रोचक पौराणिक कथा-गज और ग्राह की कथा

रोचक पौराणिक कथा-गज और ग्राह की कथा

पौराणिक कथा-गज और ग्राह की कथा

धर्म, सदाचार, नीति, न्याय, और सत्य का बोध कराने वाली प्राचीन कथाएं। यह प्राचीन कथा  हमारे जीवन के लिए प्रेरणादायक होती है।

प्रभु की स्नेह वर्षा

पूर्व काल में क्षीरसागर में त्रिकूट नाम का एक विशाल पर्वत था। उसके सोने, चांदी और लोहे के तीन शिखर थे। उसके प्रकाश से सभी दिशाएं जगमगाती रहती थीं। सुन्दर वन वहां की शोभा थे। विविध प्रकार के पक्षियों का कलरव वहां निरंतर गूंजता रहता था। वहां बहुत-सी नदियां एवं सरोवर थे, जिनकी निर्मल एवं स्वच्छ सुगंध भरी धाराओं में देवांगनाएं स्नान करती थीं।

पर्वत की तराई में एक उद्यान था। उद्यान के निकट एक सरोवर था। उस सरोवर पर अपनी हथिनियों के साथ एक गजेंद्र (हाथी) आनंद से विहार करता था।गजेंद्र इतना शक्तिशाली था कि उसके भय से कोई भी जानवर और जंगली पशु भाग जाते थे।

एक दिन वह प्यास से व्याकुल होकर सरोवर के तट पर पहुंचा। निर्मल, शीतल एवं मधुर जल से कमलों की महक आ रही थी। गजेंद्र ने मन-भरकर जल पिया। फिर स्नान किया और मस्ती  के मूड में आकर अपने  बच्चों तथा हथिनियों पर सूंड  में पानी भरकर बौछार करने लगा। उसी समय अचानक  एक ग्राह   अर्थात विशाल मगरमच्छ ने गजेंद्र का पांव पानी के अंदर पकड़ लिया और उसे सरोवर में खींचना शुरू कर दिया। शक्तिशाली गज भी पूरा जोर लगाने लगा। 

इस संघर्ष में कभी ग्राह सरोवर के तट पर खिंचा चला आता तो कभी गजेंद्र सरोवर के भीतर चला जाता। इस प्रकार लड़ते-लड़ते उन्हें बहुत समय बीत गया। ग्राह तो जलचर था, अतः सरोवर में उसकी शक्ति की वृद्धि होती रही। लेकिन गजेंद्र की शक्ति क्षीण होती चली गई। अंत में बचने का कोई उपाय न देखकर गजेंद्र ने भगवान श्रीहरि की शरण ली।

वह आर्त स्वर में मन को एकाग्र करके पूर्वजन्म में सीखे हुए स्तोत्र से भगवान की प्रार्थना करने लगा-‘संसार को चेतन शक्ति देने वाले परमपिता परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूं जो सबकी रक्षा करते हैं, सबके आधार हैं तथा प्रलयकाल के घोर अंधकार से परे विराजमान हैं, उन श्रीहरि को मेरा नमस्कार है। हे प्रभु, मेरे उद्धार के लिए आप प्रकट हों।’ 

गजेंद्र की आर्त पुकार सुनकर तत्काल गरुड़ पर सवार होकर श्रीहरि वहां पहुंचे। गजेंद्र ने देखा कि श्रीहरि आ रहे हैं तो उसने अपनी संड से कमल का सुंदर पुष्प उठाया और भगवान के चरणों पर चढ़ा दिया। भगवान ने गजेंद्र की पीड़ा एव व्याकुलता देखी। वे शीघ्र ही गरुड से उतरे। गज एवं ग्राह दोनों को एक साथ उठाकर वे बाहर लाए और चक्र से ग्राह का मुख फाड़कर गजेंद्र की रक्षा की। ब्रह्मा. शंकर तथा सभी देवता एवं गंधर्वो आदि ने भगवान की प्रदक्षिणा की। भगवान के स्पर्श से वह ग्राह भी मुक्तिपद पा गया। 

