया, उसके प्रति हमारा कितना उत्तरदायित्व है, इसे हमें कदापि नहीं भूलना चाहिए। 

वस्तुतः, वही मानव मानव है, जिसके प्राणों में समाजसेवा का दिव्य संगीत अहरह गूंजता रहता है, जिसकी नस-नस में समाजसेवा का मंगलवाद्य बजता रहता है। धन-संपत्ति, शारीरिक सुख और मान-बड़ाई आदि के प्रलोभन से समाजसेवा करना कतई उचित नहीं।

आसक्ति और अहंकार से युक्त समाजसेवा कदा त हो जाती है। इसीलिए, विनोबा भावे ने ठीक ही कहा है कि सेवावृत्ति जितनी निरहंकार रहेगी, उतनी ही उसकी कीमत बढ़ेगी। सेवा ही वास्तविक संन्यास है। ‘सयासी केवल अपनी मुक्ति का इच्छुक होता है, पर सेवाव्रतधरी सपने को परमार्थ की बलिवेदी पर चढ़ा देता है’-महान उपन्यासकार प्रेमचंद ने ठीक ही कहा है। अतः, अहंकारशून्य होकर एवं 

वैयक्तिक लाभ को ध्यान में न रखकर ही समाजसेवा श्रेयस्कर है। हमारे मन-प्राणों से यदि यह अनुगूंज अनुक्षण निकलती रहे, तो क्या कहना ! – 

जब लगे तब हाथ परहित में लगे,

है जनमता जीवन जनहित के लिए।

लोक क्या परलोक भी बन जायगा,

जी लगाकर लोक की सेवा किए।

धन कमाएँ तो करें उपकार भी,

यह अगर है काल तो वह लाल है।

धन तजे पर लोकसेवा तज न दें,

हाथ की यह मैल है, वह माल है। 

-हरिऔध

समाजसेवा का पथ कोई कुसुमपथ नहीं है, वरन् यह तो अनलपथ है। गोस्वामीजी ने ठीक ही कहा है-‘सेवा धरम कठिन जग जाना।’ समाजसेवी को बहुत-कुछ छोड़ना पड़ता है। उसे वैयक्तिक लाभ के बहुत-सारे झरोखे बंद करने पड़ते हैं। उसे भोगविलास का पृथुल पर्यंक छोड़ना पड़ता है और काँटों का ताज पहनना पड़ता है। लोकरंजन के लिए श्रीराम ने अपनी नयनशलाका, हृदयकौमुदी, आसन्नप्रसवा सीता तक का परित्याग किया था, क्या हम नहीं जानते?

समाजसेवा के लिए भगवान कृष्ण, महात्मा ईसा, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, लोकमान्य तिलक, महात्मा गाँधी तथा मार्टिन लूथर किंग ने न मालूम कितनी बार जहर का प्याला पिया था, क्या यह बात हमसे छिपी है? किंतु, इस समाजसेवा के कंटकाकीर्ण मार्ग को वही अपना सकता है, जिसने समाजसेवा को ईश्वरसेवा का पर्याय मान लिया है। 

समाजसेवा का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक है। इसका आरंभ हमारे घर से होता है और यह गाँव तथा नगर से बढ़ते-बढ़ते राज्य की सीमा तक पहुँच जाता है। इतना ही नहीं, राज्य के प्राचीरों को लाँघते हुए देश की परिधि तक पहुँच जाता है, बल्कि हम कह सकते हैं कि अपने दामन में यह सारे संसार को लपेट लेता है। 

हमारे समाज में अज्ञानता की इतनी काई फैली हुई है, अंधविश्वास की ऐसी कुहेलिका छाई हुई है, भ्रष्टाचार की ऐसी बीमारी फैली हुई है कि समाजसेवी इनसे बचने के लिए शुतुरमुर्ग की तरह सर नीचा नहीं कर लेगा बल्कि वह इनके खिलाफ जेहाद बोलेगा। वह लोगों के बीच ऐसा वातावरण बनाएगा कि उनमें स्वयं प्रेरणा जगे, जागृति की लहर फैले। आज भी हमारे समाज में विधवा-प्रथा, दहेज-प्रथा, जाति-प्रथा, सांप्रदायिकता के विषैले कीटाणु फैल रहे हैं।

