लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका Drishti IAS | लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व 

लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व 

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका Drishti IAS | मीडिया और लोकतंत्र अथवा लोकतंत्र में मीडिया का दायित्व (आईएएस मुख्य परीक्षा, 2002) 

एक स्वस्थ लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि वहां का मीडिया सशक्त, निष्पक्ष एवं दबाव मुक्त हो। लोकतंत्र में चूंकि जनहित को वरीयता दी जाती है, अतएव लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की जवाबदेही एवं जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है। मीडिया को चंकि जनता की आवाज माना जाता है, इसलिए उससे निष्पक्षता एवं निर्भीकता की अपेक्षा लोकतंत्र के रक्षक के रूप में की जाती है। यह माना जाता है कि लोकतंत्र की पारदर्शिता के लिए मीडिया का निष्पक्ष एवं तटस्थ होना तथा सच से प्रतिबद्ध होना जरूरी है। लोकतंत्र में मीडिया को चतुर्थ जन-शक्ति का स्थान इसीलिए दिया गया है कि वह जनहितों की पैरोकारी करते हुए सदैव लोकतंत्र को सार्थक आयाम देने के लिए कटिबद्ध दिखता है। चूंकि मीडिया जनआस्था का केंद्र होता है और जनता मीडिया द्वारा प्रकाशित एवं प्रसारित तथ्यों पर आंख मूंदकर विश्वास करती है, अतः उसका भी यह दायित्व बनता है कि वह ऐसा कोई आचरण न करे जिससे सच पर आंच आए एवं जन विश्वास खंडित हो। यही वजह है कि मीडिया को समृद्ध लोकतंत्र के लिए अपनी विश्वसनीयता और बेबाकी पर अडिग रहना चाहिए तथा आर्थिक प्रलोभनों से बचते हुए जो सच है, उसी को सामने लाना चाहिए। 

“एक अच्छे और स्वस्थ लोकतंत्र की आधारशिला वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है। यह स्वतंत्रता ही वस्तुतः जनतंत्र का अनिवार्य अवयव होती है।” 

एक अच्छे और स्वस्थ लोकतंत्र की आधारशिला वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है। यह स्वतंत्रता ही वस्तुतः जनतंत्र का अनिवार्य अवयव होती है। इस दृष्टि से हम खुशकिस्मत हैं कि हमें बंदिशों में जीना नहीं पड़ रहा है। हमें वाक् और अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता मिली हुई है। भारतीय नागरिकों को संविधान के अनुच्छेद 19 के अन्तर्गत जो मौलिक अधिकार दिए गए हैं, उनमें वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अधिकार है। हालांकि अनुच्छेद 19(2) में कुछ विशेष स्थितियों का हवाला देते हुए इस स्वतंत्रता को प्रतिबंधित भी किया गया है। यह कहा गया है कि देश की एकता, अखंडता, राज्य की सुरक्षा, राज्यों के मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, लोक शिष्टाचार के हित में अथवा न्यायालय की अवमानना, मानहानि, अपराध, उद्दीपन के संबंध में इस अधिकार पर युक्ति-युक्त प्रतिबंध लगाया जा सकता है। भारतीय संविधान में यद्यपि अलग से मीडिया की स्वतंत्रता का कोई उल्लेख नहीं है, किन्तु यह माना जाता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में ही मीडिया की भी स्वतंत्रता अन्तर्निहित है। यह स्थिति भारतीय मीडिया के लिए विशेष लाभकारी है और स्वस्थ लोकतंत्र के निर्माण की दृष्टि से सहयोगी भी है। 

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारतीय मीडिया ने अपने नैतिक उद्यमों, मूल्य आधारित पत्रकारिता, गंभीर चिंतन, जनोन्मुख छवि, सटीक बयानी तथा सार्थक पहलों से वह विशिष्ट पहचान बनाई है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के एक सच्चे पैरोकार की होनी चाहिए। इसी से भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता बढ़ी और लोगों में यह धारणा घर कर गई कि अखबार झूठ नहीं बोलते, वे सच का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रामाणिकता और विश्वसनीयता से युक्त भारतीय मीडिया ने न सिर्फ जनता के बीच अपनी साख कायम की, बल्कि सच का प्रहरी बनकर लोकतंत्र को जीवंतता भी प्रदान की, जनतंत्र का हित किया और जनाकांक्षाओं के अनुरूप अपनी छवि को निर्मित किया। घटनाक्रमों के तफसील में जाने की जरूरत नहीं, बस उन पर सरसरी नजर डालते हुए गुजर जाने की जरूरत है, आप पाएंगे कि भारतीय मीडिया ने जनतंत्र की लड़ाई भी लड़ी और उसकी श्रीवृद्धि भी की। यह सिलसिला, जो अब एक समृद्ध परंपरा का स्वरूप ले चुका है, जंग-ए-आजादी से अब तक जारी है। लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा भारतीय मीडिया मुखर होकर सामने आया और जनमानस की आवाज बनकर लोकतंत्र की आत्मा को, सुरक्षा कवच प्रदान किया। 

राजनीतिक त्रासदियां रही हों या सामाजिक संक्रमण, आंतरिक सुरक्षा का मामला हो या सीमाओं की रक्षा, अराजकता का दंश हो या अपराध की हरारत, सड़क से संसद तक फैला भ्रष्टाचार हो या अपसंस्कृति का हमला, लोकतंत्र के इस प्रहरी ने हर स्थिति में अपनी भूमिका का सकारात्मक निर्धारण किया और आम जन के मन को छ लिया। उसने अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह बखूबी किया और अपनी जवाबदेही को भी समझा। यह साख भारतीय मीडिया ने एक दिन में कायम नहीं की है। इसमें एक उम्र गुजरी है। 