वास्तव में गजेंद्र पूर्व जन्म में द्रविड़ देश का राजा था। वह राज-पाट त्यागकर मलय पर्वत पर तपस्वी वेश में रहता था। एक बार स्नान आदि से निवृत्त होकर राजा भगवान की आराधना में मौन बैठा था। उसी समय अगस्त्य मनि अपने शिष्यों के साथ उस मार्ग से आए।

राजा को निढुंह बैठा देखकर तथा उससे किसी प्रकार का आतिथ्य न पाकर मुनि श्रेष्ठ को क्रोध आ गया। उन्होंने उसे शाप दिया कि अभिमानवश ब्राह्मणों का अपमान करने के लिए तू हाथी के समान बैठा है, अत: तू हाथी की योनि प्राप्त करेगा। इसी कारण उस राजा ने गजेंद्र की योनि में जन्म लिया, लेकिन पूर्वजन्म के संस्कारवश गजेंद्र को भगवान की स्मृति बनी रही।

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Mythology story- Legend of Gaja and Graha

Ancient stories providing religion, morality, policy, justice, and realization of truth. This ancient story is inspiring for our lives.

Lord’s love rain

In earlier times there was a huge mountain named Trikuta in Kshirsagar. He had three peaks of gold, silver and iron. With his light, all directions were sparkling. The beautiful forest was the beauty of there. The tweet of different kinds of birds used to resonate there. There were many rivers and ponds, whose devangans used to bathe in streams filled with pure and clean fragrance.

There was a garden in the foothills of the mountain. There was a lake near the park. A gajendra (elephant) with his elephants used to sit with pleasure at that lake. Gajendra was so powerful that any animal and wild animal escaped due to his fear.

One day, distraught with thirst, he reached the banks of the lake. The smell of lotus was coming from pure, cold and sweet water. Gajendra drank water diligently. Then took a bath and after getting in the mood for fun, started pouring water on the trunk and showering on her children and palms. At the same time, suddenly a graha, that is, a huge crocodile, caught Gajendra’s foot under water and started dragging it into the lake. The mighty yard also began to exert full force.

In this struggle, Graha would have been drawn on the banks of the lake and sometimes he would have gone inside the Gajendra lake. Thus a lot of time passed while fighting. Graha was aquatic, so his power in the lake continued to increase. But Gajendra’s power continued to wane. Seeing no way to escape in the end, Gajendra took shelter of Lord Shrihari.

He began to pray to God from the hymn that he had learned in his previous life by converting the mind in the tone of the voice – ‘I salute the Supreme Father, the God who gives power to the world, who protects everyone, is the basis of all, and beyond the utter darkness of the Holocaust. I am seated, I salute them. Lord, appear for my salvation. ‘

Hearing the call of Gajendra, Shrihari arrived on Garuda immediately. When Gajendra saw that Shrihari was coming, he took a beautiful lotus flower from his bull and offered it to the Lord’s feet. God saw the pain and distraction of Gajendra. They soon descended from Garuda. They brought out both Gaja and Graha together and protected Gajendra by tearing the face of Graha from the circle. Brahma Shankar and all the deities and Gandharvas etc. worshiped God. By the touch of God, that Graha was also liberated.

In fact, Gajendra was the king of the Dravidian country in his former birth. He used to live in an ascetic disguise on the Malay Mountains, leaving the throne. Once retired from bathing etc., the king was sitting silently in the worship of God. At the same time Agastya Mani came with his disciples by that route.

Seeing the king sitting unmoved and not getting any kind of hospitality from him, Muni Shrestha got angry. They cursed him that you are sitting like an elephant to insult brahmins arrogantly, so you will get the elephant’s vagina. That is why the king was born in Gajendra’s vagina, but Gajendra remained a memory of God by the rites of previous birth.

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