धर्म और राजनीति |Religion and Politics

धर्म और राजनीति

धर्म और राजनीति |Religion and Politics

“मानव सभ्यता के विकास के प्रारंभिक दौर में ही धर्म और राजनीति दोनों का प्रादुर्भाव हुआ। एक अनिचित और असुरक्षित जीवन में धर्म ने एक सम्बल प्रदान किया। मनु य ने यह माना कि कोई न कोई इस सारी धरती और प्रकृति का संयोजक और संचालक है और वही मनु य की रक्षा करता है।” 

यूरोप में मध्यकाल में धर्म और राजनीति के घालमेल में राजनीति को इतना अशक्त कर दिया गया था कि यूरोप का सबसे बड़ा शासक पवित्र रोमन साम्राज्य का सम्राट भी कैथोलिक चर्च के पोप के सामने नतमस्तक होता था। सर्वोच्च सत्ता पोप की यानी धर्म की हो गई थी। इसी के विरोध में धीरे-धीरे यह सिद्धांत विकसित किया गया कि राजा और पोप के कार्य क्षेत्र अलग-अलग हैं। इसी से ‘सेक्युलरिज्म’ का सिद्धांत विकसित हुआ, जिसके अनुसार मनुष्य जीवन का आत्मिक और हुआ, जिसके अनुसार मनुष्य जीवन का आत्मिक और आध्यात्मिक क्षेत्र धर्म का है और उसका सांसारिक क्षेत्र राज्य का। दोनों को एक-दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसी से निकला हुआ आधुनिक राष्ट्र-राज्य के लिए सेक्युलरिज्म एक आवश्यक संचालक सिद्धांत है। भारत ने भी अपने संविधान में इसी सेक्युलरिज्म को स्वीकारा और प्रतिपादित किया है। परन्तु व्यवहारिक जीवन में सारी दुनिया में मनुष्य जीवन पर धर्म का व्यापक प्रभाव है और इसलिए धर्म का राजनीति में थोड़ा बहुत हस्तक्षेप भी बना रहता है। कभी-कभी यह राज्य और समाज के लिए भारी समस्या बन जाता है। जैसे इस समय भारत वर्ष में। 

मानव सभ्यता के विकास के प्रारंभिक दौर में ही धर्म और राजनीति दोनों का प्रादुर्भाव हुआ। एक अनिश्चित और असुरक्षित जीवन में धर्म ने एक सम्बल प्रदान किया। मनुष्य ने यह माना कि कोई न कोई इस सारी धरती और प्रकृति का संयोजक और संचालक है और वही मनुष्य की रक्षा करता है। इस तरह एक पारलौकिक शक्ति मनुष्य की रक्षा करती है। मनुष्य और इस पारलौकिक शक्ति के बीच के सम्बन्ध को अलग-अलग धर्मों में देशकाल की परिस्थितियों के अनुसार परिभाषित और नियमित किया गया और धर्म मानव जीवन की एक व्यापक सत्ता बन गया। 

इसी तरह मनुष्य के लौकिक जीवन को संचालित करने वाली सांसारिक सत्ता का भी विकास हुआ और मनुष्य के उस सत्ता से, यानी राज्य सत्ता से सम्बन्ध को राजनीति कहा गया। पर जैसी कि कहावत है एक जंगल में दो शेर होते हैं तो टकराते तो हैं ही। जब तक राज्य सत्ता बहत संगठित और शक्तिशाली नहीं थी, तब तक धर्म का वर्चस्व बना रहा था, क्योंकि मनुष्य के जीवन में ज्ञात से अधिक अज्ञात का प्रभाव बना रहता है और  धर्म में तो अज्ञात के रहस्य का निर्णायक प्रभाव है। इसलिए धर्म की सत्ता विविध मान्यताओं और संस्थाओं के माध्यम से मनुष्य जीवन पर छायी रही। संगठित धर्मों में तो धर्म की जकड़ स्पष्ट थी, जैसे मनुष्य ईसाई धर्म में जन्म लेने के बाद तब तक पूरी तरह जन्मा नहीं माना जाता था, जब तक उसका चर्च में ‘बपतिस्मा न हो जाए। यानी जब तक चर्च उसे अपनी गोद में | न ले ले। उसके जीवन में क्या करणीय और क्या अकरणीय है उसका संचालन कैथलिक चर्च और धरती पर ईश्वर की छाया समझे जाने वाले पोप द्वारा संचालित होता था। भारत में कोई एक सर्वोच्च धर्म-ग्रंथ नहीं था और न ही पोप जैसा धर्म गुरु। फिर भी पुरोहितों और पुजारियों की फौज सामाजिक जीवन को नियंत्रित रखती थी।

