सफलता का रहस्य पर निबंध | Safalta ka Rahsya par nibandh

सफलता का रहस्य पर निबंध |

सफलता का रहस्य पर निबंध-Safalta ka Rahsya par nibandh

ऐसा कौन मनुष्य होगा, जो यह न चाहे कि सफलता की सुकुमारी उसकी ग्रीवा में वरमाला डाल दे? मनुष्य के मन-प्राणों के गहरे तहखाने से एक ही आवाज आती है-सफलता ! उसके रोम-रोम में एक ही रागिनी बजती है-सफलता ! उसकी जीवन-वीणा के तारों से एक ही गूंज सुनाई पड़ती है-सफलता ! किंतु क्या केवल ‘सफलता-सफलता के उच्चारण मात्र से जीवन में सफलता मिल जाती है? कदापि नहीं।

तब व्यक्ति सफलता प्राप्ति का रहस्य जानना चाहता है; वह कोई ऐसी जादुई कुंजी पा लेना चाहता है, जिससे सफलता का कुबेरकोष उसे प्राप्त हो जाए। वह अलादीन का चिराग पा लेना चाहता है, जिससे सफलता के सारे बंद दरवाजे खुल जाएँ। वह ऐसा अमोघ मंत्र पा लेना चाहता है, जिससे सफलता की रानी इठलाती हुई उसके पास चली आए। 

सफलता का राज जानने के लिए मानव के मन-प्राण बेचैन बने रहते हैं, किंतु यह जान लेना जरूरी है कि सफलता-प्राप्ति की कोई एक स्वर्णिम कुंजी नहीं है, जादुई चाबी नहीं है; सफलता के कुछ सूत्र अवश्य हैं। यदि इन सूत्रों पर पूरी दृढ़ता के साथ अमल किया जाए, तो सफलता हमारे लिए रंगीन मृगतृष्णा नहीं, खूबसूरत छलना नहीं, महाठगिनी माया नहीं, वरन् एक ठोस वास्तविकता, एक सहृदय सहचरी, एक अनुरागिनी अनुचरी बन जाएगी, इसमें संदेह नहीं। 

सफलता का पहला सूत्र है अपनी रुचि और प्रवृत्ति, अपनी क्षमता और शक्ति के पार अपना लक्ष्य निर्धारित करना। लक्ष्यनिर्धारण के पश्चात् उसपर निरंतर अडिग आवश्यक है। डिजराइली ने कहा है-लक्ष्य को हमेशा अपने सामने रखो और सतत प्रयास में लगे रहो-सफलता का यही रहस्य है। उस लक्ष्य पर निष्ठा और एकाग्रता आवश्यक है। ध्येय की सफलता के लिए मनुष्य की पूर्ण एकाग्रता और समर्पण आवश्यक है। उसके प्रत्येक स्पंदन में यदि उसका लक्ष्य बस जाए, उसकी प्रत्येक फड़क में यदि उसका लक्ष्य टैंक जाए, तो समझिए सफलता की आधी मंजिल मिल गई, उसकी आधी दूरी तय हो गई।

लक्ष्यवेद में अर्जुनदृष्टि होनी चाहिए। इधर-उधर भटकने से, लक्ष्य के पाँच नावों पर पाँव रखने से डूबने के सिवा और कोई चारा नहीं। कुछ लोग कार्यांरभ तो करते हैं, किंतु विघ्नों के झोंके उनके लक्ष्य की लौ को बुझा डालते हैं; उनकी गति मद्धिम कर देते हैं। विघ्नों के डर से वे अपना मार्ग बदल देते हैं। किंतु, जो विघ्नों की छाती पर अपने अंगदचरण रोपते हुए आगे बढ निकलते हैं, उनकी विजय निश्चित है। भर्तृहरि का कथन है- 

प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः 

प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः 

विघ्नः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः 

प्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति ।। 

(निम्न लोग विघ्नों के भय से किसी काम का प्रारंभ ही नहीं करते, मध्यम श्रेणी के लोग प्रारंभ करके विघ्न आने पर रुक जाते हैं, किंतु उत्तमजन बार-बार विघ्नों के आने पर भी कार्य आरंभ करके बिना पूरा किए नहीं छोड़ते।) 

अपने लक्ष्य की ओर निरंतर चरणनिक्षेप-सतत साधना ही सफलता का दूसरा सूत्र है। सफल मस्तिष्क बरमे की तरह एक बिंदु पर केंद्रित होकर ही कार्य करता है। असफलताएँ तो सफलतारूपी प्रासाद के स्तंभ-रूप हैं (Failures are the pillars of success.)। यदि असफलताओं के सामने कोई पड़ जाए, तो निर्भीक अभिमन्यु की तरह उसके भेदन के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। यदि विघ्नों का विंध्याचल हमारे मार्ग में अवरोध उत्पन्न करे, तो हमें अगस्त्य की तरह उसे अपने पाँवों तले रौंद डालना चाहिए। 

