विश्व योग दिवस की प्रासंगिकता अथवा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर निबंध

विश्व योग दिवस की प्रासंगिकता

विश्व बंधुत्व की भावना और राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार बनता योग अथवा विश्व योग दिवस की प्रासंगिकता (यूपी आरओ, एआरओ मुख्य परीक्षा, 2015) 

भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रतिनिधित्व कर रहा योग किस तरह से विश्व बंधुत्व की भावना और राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार बन रहा है, इस पर चर्चा करने से पहले यह जान लेना समीचीन रहेगा कि योग है क्या। योग भारत की पुरातन परंपरा की एक अमूल्य भेंट है। यह मन और शरीर, विचार और कार्य तथा संयम और मानसिक आनंद के बीच एकरूपता लाने वाली विधा तो है ही, यह मनुष्य और प्रकृति के मध्य अनुकूलन को भी बढ़ाती है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में योग को चित्त विकृतियों का निरोधक बताते हुए इसे स्वास्थ्य एवं समृद्धि के लिए हितकर बताया गया है। योग का अर्थ एवं स्वरूप अत्यंत व्यापक है। यह तो वह अनुशासन है, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है। भारतीय दर्शन में योग का संबंध तो आत्मा और परमात्मा के ‘योग’ या ‘एकत्व’ एवं परमात्मा को प्राप्त करने के नियमों और उपायों से है। योग दर्शन को व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने का श्रेय महर्षि पतंजलि को जाता है। उनके द्वारा सृजित ‘योगसूत्र’ नामक ग्रंथ योग दर्शन का मूल ग्रंथ है, जिसमें उन्होंने योग को चित्त की विकृतियों के निरोध के रूप में परिभाषित किया है। सारतः यह कहा जा सकता है कि योग मानव के उत्कर्ष का श्रेष्ठ माध्यम है। 

“यह जान लेना समीचीन रहेगा कि योग है क्या। योग भारत की पुरातन परंपरा की एक अपल्टा भेट है। यह मन और शरीर, विचार और कार्य तथा संयम और मानसिक आनंद के बीच एकरूपता लाने वाली विधा तो है ही, यह मनुष्य और प्रकृति के मध्य अनुकूलन को भी बढ़ाती है।” 

योग रूपी मानव के उत्कर्ष के जिस माध्यम को भारतीय मनस्वियों ने मानव सभ्यता को सौंपा, अब उसकी सरमि से आधुनिक, विश्व यानी आज का विश्व सुरभित हो रहा है। भारतीय मनीषा, दर्शन एवं प्राचीन परंपरा के लिए वह असाधारण क्षण था, जब 11 दिसंबर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली द्वारा 21 जून को प्रतिवर्ष ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ (International Yoga Day) के रूप में मनाए जाने की घोषणा की गई तथा वर्ष 2015 से इसे मनाए जाने की वैश्विक शुरुआत हुई। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। वर्ष 2016 में भारत की अमूल्य निधि योग को ‘मानवता की अमर्त सांस्कृतिक धरोहरों की प्रतिनिधि सूची’ (Representative List of the Intangible Cultural Heritage of Humanity) में शामिल किया गया और इस प्रकार भारतीय योग वैश्विक धरोहर बन गया। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2019 के विश्व योग दिवस की थीम ‘जलवायु क्रिया’ (Climate Action) थी। 

“भारतीय मनीषा, दर्शन एवं प्राचीन परंपरा के लिए वह असाधारण क्षण था, जब 11 दिसंबर, 2014 को संयुक्त राष्ट्र जनरल असेम्बली द्वारा 21 जून को प्रतिवर्ष ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ (International Yoga Day) के रूप में मनाए जाने की घोषणा की गई तथा वर्ष 2015 से इसे मनाए जाने की वैश्विक शुरुआत हुई। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका।” 

यह कहना असंगत न होगा कि योग अब समूचे विश्व को जोड़कर विश्व बंधुत्व का सूत्रधार बन रहा है। प्रतिवर्ष 21 जून (अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस) को सारा विश्व योगमय हो रहा है। सारी दुनिया योग के माध्यम से जुड़ रही है और मन, बुद्धि व आत्मा को एकाकार कर शांति की अनुभूति कर रही है। दुनियाभर में योग के समर्थकों के बढ़ने से विश्व बंधुत्व की भावना को बल मिल रहा है। आधुनिक विश्व में आतंकवाद, अशांति, युद्ध, हिंसा, जलवायु परिवर्तन एवं ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं बढ़ी हैं, जिनसे निपटने में योग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, क्योंकि ये सभी समस्याएं, जो बड़ी चुनौती बनकर हमारे सामने खड़ी हैं, वस्तुतः ये सभी अनियंत्रित चित्तवृत्तियों की ही देन हैं, जिनका निरोध करना ही योग का मूल आधार है। इस प्रकार योग लोक-कल्याण के मार्ग को प्रशस्त कर विश्व बंधुत्व की भावना को प्रोत्साहन प्रदान कर रहा है। 

