Religious story in Hindi-भक्त प्रह्लाद की कथा 

Religious story in Hindi

Religious story in Hindi-भक्त प्रह्लाद की कथा 

गर्भ में पाया तत्त्व-ज्ञान 

भक्त श्रेष्ठ प्रह्लाद दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पुत्र थे। दैत्यकुल में जन्म लेने के बावजूद उनकी भगवान में अटूट श्रद्धा थी। वे हर पल, हर घड़ी, ईश्वर स्मरण व भजन आदि में लीन रहते थे। 

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जबकि हिरण्यकशिपु इससे चिढ़ता था। वह भक्तराज प्रह्लाद को भगवान के स्मरण-भजन से विरत करना चाहता था। उसकी धारणा थी कि ‘प्रह्लाद अभी बालक है, उसे किसी ने बहका दिया है। ठीक ढंग से शिक्षा मिलने पर उसके विचार बदल जाएंगे।’ 

इस धारणा के कारण दैत्यराज ने प्रह्लाद को पढ़ने के लिए शुक्राचार्य के पुत्र षण्ड तथा अमर्क के आश्रम में भेज दिया और उन दोनों आचार्यों को आदेश दिया कि वे बालक को सावधानीपूर्वक दैत्योचित, अर्थनीति, दण्डनीति, राजनीति आदि की शिक्षा दें। 

आचार्य जो कुछ पढ़ाते, उसे प्रह्लाद पढ़ लेते थे, स्मरण कर लेते थे किंतु उसमें उनका मन नहीं लगता था। उस शिक्षा के प्रति उनकी रुचि नहीं थी। जब दोनों आचार्य आश्रम के काम में लग जाते, तब प्रह्लाद दूसरे सहपाठी दैत्य-बालकों को अपने पास बुला लेते। एक तो वे राजकुमार थे, दूसरे उन्हें मारने के दैत्यराज के अनेक प्रयत्न व्यर्थ हो चुके थे, इससे सब दैत्य-बालक उनका बहुत सम्मान करते थे। प्रह्लाद के बुलाने पर वे खेलना छोड़कर उनके पास आ जाते और ध्यान से उनकी बातें सुनते। 

प्रह्लाद उन्हें संयम, सदाचार, जीवदया का महत्व बतलाते, सांसारिक भोगों की निस्सारता समझाकर भगवान के भजन की महिमा सुनाते। बालकों को यह सब सुनकर बड़ा आश्चर्य होता। 

एक बार दैत्य-बालकों ने पूछा-‘प्रह्लादजी ! तुम्हारी अवस्था छोटी है। तुम भी हम लोगों के राक्षस कुल में जन्मे हो और इन आचार्यों के पास पढ़ने आए हो। तुम्हें ये सब बातें कैसे ज्ञात हुईं?” 

 प्रह्लाद ने बताया-“भाइयो! इसके पीछे भी एक इतिहास है। मेरे चाचा हिरण्याक्ष की मृत्यु के पश्चात मेरे पिता ने अपने को अमरप्राय बनाने के लिए तपस्या करने का निश्चय किया और वे मदराचल पर चले गए। उनकी अनुपस्थिति में देवताओं ने दैत्यपुरी पर आक्रमण कर दिया। दैत्य अपने नायक के अभाव में पराजित हो गए और अपने स्त्री-पुत्रादि को छोड़कर प्राण बचाकर इधर-उधर भाग गए। देवताओं ने दैत्यों के सूने घरों को लूट लिया और उनमें आग लगा दी। लुट-पाट के अन्त में देवराज इन्द्र मेरी माता कयाधू को बन्दिनी बनाकर अमरावती ले गए। मार्ग में देवर्षि नारद मिले। उन्होंने देवराज को डांटा-“इन्द्र ! तुम इस पराई साध्वी नारी को क्यों पकडे लिए जाते हो? इसे तुरंत छोड़ दो।” 

इन्द्र ने कहा-“देवर्षि ! इसके पेट में दैत्यराज का बालक है। हम दैत्यों का वंश नष्ट कर देना चाहते हैं। इसका पुत्र उत्पन्न हो जाए तो उसे मैं मार डालूंगा और तब इसे छोड़ दूंगा।” 

नारद जी ने बताया-“भूलते हो, देवराज! इसके गर्भ में भगवान का महान भक्त है। तुम्हारी शक्ति नहीं कि तुम उसका कुछ भी बिगाड़ सको।” 

देवराज का भाव तत्काल बदल गया। वे हाथ जोड़कर बोले-“देवर्षि क्षमा करें! मुझे पता नहीं था कि इसके गर्भ में कोई भगवद्भक्त है।”

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