रॉकेट का आविष्कार किसने किया |Rocket ka avishkar kisne kiya

Rocket ka avishkar kisne kiya

रॉकेट का आविष्कार किसने किया |Rocket ka avishkar kisne kiya

आज सम्पूर्ण विश्व ‘रॉकेट’ से परिचित है। वही रॉकेट जो बड़ी तेजी से हवा की सघन पर्तों को पार करता हुआ, ऊपर की ओर उड़ता है। किन्तु कुछ दशक पूर्व इस रॉकेट से लोग अंजान थे। यद्यपि ऐसा माना जाता है कि करीब एक हजार वर्ष पूर्व चीनियों ने रॉकेट की रचना की थी। उन्होंने उन रॉकेटों का प्रयोग मंगोलिया सेना के विरुद्ध तेरहवीं शताब्दी में किया। जब हजारों की संख्या में रॉकेट मंगोल सेना पर दागे गए, तो उनकी सेना भाग खड़ी हुई। चीनियों ने रॉकेट को दूर फेंकने के लिए उनको तीरों के साथ बांधा था। 

इसके बाद बहुत समय तक रॉकेट आतिशबाजी के क्षेत्र में ही मनोरंजन के साधन बने रहे। उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में भारत में भी रॉकेट युद्ध अस्त्र की भांति प्रयोग किए गए।

प्रथम मैसूर युद्ध में सन् 1805 ई. में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की फौजों के विरुद्ध हैदर अली ने भी बड़ी सफलता के साथ रॉकेट का उपयोग किया। टीपू सुल्तान की फौजों ने भी अंग्रेजों की सेना पर रॉकेट अस्त्रों का प्रयोग किया था। इन युद्धों में रॉकेट का प्रभाव इतना जोरदार रहा कि इंग्लैण्ड के एक सैनिक अधिकारी कान्ग्रीव ने इस प्रकार के रॉकेट अस्त्र बनाने का कार्य आरम्भ कर दिया।

अन्य दूसरे देशों ने भी इंग्लैण्ड का अनुसरण किया, मगर उनके द्वारा बनाए गए रॉकेट अस्त्र अधिक विश्वसनीय सिद्ध नहीं हुए, क्योंकि उनका निशाना सच्चा नहीं होता है। इसका परिणाम यह हुआ कि रॉकेट रायफल, गन और तोपों के सामने टिक नहीं सकते थे। 

तत्पश्चात् अंतरिक्ष अनुसंधानों के लिए पुनः रॉकेट का विकास बीसवीं सदी में आरम्भ हुआ। दरअसल सन् 1903 ई. में रूस के लेखक जिओल्कोवस्की ने अपनी पुस्तक में ऐसे रॉकेट के निर्माण का सुझाव | दिया, जिसमें ईंधन के लिए किरासिन तेल और द्रव ऑक्सीजन का प्रयोग हो सकता था। बस फिर क्या था? जर्मनी और अमेरिका के उत्साही इंजीनियर तथा वैज्ञानिक, शक्तिशाली रॉकेटों के निर्माण के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयोग व परीक्षण करने में जुट गए।

वैज्ञानिक विधि से रॉकेटों का अध्ययन सबसे पहले संयुक्त राज्य अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने किया था। उस वैज्ञानिक का नाम ‘डॉक्टर रॉबर्ट गोडार्ड’ था। उन्होंने रॉकेट का निर्माण करने हेतु अध्ययन व अनुसंधान सन् 1908 ई. में शुरू किया। 

