सामाजिक ज्ञानवर्धक कहानियां-सुख की राह 

सामाजिक ज्ञानवर्धक कहानियां

सामाजिक ज्ञानवर्धक कहानियां-सुख की राह 

बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

एक बार की बात है, राजा भोज और कवि कालिदास घूमने निकले। राजा का नियम था कि जब वे घूमने जाते तब राजा की वेशभूषा छोड़ देते। जैसे साधारण लोग जाते हैं, उसी तरह घूमने निकलते। उन्हें कोई राजा के रूप में पहचान ही नहीं सकता था, क्योंकि उनकी वेश-भूषा ही ऐसी हुआ करती थी। 

कालिदास भी ऐसा ही करते। इस तरह घूमते तो काफी कुछ जानने-सुनने और देखने-समझने को मिलता। जहां मन होता घूमते-फिरते। 

उस दिन चलते-चलते राजा भोज ने पूछा, “क्यों कवि कालिदास, आज किस दिशा में चलेंगे?” कवि ने कहा, “आज दक्षिण की ओर चलेंगे।” राजा भोज बोले. “ठीक है, कल उत्तर दिशा में गए थे, तो आज दक्षिण की तरफ चलते 

दोनों चले। चलते जाते थे और देखते जाते थे। इस तरह बातें करते, देखते और चलते हुए शहर से दूर निकल गए। एक नदी आई। नदी के किनारे से थोडी दर पर पीपल का वृक्ष था। कवि कालिदास ने कहा, “थोड़ी देर यहां बैठे।” 

राजा भोज बोले, “हां, हां, सुंदर पीपल का वृक्ष है। उधर देखिए, गाएं चर रही हैं। नदी के किनारे पशु-पक्षी भी मौज-मस्ती ले रहे हैं, कितना अच्छा लग रहा है|

राजा भोज और कवि कालिदास दोनों वृक्ष की छांव में बैठ गए। नदी में एक व्यक्ति स्नान कर रहा था। किनारे एक दूसरा व्यक्ति खड़ा था। स्नान करने वाला व्यक्ति एक साधु था। दूसरे ने साधु महात्मा से पूछा, “महाराज, सुख की राह कौन-सी है?” साधु महात्मा कुछ बोले नहीं, सिर्फ हाथ लंबा कर उस पीपल के वृक्ष की तरफ इशारा कर दिया। उस दूसरे व्यक्ति ने समझा कि साधु महात्मा ने कहा कि वे दो व्यक्ति बैठे हैं, उनसे पूछो। वह व्यक्ति राजा भोज और कवि कालिदास के पास पहुंचा। प्रणाम कर बोला, “सच्चे सुख की राह बताएं।” कवि बोले, “हम क्या बताएं?” 

उस व्यक्ति ने कहा, “उन महात्मा जी ने आपकी ही तरफ उंगली दिखाकर पूछने का इशारा किया था, इसलिए मैं आपसे पूछने चला आया।” कवि कालिदास और राजा भोज को आश्चर्य हुआ। राजा ने कवि से कहा, “चलो साधु से ही पूछे कि उत्तर देने के लिए उस व्यक्ति को हमारे पास क्यों भेजा?”

कवि और राजा दोनों उस व्यक्ति को साथ लेकर साधु के पास पहुंचे। फिर कवि ने साधु से पूछा, “महाराज, सुख की राह बताने के लिए आपने इसे हमारे पास क्यों भेजा?” साधु हंसा और बोला, “सुख की राह बताने के लिए मैंने इसे आपके पास नहीं भेजा था। मैंने तो इसे सही व सुख की राह बताई थी।” वह व्यक्ति आश्चर्य से साधु की तरफ देखता रहा। कवि कालिदास तथा राजा भोज भी आश्चर्य से उसे देखते रहे, ‘साधु ने सुख की राह कहां बताई थी?’ साधु ने हंसकर कहा, “आप लोग अभी भी कुछ नहीं समझे अरे, मैंने तो उस पीपल के वृक्ष की तरफ इशारा किया था, आप दोनों की तरफ नहीं। सुख की राह वृक्ष की जड़ और डाल हमें समझाती है। जड़ जाती है धरती के नीचे और डाल धरती के ऊपर उठती है। जड़ में अधिक बल होता है।

पत्थर और कठोर भूमि को चीरकर जड़ नीचे जाती है और बढ़ती जाती है। इसीलिए जड़ में सुंदर पत्ते, सुंदर फूल और मीठा फल नहीं लगता। डाल ऊपर बढ़ती है। पत्थर या कोई कठोर चीज आड़े आती है तो वह वहीं रुक जाती है। उसमें तोड़ने-फोड़ने का बल जड़ की तरह नहीं होता। जड़ केवल नीचे जाती है, ऊपर नहीं उठती। डाल ऊपर आती है और उसके पत्ते सुंदर होते हैं, फूल सुंदर होते हैं और मीठे फल भी लगते हैं। सच्चे सुख का यही रास्ता है।” 

फिर समझाया, “सही और सच्चे सुख का ऐसा ही एक रास्ता है। जो नीचा काम करता है, वह नीचे जाता है। जड़ की तरह धरती में दब जाता है। इसमें सुख का फल नहीं लगता। इसके विपरीत जो ऊंचा काम करता है, वह ऊंचा गुण पाता है। उसे सुख का मीठा फल मिलता है।” 

साधु की यह बात सुन राजा भोज और कवि कालिदास ने उन्हें प्रणाम किया। साधु को शहर आने का निमंत्रण भी दिया। साधु ने कहा, “हम साधुओं के लिए शहर में रहना, घर में सोना और थाली में भोजन करना निषिद्ध है। किसी का मेहमान तो होना ही नहीं चाहिए।” कवि और राजा भोज ने साधु को प्रणाम किया और वापस शहर लौट आए। ऊंचा काम ही सुख की राह है।