धीरे-धीरे राज्य का तंत्र विकसित होता गया और अब उसे पादरियों और पुरोहितों की समाज को नियंत्रित रखने के लिए उतनी जरूरत नहीं रही। तब राजनीति में धर्म का हस्तक्षेप शासकों को बुरा लगने लगा। पर शासक यह अवश्य जानते थे कि राजनीति का प्रभाव आरोपित है। राज्य एक बाहरी शक्ति है, जो पुलिस और सेना जैसी शक्तियों के कारण ही स्वीकार्य होता है, जबकि धर्म एक आंतरिक शक्ति के रूप में अधिकांश मनुष्यों में सहज स्वीकार्य सत्य है। इसलिए धर्म को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। 

भारत के सबसे पहले संगठित राज्य मौर्य साम्राज्य में चाणक्य ने एक तरह का राज धर्म विकसित किया। उसका लिखा अर्थशास्त्र राजनीति की दुनिया की बेहद महत्त्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है। मौर्य सम्राट अशोक ने राज्य के धर्म को शांति और अहिंसा के रास्ते ‘धम्म विजय’ की राह पर अग्रसर किया। भारत में कोई एक धर्म नहीं था। बहुत से सम्प्रदाय थे, जिनके बीच टकराहट चलती रहती थी। बुद्ध और महावीर के अनुयायी अधिक संगठित थे। फिर बाहर से ईसाई धर्म और इस्लाम भी आ गए। ऐसे में धर्मों के बीच की टकराहट से बचने का उपाय ‘सर्व धर्म समभाव’ विकसित हुआ। भारत के सबसे बड़े शासकों में से एक अकबर ने इसे ‘सुलह-ए-कुल’ यानी सबके साथ सुलह की तरह विकसित किया। आधुनिक काल में गाँधी तक यही सर्व धर्म समभाव आदर्श बना रहा है। भारत द्वारा सेक्युलरिज्म स्वीकार करने के बावजूद इसकी व्याख्या सर्व धर्म समभाव के रूप में ही मान्य रही है। 

“धर्म और राजनीति का घालमेल और धर्म का राजनीति के लिए प्रभावी उपकरण बनना समाज के लिए ऐसा खतरा बन गया है कि इस पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया, तो समाज ऐसे विघटन तक पहुंच जाएगा जहां से लौटना बेहद कठिन होगा।” 

इसके विपरीत यूरोप में रूस के पश्चिम का यूरोप एक ही धर्म कैथोलिक चर्च के अधीन था। भिक्षुओं के धर्म की तरह विकसित ईसा मसीह की करुणा पर आधारित कैथोलिक चर्च का जब पतन होने लगा, तो सांसारिक सत्ता स्थापित कर पोप भी राजाओं की तरह भोग-विलास का जीवन जीने लगे। सोलहवीं शताब्दी में पतनशील चर्च के विरोध में प्रोटेस्टेंट चर्च का विकास हुआ। इसी समय यूरोप में पुनर्जागरण के साथ एक नई राजनीतिक संस्था राष्ट्र-राज्य का प्रादुर्भाव हुआ। इस तरह सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में धर्म और राजनीति के बीच की टकराहट में धर्म के दो सम्प्रदायों के बीच की टकराहट भी शामिल हो गई। धर्म और राजनीति का घालमेल इतना बढ़ता गया कि सत्रहवीं शताब्दी में दुनिया के इतिहास के सबसे भयानक धर्म युद्ध हुए, जिन्हें तीस वर्षीय युद्ध कहा जाता है। इसमें राजनीति में धर्म का भरपूर इस्तेमाल किया गया। इसके बाद धर्म और राजनीति के क्षेत्र को पूरी तरह अलग करने के प्रयास शुरू हुए और 18वीं शताब्दी में यूरोप में सेक्युलरिज्म अच्छी तरह स्थापित हो गया। धर्म को व्यक्ति का निजी मामला मान लिया गया और राज्य के सम्बन्ध में यह सिद्धांत प्रतिपादित हुआ कि उसका कोई धर्म नहीं होता, वह पूरी तरह सांसारिक संस्था है और धर्म के नाम पर किसी को कोई रियायत नहीं मिल सकती। यहां तक कि धर्म उसका सरोकार है ही नहीं। इस क्रम में जब समाजवादी राज्य बनें, तो वे एक तरह से अधार्मिक राज्य बन गये। 