Rocket ka avishkar kisne kiya

अपने प्रयोगों के आधार पर गोडार्ड ने सन् 1919 ई. में बताया कि रॉकेट की उड़ान के लिए हवा का होना आवश्यक नहीं है। साथ ही यह भी बताया कि रॉकेट वायुमण्डल के बाहर अंतरिक्ष में भी उड़ सकता है और कहा कि रॉकेट को चन्द्रमा तक की भी सैर कराई जा सकती है। उस समय सभी वैज्ञानिकों का मानना था कि रॉकेट के उड़ने का कारण उसका विस्फोट है, जो हवा को धक्का देता है। जबकि होता यह है कि रॉकेट के पिछले भाग में विस्फोटक पदार्थ भरे होते हैं, जब उस विस्फोटक को जलाया जाता है तो विस्फोट होता है और विस्फोट से उत्पन्न होने वाली तप्त गैसें तीव्र वेग से पूंछ के सुराख के रास्ते बाहर, पीछे की दिशा में भागती हैं और रॉकेट को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिक्रिया का बल मिलता है। 

रॉकेट प्रतिक्रिया के सिद्धान्त पर उड़ने में समर्थ होते हैं। साधारण बंदूक को चलाते समय, ठीक उस क्षण जब गोली बंदूक से बाहर निकलती है, उसी क्षण बंदूक को उल्टी दिशा में धक्का लगता है, उसे प्रतिक्रिया का सिद्धान्त कहते हैं। इसका एक दूसरा उदाहरण यह है कि पानी पर तैरती किश्ती से जब कोई व्यक्ति कूद कर किनारे जाता है, तो किश्ती भी प्रतिक्रिया के कारण उल्टी दिशा में किनारे से दूर हट जाती है।

इस सम्बन्ध में जब अनुसंधान हुआ, तो ज्ञात हुआ कि रॉकेट का वेग बढ़ाने के लिए दो उपाय किए जा सकते हैं 

(1) रॉकेट में विस्फोट करने वाले पदार्थों की मात्रा बढ़ाई जाए।

(2) विस्फोटक पदार्थ इस किस्म के हों कि उनके विस्फोट से उत्पन्न होने वाली  गैसों का निष्क्रमण-वेग बहुत अधिक हो। 

रॉकेट के ईंधन बहुत महंगे होते हैं, इस कारण पहला उपाय फिजूलखर्ची वाला उपाय लगा, किन्तु दूसरा उपाय फिजूलखर्ची वाला नहीं था। इसके लिए आवश्यक था कि वैज्ञानिक उन ईंधनों की खोज करें, जो कम खर्चीले हों और जिनके विस्फोट से गैसों को तीव्रतम वेग प्राप्त हो सके।

 तब इस विषय में हिसाब लगाया गया कि अगर खाली रॉकेट के वजन से पौने दो गुना वजन का ईंधन उसमें रखा जाए, तब समग्र ईंधन के जल चुकने पर रॉकेट का महत्तम वेग उस वेग के बराबर होगा, जिस वेग से प्रज्जवलन कक्ष से गैसें बाहर निकलती हैं। जैसे-खाली रॉकेट के वजन का 6.4 गुना वजन ईंधन लादने पर रॉकेट का अंतिम वेग गैस के निष्क्रमण वेग का दो गुना हो सकता है और रॉकेट का वेग यदि तीन गुना करना हो, तो रॉकेट पर लादे गए ईंधन का वजन खाली रॉकेट के भार का उन्नीस गुना होना आवश्यक है। 

इसी कारण रॉकेट वजन में बहुत अधिक भार वाले होते हैं। उदाहरण के लिए जर्मनी के बी-2 रॉकेट का कुल वजन 300 मन था, जिसमें ईंधन सामग्री दो सौ मन से अधिक थी। वह सारा ईंधन मात्र चार मिनट की उड़ान के लिए ही पर्याप्त था। 

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डॉक्टर रॉबर्ट गोडार्ड ने सन् 1926 ई. में अपने द्रव ईंधन वाले रॉकेट का परीक्षण किया। उस रॉकेट ने साठ मील प्रति घण्टा की गति से एक सौ चौरासी फीट की ऊंचाई तय कर ली थी। तत्पश्चात्, सन् 1935 ई. में डॉक्टर रॉबर्ट ने जाइरोस्कोप नियंत्रित रॉकेट छोड़ा। वह रॉकेट सात सौ मील प्रति घण्टा की रफ्तार से आठ हजार फीट की ऊंचाई तय करने में समर्थ था।

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