किसी लोकतांत्रिक देश में चुनावों का विशेष महत्त्व होता है। इन्हें लोकतंत्र का महापर्व माना जाता है। मतदान ही आम व्यक्ति की वह ताकत है, जो लोक को तंत्र से जोड़ती है। तभी तो लिंकन ने लोकतंत्र को—’जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन’ कहा था। चुनाव के दौरान मीडिया की जिम्मेदारी और जवाबदेही और बढ़ जाती है। उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह दल और प्रत्याशियों के बारे में तटस्थ रहकर उनकी सटीक समीक्षा करे, ताकि जनमत के निर्धारण में मीडिया की रोशनी सहायक बने। वह चुनाव प्रक्रिया की खामियों को इस तरह उजागर करे कि सुधार की पहल हो। जीवंत और पारदर्शी जनतंत्र के लिए चुनावी शुचिता आवश्यक होती है। भारतीय मीडिया ने चुनावों के समय पूरी तटस्थता के साथ प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों का लेखा-जोखा एवं उनकी अच्छाइयां-बुराइयां सामने लाने का प्रयास किया और इसके माकूल नतीजे भी सामने आए। जन-जागृति बढ़ी, जनता सही-गलत का फर्क कर सकी, चुनावी गंदगी और राजनीतिक प्रपंचों व प्रलोभनों को समझने और उनसे सावधान रहने की समझ उसमें विकसित हुई। खास बात यह है कि यदि अपवादों को छोड़ दिया जाए, तो आइना दिखाने का यह काम भारतीय मीडिया ने ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर’ की तर्ज पर किया। सच तो यह है कि भारतीय मीडिया कई संदर्भो में कबीर के दर्शन से प्रभावित दिखता है, जिसमें समता, सहिष्णुता, पारदर्शिता, तटस्थता, निष्पक्षता एवं स्वतंत्रता जैसे लोकतांत्रिक तत्व अभिन्न रूप से विद्यमान हैं। 

“जानकारों का मानना है कि लोकतंत्र एक विशेष परिवेश में ही सफल हो सकता है और उसकी सफलता की जो आवश्यक शर्ते बताई गई हैं, वे हैं-प्रबुद्ध जनमत, उचित जन शिक्षा, शासन में नागरिकों का सक्रिय भाग और सतर्कता, जनता में सहिष्णुता, एकता एवं आर्थिक सुरक्षा आदि।” 

जानकारों का मानना है कि लोकतंत्र एक विशेष परिवेश में ही सफल हो सकता है और उसकी सफलता की जो आवश्यक शर्ते बताई गई हैं, वे हैं- प्रबुद्ध जनमत, उचित जन शिक्षा, शासन में नागरिकों का सक्रिय भाग और सतर्कता, जनता में सहिष्णुता, एकता एवं आर्थिक सुरक्षा आदि। यह खुशी का विषय है कि भारतीय मीडिया ने इस परिवेश के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई है। जहां जनता को जागरूक बना कर प्रबुद्ध जनमत तैयार करने में मीडिया ने सक्रियता का परिचय दिया है, वहीं शिक्षा के महत्त्व के बारे में आम जन को समझाने की भी कोशिशें की हैं। शासन में नागरिकों के सक्रिय भाग और सतर्कता के लिए भी वह प्रेरित करता रहा है और जनता के बीच सहिष्णुता, एकता एवं अखंडता की भावना भी वह जगाता रहा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि भारतीय मीडिया ने बड़ी शिद्दत से लोकतंत्र में अपनी सार्थकता को साबित किया है। 

कालखंड का प्रभाव सभी पर पड़ता है। भारतीय मीडिया भी कालखंड से प्रभावित दिख रहा है। मौजूदा दौर में बाजारवाद का प्रभाव बढ़ा है। मीडिया को भी इसने अपनी गिरफ्त में लिया है। बाजार के दबाव के कारण मीडिया में भी बाजारू प्रवृत्तियां तेजी से पनपी हैं। लगभग 28-29 वर्ष पूर्व इन प्रवृत्तियों ने प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया था, जो अब अपने घनीभूत स्वरूप में सामने हैं। दूसरों को सवालों के घेरे में लेने वाला मीडिया यदि आज खुद सवालों से घिरता दिख रहा है, तो इसकी मुख्य वजह वह बढ़ी हुई व्यावसायिकता है, जिसने आज के मीडिया को आच्छादित कर रखा है। कहीं न कहीं यह बात लोकतंत्र का अहित कर रही है। 

आज भारतीय मीडिया में भी विसंगतियां देखने को मिल रही हैं, जिससे उसकी साख घटी है। विश्वसनीयता का संकट बढ़ा है। जो विश्वसनीयता मीडिया की पहचान हुआ करती थी, आज उसी के संकट से मीडिया का जूझना, एक बड़ी विडंबना नहीं तो और क्या है। ‘पेड न्यूज’ जैसी विकृतियों ने मीडिया जगत में पैर जमाए है, जिससे उसकी निष्पक्षता संदिग्ध हुई है। अगंभीरता और छिछलापन भी बढ़ा है। व्यावसायिक दबाव के चलते जनहित और गंभीर चितना हाशिए पर चला गया है। इसकी जगह ‘सनसनी’ और उस मनोरंजन ने ले ली है, जो हमारा ध्यान गंभीर समस्याओं से हटाता है। प्रिट मीडिया तो अभी भी कुछ संयमित दिख रहा है, लेकिन इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तो हदें तोडने का काम किया है। यही कारण है कि 3 एक प्रकरणों में न्यायपालिका को यह ताकीद करनी पड़ी की मा अधिक जिम्मेदारी और सतर्कता से काम करे, क्योंकि उसका में गहरा प्रभाव है। 

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