समाजसेवी इन्हें नष्ट करने की जी-तोड़ चेष्टा करेगा। दीनता-दानवी के चंगल में फँसे लोग भी परिवार-नियोजन करना पाप समझते रहे हैं; लाख-लाख बेकार श्रम को निकष्ट मानकर अपनी बलिष्ठ भुजाओं पर विश्वास न कर मामूली नौकरियों के लिए दफ्तरों के दरवाजों पर दस्तक देते चल रहे हैं। समाजसेवी इनके विरुद्ध वातावरण तैयार करेगा। वह इनके विरुद्ध गोष्ठियों का आयोजन करेगा, वह लोगों को आत्मनिर्भरता की दीक्षा देगा। 

अतः, सच्चा समाजसेवी अहर्निश अपने समाज से दुःख दैन्य, अशिक्षा, बीमारी को भगाने का भगीरथ प्रयत्न करता रहता है। वह सदा पृथ्वी पर स्वर्ग उतारने की चेष्टा में तल्लीन रहा करता है। वह जानता है कि व्यक्ति की एक-एक बूंद मिलकर ही समाज की सरिता बनी है, उसका एक-एक फूल मिलकर ही समाज का गजरा बनता है, उसकी एक-एक लौ से ही समाज का ज्योतिपर्व सजता है। समाज में एक वर्ण ऐसा है, जिसके पास भूख से अधिक भोजन है तथा दूसरा ऐसा, जिसके पास भोजन से अधिक भूख है। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, तब तक समाज सुखी नहीं हो सकता।

समाज में संतुलन और सच्चा समाजवाद लाने के लिए एक सच्चे समाजसेवी को सूली पर झूल जाने में भी संकोच नहीं होगा। यदि उसने मुरझाए ओठों पर मुस्कराहटों की चाँदनी बिछा दी, यदि बुझी-बूझी आँखों में प्रसन्नता की मंदाकिनी बहा दी, तो इसे वह अपना अहोभाग्य समझेगा। यदि उसने एक प्यासे को पानी पिला दिया, तो इसे वह अपना पितृतर्पण समझेगा, यदि उसने एक भूखे की भूख मिटा दी, तो इसे वह पिंडदान समझेगा, यदि वह किसी पंगु की बैसाखी बन सका, तो अपने जीवन की सार्थकता समझेगा, यदि वह किसी अंधे की लाठी बन सका, तो अपना भाग्य सराहेगा। 

अतः, हमें सदा स्मरण रखना चाहिए कि अच्छा समाज शरीर जैसा है। यदि उसका एक अंग दुर्बल या पीड़ित है, तो उसका सारा शरीर दुर्बल और पीड़ित रहेगा। यदि कहीं, एक स्थान पर रक्त-प्रवाह रुक जाए, तो संपूर्ण शरीर का अस्तित्व संदेहजनक हो जाएगा।

अतः, हम अपने को समाज से काटकर सोचने की आदत छोड़ें। समाजसेवा वस्तुतः और कुछ नहीं, स्वयंसेवा ही है। यदि हम अपना कल्याण करना चाहते हैं, तो समाजसेवा, के अनुष्ठान को अपनी हर साँस में बसा लें। स्वामी रामतीर्थ ने ठीक ही कहा है- “तुम समाज के साथ ही ऊपर उठ सकते हो और समाज के साथ ही तुम्हें नीचे गिरना होगा। यह तो नितांत असंभव है कि कोई व्यक्ति अपूर्ण समाज में पूर्ण बन सके। क्या हाथ अपने-आपको शरीर से पृथक् रखकर बलशाली बन सकता है? कदापि नहीं।”