निरंतर परिश्रम से ही सफलता के मोती मिलते हैं। सफलता के हीरकरत्न तो परिश्रम के फावड़े से ही निकाले जा सकते हैं। हेनरी सी० क्रेक ने कहा था-सफलता का कोई रहस्य नहीं है, वह केवल अतिपरिश्रम चाहती है। परिश्रम उज्ज्वल भविष्य का जनक है। विश्राम विफलता के गर्त में धकेल देता है। 

ब्राउन ने ठीक ही कहा है-साहस सफलता के लिए सर्वाधिक महत्त्व की वस्तु है। साहस विपदाओं की भीषण बाढ़ में पतवार का काम करता है। डिजराइली ने कहा है—सफलता तो साहसिकता की बेटी है (Success is the child of audacity.)। असंभवता के आलबाल में साहस ही सुमन खिलाता है—इसमें संदेह नहीं। 

साहस के साथ आत्मविश्वास का रहना भी जरूरी है। कहा गया है-Where there is a will, there is a way. एमर्सन ने तो आत्मविश्वास को ही सफलता का प्रथम रहस्य माना है। यदि मनुष्य कार्य करे, किंतु उसका दिल चूहे का हो, वह बराबर भयभीत होता रहे, तो फिर सफलता संदिग्ध हो जाएगी। यदि थोड़ी-सी असफलता हुई, पराजय का एक कुहासा छाया और बस हम काँपने लगे; आस्था डिगने लगी, तो सफलता दूर भाग जाएगी।

शायद भाग्य में ही बदा नहीं, शायद हमारे अनुकूल नहीं है, शायद भाग्यलिपि ही कुछ गड़बड़ है, शायद हस्तरेखा ही ऐसी है-ऐसा सोचना ठीक नहीं। मनुष्य तो स्वयं अपना भाग्यविधाता है। बाह्य शक्तियाँ उसे पराजित नहीं कर सकतीं। नेपोलियन की यह उक्ति हर वक्त याद करनी चाहिए-मैं आया, मैंने देखा और मैंने जीत लिया’ (I came, I saw, I conquered) 

सफलता के और भी कई आनुषंगिक सूत्र हो सकते हैं—सुंदर स्वास्थ्य, ईमानदारी, दूसरों का विश्वास-अर्जन, व्यवहारकुशलता। लक्ष्य निश्चित होने पर भी वही व्यक्ति साधनारत रह सकता है, कठोर व्रत कर सकता है, जो पूर्णतः स्वस्थ हो। विजयी होने के लिए पत्थर-सी मांसपेशियाँ चाहिए, फौलाद-सी भुजाएँ चाहिए, वज्र-से चरण चाहिए। जो व्यक्ति दिन-रात रोगपीड़ित हो, रोज पेटदर्द और सरदर्द से परेशान हो, उसकी सफलता संदिग्ध ही है। अतः, सफलता प्राप्ति के लिए तन और मन की स्वस्थता अत्यावश्यक है। 

जीवन में सफलता पाने के लिए मनुष्य का संयत होना भी जरूरी है। संयमहीन मनुष्य उस नाविक की तरह है, जिसके पास कंपास न हो, हवा का झोंका जिधर चाहे, बहा ले जाए। क्रोध का हर झोंका और अविचार की हर तरंग उसे इधर से उधर बहा ले जाती है और उसे अपने लक्ष्य तक पहुँचने में कठिनाई होती है। छोटी-सी बात पर क्रुद्ध हो जाना, आपा खो देना ठीक नहीं।

ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है (Honesty is the best policy.)। ईमानदार और व्यवहारकुशल व्यक्ति मिट्टी से सोना बना लेता है। ईमानदारी सबसे बड़ी संपत्ति है। इसके सामने सोना-चाँदी की थैली बेकार है। उसी प्रकार व्यवहार-कुशलता मनुष्य को व्यक्ति दूसरे का विश्वासभाजन एवं प्रीतिभाजन शीघ्र ही बन जाता है और इससे भी जीवन में सफलता प्राप्ति सहज हो जाती है। 

अतः, निर्धारित लक्ष्य पर विश्वास एवं साहसपूर्वक सतत श्रम करते जाने और अपने संकल्प को साधना की दिशा देते जाने से ही सफलता का रश्मिलोक हमारे म्लान जीवन. को जगमग कर देगा, हमारे अभिशप्त जीवन को वरदानों से भर देगा, हमारे उपेक्षित एवं उपालंभित जीवन को उपहारों एवं सफलताओं से आभूषित कर देगा, इसमें किसी प्रकार का संदेह नहीं।