मौत का घेरा और अकेला शेर

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 बच्चों की रोचक कहानियां-मौत का घेरा और अकेला शेर

वह बड़ा कठिन समय था, मेवाड़ के लिए। दिल्लीपति औरंगजेब की आँखें मेवाड़ की ओर लगी थीं। आखिरकार व मुगल सम्राट ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया था। राजपूतों ने अपनी जान लड़ा दी, पर अपने देश की आन न जाने दी। ह उनका अदम्य साहस देख कर मुगलों के छक्के छूट गये। 

उन दिनों मेवाड़ के जंगलों में भील रहा करते थे। उनक हृदय देश-प्रेम से आलोकित थे। वो जंगलों में रहते, फल फूल खाते, पर जब मेवाड़ के राणा उन्हें देशप्रेम के नाम पर आमंत्रित करते, वो टिड्डी दल की भाँति शत्रुओं पर टूट पड़ते। 

अरावली पर्वत की गोद में बसा एक छोटा-सा गाँव था -नेतना। जाड़े के दिन थे। गाँव के भील अपने सरदार के द्वार पर आग के चारों ओर बैठे थे। सहसा किसी के आने की आवाज़ हुई। अनायास ही भीलों के हाथ अपने भालों पर जा पहुँचे। एक भील ने आँख उठा कर देखा, तो सामने एक अश्वरोही खड़ा था। इससे पहले कि भील कुछ कहते, वह घोड़े की पीठ से नीचे उतर पड़ा। भीलों के सरदार को उसने परंपरागत ढंग से प्रणाम किया। सरदार ने उसके अभिवादन को स्वीकार करके बड़े स्नेह से पूछा, “कौन हो? कहाँ से आ रहे हो?”

“मैं मेवाड़ के राणा का दूत हूँ सरदार!” अश्वरोही ने उत्तर दिया, “राणा ने आपके पास मुझे भेजा है।” 

मेवाड़ के पूज्य राणा का नाम सुनते ही भीलों के सरदार ने अपना मस्तक श्रद्धा से झुका लिया। 

“मेवाड़ आज संकट में है, सरदार।” दूत आगे बोला, 

“औरंगजेब ने मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया है। जन्मभूमि को आज अरावली के भीलों की आवश्यकता है। जननी जन्मभूमि की सेवा के लिए ही मेवाड़ के राणा ने आपको याद किया है।” 

भील सरदार की भौहें चढ़ गयीं। आँख से अंगारे बरसने लगे। सरदार आँख गुरेर कर बोला, “मेवाड़ की भूमि का अपमान! यह कभी नहीं हो सकता, मेवाड़ के राणा के आदेश पर हम अपने प्राणों की बाजी लगा देंगे।” 

“तो फिर तैयार हो जाओ, सरदार।” यह कह कर दूत शीघ्रता से जिधर से आया था, उधर ही चला गया। 

सरदार ने आदेश दिया। रणभेरी गूंज उठी। देखते ही देखते तीन-चार हज़ार भील एकत्र हो गये। सबके हाथों में तीर कमान थे। पल भर में सभी भील अपने सरदार के पीछे-पीछे अरावली पर्वत पर चढ़ने लगे। 

दोपहर का समय था। नैतना गाँव उजड़ा-सा प्रतीत होता था। सभी भील देश की रक्षा के लिए बलिदान चढ़ाने गये थे। गाँव में बाकी था, तो केवल एक वृद्ध भील, शेरा, जो एक वृक्ष की छाया में एक चारपाई पर लेटा था। उसका तीर कमान उसके बगल में रखा था। पर लूनी नदी के शाँत तट पर काफी चहल पहल थी। कुछ युवा भील कन्याएँ जल-क्रीड़ा कर रही थीं। बच्चे भी पास में ही खिलवाड़ कर रहे थे। सहसा एक युवा कन्या चीत्कार करके तट पर गिर पड़ी। सबने दौड़ कर देखा, उसके कलेजे में एक विष-बुझा तीर घुसा हुआ था। 