पर हकीकत यह है कि धर्म और राजनीति, दोनों सत्ताओं, का वाहक तो मनुष्य ही होता है और सत्ता के विषय में यह सर्वमान्य सत्य है कि सत्ता भ्रष्ट करती है, क्योंकि वह निहित हित पैदा करती है और हितों में टकराहट होती ही रहती है। सारांश यह कि राजनीति धर्म का और धर्म राजनीति का इस्तेमाल करने से बाज नहीं आते। आज की शब्दावली में इन दोनों के घालमेल के लिए ‘साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल किया जाता है। धर्म और राजनीति के परस्पर सम्बन्ध की रूप रेखा संक्षेप में प्रचीन भारत के लिए रोमिला थापर, मध्यकाल के लिए हरबंस मुखिया और आधुनिक काल के लिए बिपिन चन्द्र ने चिन्हित किया है। भारत के संदर्भ में साम्प्रदायिकता एक इतना बड़ा यथार्थ बन गया है कि उसने राष्ट्रवाद को ही चुनौती दे दी है। 

सर्व धर्म समभाव के संस्थापक सहिष्णु कहे जाने वाले समाज में उन्नीसवीं शताब्दी में जब एक भारी सांस्कृतिक उथल-पुथल शुरू हुई, तो एक साथ जोड़ने और तोड़ने वाली शक्तियां जागृत हो गईं। एक ओर थी विविधता में एकता को चिन्हित करने वाली राष्ट्रवादी शक्तियां तो दूसरी ओर विविधता और भिन्नता पर जोर देने वाली शक्तियां, जिन्हें औपनिवेशिक शासकों ने प्रोत्साहित किया और एक ऐतिहासिक विडम्बना की तरह भारत 1947 में आजाद हुआ, पर एक विभाजित देश के रूप में। तब से भारत में एकीकरण के तमाम प्रयासों के बावजूद साम्प्रदायिकता का, यानी धर्म और राजनीति की नकारात्मक संधि का, विस्तार होता गया है। 

आज तो एक तरह से धर्म राजनीति के केन्द्र में आ गया है। राजनीति में बहुमत और अल्पमत का प्रश्न धर्म द्वारा निर्धारित होने लगा है। इसके नाते राजनीति में सिद्धांतों और विचारों का महत्त्व घटता गया है। भारत में सेक्युलरिज्म यानी राज्य की धर्म के मामले में नितांत तटस्थता तो कभी ठीक से लागू नहीं हुई। उसका सर्व धर्म समभाव वाला रूप भी बिगड़ता गया है और अब तो एक ही धर्म की प्रधानता, या यूं कहें कि वर्चस्व की बात की जाने लगी है। इससे समाज में धर्म के आधार पर कटुता और कलह पैदा होती जा रही है। 

इस कारण से भारतीय समाज आज जितना विभाजित हो गया है, उतना शायद पहले कभी नहीं था। तात्कालिक लाभों के लिए दूरगामी हानियों को नजरअंदाज करना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए घातक होता है। आज भारतीय समाज की विडम्बना यही है कि समाज ही नहीं उसे नेतृत्व प्रदान करने वाला समुदाय और सरकारें भी तात्कालिक लाभ की भावना से ग्रस्त हैं। ऐसा लगता है कि समाज में बढ़ते विघटन के खतरे के प्रति किसी का ध्यान नहीं है। 

धर्म और राजनीति का घालमेल और धर्म का राजनीति के | लिए प्रभावी उपकरण बनना समाज के लिए ऐसा खतरा बन गया है कि इस पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया, तो समाज ऐसे विघटन तक पहुंच जाएगा जहां से लौटना बेहद कठिन होगा। इसके लिए सभी पार्टियों के संवेदनशील और समझदार नेताओं को बैठकर देश के लिए दूरगामी हितों पर बात करनी होगी और भारत में चुनाव प्रणाली और राजनीति कर्म में कुछ मूलभूत सुधार करने होंगे। दूसरी ओर समाज में एक ऐसे सांस्कृतिक आंदोलन की जरूरत है, जो जीवन मूल्यों और मानव जीवन के उद्देश्यों के प्रति समाज को सचेत करे और सरकारों पर दबाव डाल सके कि वे सही दिशा में सुधार करने पर मजबूर हों। 

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