आज जिस तरह से वैश्विक अशांति, तनाव और हिंसा बढ़ी है, उसका मुख्य कारण चित्तविकृतियां और विषय-वासनाएं हैं, असंयम और मन की मलिनता है, जो कटुता को बढ़ाती हैं और इस कटुता की परिणति, अशांति, तनाव, हिंसा और अंततः युद्ध एवं आतंक के रूप में सामने आती है। योग हमें इन विकृतियों से उबार कर बंधुत्व और लोक-कल्याण की ओर ले जाता है। जब चित्त विकृतियों पर अंकश लग जाता है तब मन विषय-वासनाओं की ओर नहीं भागता। वह शांति-विश्रांति की ओर बढ़ता है और इस प्रकार उसमें सौहार्द और प्रेम के बीज फूटते हैं और वह घृणा और द्वेष के बजाय बंधुत्व की ओर अग्रसर होता है। यही बंधुत्व की भावना विश्व को शांति और सद्भाव से जोड़ती है। इसे योग संभव बना रहा है। योग सार्वभौमिक शांति का आधार बन चुका है। इससे मेल-जोल बढ़ रहा है और हम एक-दूसरे के करीब आकर बंधुत्व की जड़ों को मजबूत कर रहे हैं। योग को लेकर एक सकारात्मक विश्व-दृष्टि विकसित होती दिख रही है और सारा विश्व योगोन्मुख हो रहा है। 

योग राष्ट्रीय एकता का भी सूत्रधार बन रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, तो हिमालय की ऊंची चोटियों से लेकर धप में तपते रेगिस्तान तक योग की खुशबू फैली है। हम योगमय होकर राष्ट्रमय भी हो रहे हैं और इस प्रकार राष्ट्रीय एकता की डोर को मजबूत कर रहे हैं। देश के विभिन्न प्रदेशों में, विभिन्न वर्गों के लोग जगह-जगह योग करने के लिए जुटते हैं। इससे सामाजिकता, समानता और सामुदायिकता की भावना को बल मिलता है और हम एक-दूसरे के करीब आते हैं, जिससे राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ होती है। हम योग से जुड़ कर अपनी पुरातन परंपरा से जुड़ते हैं, उस पर गौरव की अनुभूति करते हैं और इस प्रकार अपनी राष्ट्रीयता पर भी गर्व करते हैं, अपनी संस्कृति पर गौरवान्वित होते हैं। हमें अपनी विरासत की महत्ता का भी पता चलता है। 

निःसंदेह मेल-जोल को बढ़ाकर योग राष्ट्र की एकता में अपना योगदान सुनिश्चित कर रहा है। हम अपनी इस सांस्कृतिक विरासत का सम्मान कर अपनी सांस्कृतिक पहचान और एकता को मजबूत बना रहे हैं। भारत में एक जन-अभियान के रूप में योग राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहित कर रहा है। अच्छी बात तो यह है कि योग देश में समरसता का वाहक बन रहा है। बड़े-छोटे सभी समान रूप से इससे जुड़ रहे हैं। भिन्न-भिन्न जाति, धर्म, भाषा, संस्कृति या क्षेत्र से संबंध रखने वाले इन भिन्नताओं को दरकिनार करते हुए योग के माध्यम से मेल-जोल बढ़ा रहे हैं और इस प्रकार राष्ट्रीय एकता की उस प्रक्रिया को मजबूत बना रहे हैं, जो सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक होती है। 

योग जहा विश्व बभुत्व और राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार बन कर अपनी उपयोगिता को सिद्ध कर रहा है, वहीं आरोग्य प्रदाता भी सिद्ध हो रहा है। योगमय होकर हम आरोग्यमय भी हो रहे हैं और यह बात देश दुनिया दोनों पर लागू है। योग के माध्यम से हमारे अंदर स्वास्थ्य के प्रति चेतना बढ़ी है और योग दिवस का स्वरूप ‘स्वास्थ्य चेतना दिवस’ जैसा हो गया है। हम ‘योग’ से ‘आरोग्य’ की तरफ बढ़ रहे हैं। यानी योग ने रोग से निरोग’ की हितकर राह भी दिखाई है। यह मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के साथ शारीरिक उन्नति में भी सहायक बन रहा है। योग के घटक-आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि जहां व्यक्तिगत उत्कर्ष के माध्यम हैं, वहीं अच्छे स्वास्थ्य के प्रदाता भी हैं। आसन में जहां योगासनों द्वारा शारीरिक नियंत्रण प्राप्त किया जाता है, वहीं प्राणायाम, प्राण पर नियंत्रण की विधि है। प्रत्याहार के अंतर्गत जहां इंद्रियों को अंतर्मुखी बनाया जाता है, वहीं धारणा का संबंध एकाग्रचित होने से है। 

ध्यानस्थ होने की क्रिया ध्यान है, तो समाधि शब्दों से परे परम चैतन्य | की अवस्था है। स्पष्ट है कि योग का मार्ग अत्यंत कल्याणकारी एवं लाभप्रद है। 

योग विश्व बंधुत्व की भावना तथा राष्ट्रीय एकता का सूत्रधार बन कर देश-देशांतर का कल्याण कर रहा है, तो स्वास्थ्य और समृद्धि भी प्रदान कर रहा है। इस प्रकार यह प्राचीन भारतीय विधा लोक-कल्याण की भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रही है। जैसे-जैसे योग की ग्राह्यता वैश्विक स्तर पर बढ़ेगी, वैसे-वैसे विश्व का कल्याण होगा। अपने देश में तो हम इससे लाभान्वित हो ही रहे हैं। 

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