गुस्से से भील कन्याएँ इधर-उधर देखने लगीं। नदी के दूसरे तट पर दो मुगल सैनिक खड़े मुस्करा रहे थे। भील कन्याएँ अभी उस आहत बालिका को घेर कर खड़ी ही थीं कि तीर-कमाल लिये शेरा आ पहुँचा। उसकी आँखों से चिंगारियाँ फूट रही थीं। उसने बिना विचार किये, एक तीर छोड़ दिया। तीर ने एक मुगल सैनिक के कलेजे को भेद दिया। 

उस मुगल सैनिक के गिरते ही अरावली की गुफाओं से सैकड़ों मुगल सैनिक निकल पड़े। देखते ही देखते पूरा गाँव सैनिकों से घिर गया।

एक ओर थे, सैकड़ों मुगल सैनिक और दूसरी ओर था, अकेला वृद्ध शेरा। स्त्रियों और बच्चे तीरों का ढेर ला लाकर उसके पास रखते जाते और वह शत्रुओं से लोहा लेता जाता। पर आखिर कब तक एक अकेला वृद्ध सैकड़ों सैनिकों का मुकाबला कर सकता था? उसके शरीर से रक्त के झरने फूट पड़े। पर उसके हाथ बराबर मुगल सैनिकों पर बाण-वर्षा करते रहे। मुगल सैनिक उस भीषण बाण-वर्षा में भी गाँव की ओर बढ़ने लगे। जब शेरा ने देखा कि मुगल सैनिकों को रोकना कठिन है, तब वह स्त्रियों और बच्चों से बोला, “भागो, भाग कर जंगल की ओट में जा छिपो।” 

मुगल सैनिकों ने आगे बढ़ते हुए भीलों की झोपड़ियों में आग लगा दी। झोपड़ियाँ धूं-धूं करके जल उठीं। भील स्त्रियाँ अपनी-अपनी गोद में बच्चों को लेकर वन की ओर भाग रही थीं। और शेरा, वह अब भी अग्नि की लपटों के बीच से शुत्र पर तीर चला रहा था। 

शेरा की ही भांति एक भील युवती को भी अपने प्राणों की परवाह न थी। स्वाधीनता की तरंग में जूझ रहे भीलों को सूचना देने के लिए वह दौड़ पड़ी। देखते ही देखते वह अरावली पर्वत के एक वृक्ष की चोटी पर चढ़ गयी और एक लाठी में लाल वस्त्र का एक टुकड़ा बाँध कर उसे आकाश में ऊँचा उड़ाने लगी। 

अरावली पर्वत ही भीलों का मोर्चा था। सहसा सरदार की दृष्टि उस फहराते वस्त्र पर गयी। कुछ देर तक सरदार उसे देखता रहा और फिर चिल्ला उठा, “दौड़ो उसकी ओर, शत्रु ने घेर लिया है।” . 

नगाड़े बज उठे। अरावली पर्वत का वह मोर्चा भीलों से खाली हो गया। भीलों को आता देख, वह युवती वृक्ष के नीचे उतरी। झंडे को उड़ाती हुई गाँव की ओर भागी। दूर से’ । भीलों ने देखा, झोपड़ियाँ जल रही थीं। गाँव कोलाहल से . गया था। 

भील सरदार चिल्ला उठा, “देखते क्या हो? एक भी मुगल बचने न पाये।” भील काल की भाँति मुगलों पर टूट पड़े। मुगल सैनिकों के प्राणों पर बन आयी। देखते ही देखते सैकड़ों मुगल ज़मीन पर लोट गये। जो बचे, वो भी सिर पर पैर रख कर भागे। 

नैतना गाँव जल कर खाक हो गया था। बची केवल राख। उस राख के ढेर में वृद्ध शेरा निर्जीव पड़ा था। कहते हैं, आज भी मेवाड़ की स्त्रियाँ और बच्चे उस महावीर का यश गाते हैं।

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