धर्म और राजनीति पर निबंध |Religion And Politics Essay In Hindi

Religion And Politics Essay In Hindi

धर्म और राजनीति पर निबंध |Religion And Politics Essay In Hindi

भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है। धर्म निरपेक्ष का आशय धर्म शून्य अथवा धर्म विहीन होने से नहीं है, बल्कि सर्वधर्म समभाव से है। सरकार की दृष्टि में सभी धर्म समान हैं। वह किसी धर्म विशेष के प्रति पक्षपात नहीं करेगी और न किसी धर्म विशेष की मान्यताओं, सिद्धांतों और आदर्शों से निर्देशित होगी। धर्म निरपेक्ष होना भारत के लिए एक अनिवार्यता है, क्योंकि भारत ने लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली को स्वीकार किया है। इसका कारण यह है कि भारत में हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी, जैन एवं बौद्ध आदि अनेक धर्मों और मतों का प्रचलन है। यदि लोकतंत्र को जीवित रखना है, तो लोक में प्रचलित इन समस्त धर्मों को समान भाव से देखना होगा। इसलिए भारत के संविधान निर्माताओं ने संविधान में धर्म निरपेक्षता पर विशेष आग्रह रखा है। 

भारतीय इतिहास के मध्य युग को इस कारण भी स्मरण किया जाता रहेगा कि इस काल में राजनीति पर धर्म हावी रहा। मुसलमानों के आगमन के साथ साथ इस देश में इस्लाम का भी आगमन हुआ और तुर्क, अफगान तथा मुगलों में अकबर को अपवाद मानते हुए लगभग सभी ने इस्लाम के नाम पर शासन किया, उसको बढ़ावा दिया एवं अन्य धर्मों के अनुयायियों पर अनेक प्रकार के अत्याचार किए। इसके अलावा ‘जजिया कर’ लगाया गया, धर्म-परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया और ऐसा न करने पर लोगों को मृत्युदंड दिया गया। उसी की प्रतिक्रिया मराठों, सिक्खों तथा जाटों आदि में देखने को मिली। केवल भारत में ही धर्म राजनीति पर हावी रहा हो, ऐसा नहीं है। यूरोप में भी चर्च और पोप राजनीति पर छाए रहे। अनेक मुस्लिम देशों में आज भी धर्म के नाम पर राजनीति चलाई जा रही है तथा धर्म से ही मार्गदर्शन पा रही है। 

धर्म से राजनीति को संचालित अथवा निर्देशित होना बुरा नहीं है, किंतु तब जब हम धर्म के व्यापक स्वरूप को स्वीकार करें। व्यापक अर्थों में धर्म लोकहित में किए गए कार्यों का समूह है। वह व्यक्ति, वस्तु और पदार्थ जिसे हम धारण करते हैं, वही धर्म है। यदि इस व्यापक अर्थ वाले धर्म से राजनीति प्रेरित और संचालित हो, तो निश्चय ही ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ पूरी वसुधा हमारा परिवार है। किंतु इस अर्थ में धर्म को स्वीकार कर राजनीति का संचालन करने वाले महात्मा गांधी जैसे लोग विश्व इतिहास में नगण्य ही हुए। 

मोटे तौर पर धर्म के तीन स्तर दिखाई पड़ते हैं। पहला स्तर आध्यात्मिक अनुभव का स्तर है। इस स्तर पर धर्म व्यक्ति के ‘स्व’ का इतना विकास करता है कि उसमें ‘स्व’ और ‘पर’ का अंतर मिट जाता है। एक ही आत्मा का निवास सभी जीवों में लक्षित होने लगता है। धनी-निर्धन, शत्रु-मित्र, न्यायी- अन्यायी, छोटा-बड़ा सभी भेद समाप्त हो जाते हैं। सारे जगत में एक ‘स्व’ ही प्रभावी होने लगता है। इस आध्यात्मिक अनुभव को व्यवहार में जीने का नाम ही धर्म है। दूसरा स्तर तत्व-चिंतन अथवा विचार का है। प्रत्येक धर्म में कुछ तत्व स्वीकार कर लिए जाते हैं। इस स्तर पर विभिन्न मतांतरों का जन्म होता है। ईश्वर, जीव, जगत, सृष्टि तथा ब्रह्मांड संबंधी धारणाओं का विकास होता है। 

तीसरा स्तर आचरण से संबद्ध है। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर आदि में इसी स्तर पर स्थापना होती है। कृष्ण, राम, रहीम, ईसा, बुद्ध एवं महावीर आदि यहीं प्रतिष्ठा पाते हैं। चोटी, जनेऊ, तिलक, खतना, पगड़ी आदि इसी स्तर पर आचरण में उतरते हैं। यही धर्म अपने व्यापक अर्थ सर्वहितकारी को छोड़कर संकुचित मजहबी चेतना में परिवर्तित हो जाता है, जो एक विशेष जाति या समुदाय से जुड़ जाता है। पूजा और उपासना के विशेष ढंग बन जाते हैं। फिर वह अनेक अंधविश्वासों और व्यवहारों का कोश बन जाता है। राजनीतिज्ञ तो धर्म के इसी स्वरूप का सहारा लेकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। 

वस्तुतः धर्म आस्था और भावना पर टिका है। भावना में बड़ी शक्ति होती है। संसार में जितने बड़े कार्य हुए हैं, चाहे वह महाकाव्य की रचना हो या साम्राज्य का निर्माण अथवा कोई अन्य महान कर्म-वे सब भावना से प्रेरित होकर ही किए गए हैं। राजनीतिज्ञ पटु तो होता ही है। वह इस भावना को अपनी ओर आकृष्ट करता है। धर्म की बैसाखियों के सहारे राजनीति की वैतरणी पार करना चाहता है। ‘राजनीति’ शब्द में ‘राज’ के साथ ‘नीति’ शब्द भी जुड़ा है, जिसका अर्थ केवल सत्ता तक पहुंचने की प्रक्रिया और राज-काज संचालन नीति से ही है। राजनीतिज्ञ के लिए सत्ता प्राप्ति ही उसका परम लक्ष्य है। 

धर्मनिरपेक्ष वर्तमान भारत में यत्र-तत्र यदा-कदा धर्म के संकुचित रूप को राजनीति की बैसाखी बनाने का प्रयत्न किया जाता रहा है। पंजाब की अशांति के पीछे धर्म प्रेरित राजनीति कार्य कर रही थी। अनेक राजनीतिक दलों का आधार ही धर्म है-हिंदू महासभा, अकाली दल, मुस्लिम लीग आदि। धर्म निरपेक्ष राष्ट्र में धर्म सापेक्ष दल-भारत के लिए एक विसंगति है। 

भारत एक विशाल देश है। अनेक धर्मावलंबी यहां निवास करते हैं। यदि राजनीति पर इसी प्रकार धर्म हावी होता रहा, तो देश की अखंडता को भारी आघात पहुंचेगा। पूरा देश उन्माद से जलने लगेगा। देश टुकड़ों में बंट जाएगा। भारत में जब-जब विध्वंसात्मक शक्ति बढ़ी है, तब-तब महान विभूतियों को लीला है और देश का विभाजन कराया है। हमें क्षुद्र राजनीतिज्ञों के धर्मों से बचना चाहिए और मानवता धर्म का निर्वाह करना चाहिए।

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