Real life Inspirational Stories in Hindi-कार्य के प्रति निष्ठा,सबसे महान कौन?,भगवद्भक्त के लक्षण

Real life Inspirational Stories in Hindi-

Real life Inspirational Stories in Hindi-कार्य के प्रति निष्ठा,सबसे महान कौन?,भगवद्भक्त के लक्षण

Best Hindi motivational stories- कार्य के प्रति निष्ठा

राजस्थान के प्रसिद्ध जैन साहित्यकार थे-टोडरमल। उत्कृष्ट लेखन क धनी इन साहित्यकार में अपने काम के प्रति अदभुत लगन थी। वे जिस भी विषय पर लिखना तय कर लेते थे, उसे एक बार हाथ में लेने पर पूरा करके ही छोड़ते थे। एक समय वे अपने ग्रंथ ‘मोक्षमार्ग’ पर काम कर रहे थे। यह टोडरमल का लिखा विख्यात ग्रंथ है और आज भी बहुसंख्यक लोगों के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है। 

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जब टोडरमल के मस्तिष्क में मोक्षमार्ग लिखने का विचार आया तो उसके लिए उन्होंने अनेक लोगों से सामग्री जुटानी आरंभ की। टोडरमल अपने काम में इतने डूब गए कि उन्हें रात और दिन का होश ही न रहा और न खाने-पीने की सुध रही। घर के लोग उनका ध्यान रखते और वे अपना ग्रंथ लिखते रहते। 

एक दिन टोडरमल अपनी मां से बोले, “मां! आज सब्जी में नमक नहीं है। लगता है आप नमक डालना भूल गईं।” 

उनकी बात सुनकर मां मुस्कराते हुए बोली, “बेटा! लगता है आज तुमने अपना ग्रंथ पूरा कर लिया है?” 

मां की बात सुनकर टोडरमल चौंके और हैरानी से बोले, “हां मां! मैंने अपना ग्रंथ पूरा कर लिया है, किंतु आपको इस बात का कैसे पता चला?” 

मां ने जवाब दिया, “नमक तो मैं तुम्हारे भोजन में पिछले छह महीने से नहीं डाल रही थी, किंतु उसका अभाव तुम्हें आज पहली बार महसूस हुआ है। इसी से मैंने जाना। जब तक तुम्हारे मस्तिष्क में पुस्तक की विषय-सामग्री थी तब तक नमक जैसी वस्तुओं के लिए स्थान नहीं था। अब जब वह जगह खाली हो गई तो इंद्रियों के रसों ने उसे भरना शुरू कर दिया।” 

दरअसल, कार्य के प्रति लगन और निष्ठा हो तो कार्य थोड़े समय में और उत्कृष्टता के साथ पूरा होता है। इसलिए जब भी कोई कार्य हाथ में लें तो उसे पूरी लग्न के साथ करें। 

Motivational storyसबसे महान कौन?

एक बार देवर्षि नारद के मन में यह जानने की इच्छा पैदा हुई कि इस पूरे ब्रह्मांड में सबसे महान कौन है? 

यह जानने के लिए वह वैकुंठ लोक पहुंचे। वहां उन्होंने भगवान विष्णु से पूछा, “प्रभु! इस पृथ्वी पर सबसे महान कौन है?” 

नारद का प्रश्न सुनकर प्रभु ने मुस्कराते हुए कहा, “नारद! सबसे बड़ी तो पृथ्वी दिखती है, इसलिए हम पृथ्वी को इसकी संज्ञा दे सकते हैं। दूसरी ओर उसे समुद्र ने घेर रखा है, इस कारण समुद्र उससे भी बड़ा सिद्ध हुआ। 

“एक बार उस समुद्र को भी महर्षि अगस्त्य ने पी लिया था, इस कारण समुद्र भी कैसे बड़ा हो सकता है? ऐसी स्थिति में तो अगस्त्य ही सबसे बड़े हुए, लेकिन उनका वास कहां है? अगस्त्य तो आकाश के एक सीमित भाग में मात्र बिंदु के समान चमक रहे हैं, इस कारण तो आकाश ही उनसे बड़ा साबित हुआ। 

“वामन अवतार के समय मैंने इस आकाश को भी एक ही पग में नाप लिया था। इस तरह तो मैं ही सबसे महान सिद्ध होता हूं। फिर नारद! मैं भी सर्वाधिक महान नहीं हूं। इसकी वजह यह है कि मैं हमेशा आपके हृदय में अंगूठे जितनी जगह में ही रहता हूं। इसलिए सबसे महान तो आप ही सिद्ध हुए।” 

भगवान के इन वाक्यों को सुनकर नारद भाव-विभोर हो गए। वे भगवान के हृदय में भक्तों के स्थान को लेकर गद्गद थे। नारद समझ गए कि इस जगत में कुछ भी निम्न और श्रेष्ठ नहीं। शब्द तो सापेक्ष हैं। महान तो वह है जिसमें यह समस्त सृष्टि है, जो सबका आधार है-अर्थात् श्रीविष्ण! 

motivational stories in hindi for lifeभगवद्भक्त के लक्षण

महर्षि मार्कंडेय ने एक बार भगवान विष्णु से प्रश्न किया, “भगवन! भगवद्भक्त के लक्षण क्या हैं? वे कौन-कौन से कर्म हैं, जिन्हें करने से व्यक्ति भगवान का प्रिय बन जाता है?”

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भगवान ने उत्तर दिया, “महर्षि! जो संपूर्ण जीवों के हितैषी हैं, जो दूसरों के दोष नहीं देखते, जो संयमी हैं, जो इंद्रियों को वश में रखने वाले और शांत स्वभाव के हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। इसी प्रकार जो मन, वाणी और क्रिया द्वारा दूसरों को कभी पीड़ा नहीं पहुंचाते, जिनकी बुद्धि सात्विक है और जो हमेशा सद्कर्मों और सत्संग में लगे रहते हैं, वही उत्तम भक्त हैं।” 

कुछ क्षण मौन रहने के बाद भगवान ने विस्तार से बताया, “जो व्यक्ति अपने माता-पिता में भगवान विश्वनाथ के दर्शन करे, उन्हें गंगा की तरह पावन मानकर उनकी नित्य प्रति सेवा करे, जो दूसरों की उन्नति देखकर प्रसन्न हो, दूसरों को यश दें, दूसरों की तृप्ति के लिए कुआं, बावड़ी, तालाब आदि बनवाए, वह श्रेष्ठ भक्त है।” 

भगवान ने महर्षि से आगे कहा, “अतिथियों का सत्कार करने वाला, जरूरतमंदों को जलदान और अन्नदान करने वाला, शुद्ध हृदय से हरिनाम का जाप करने वाला आदर्श गृहस्थ भी मेरा प्रिय भक्त है। इसलिए हे मार्कंडेय ! जो व्यक्ति इस प्रकार की जीवनचर्या का पालन करता है, वह सदा सपरिवार सुखी और संतुष्ट रहता है।” 

महर्षि मार्कंडेय भगवान के वचन सुनकर गद्गद हो गए। 

भगवान ने अपने वचनों द्वारा स्पष्ट रूप से बता दिया था कि जो अपने कर्मों को निष्काम भाव से करता है, जो कर्मों का कर्ता स्वयं को नहीं मानता, तथा किए गए कर्मों को ‘इदं न मम्’ इस भाव से भगवान को अर्पित कर देता है, जो सदैव दूसरों का हित-चिंतन करता है, वह कर्मशील ही अनन्य भक्त है। 

motivational kahaniya in hindi- प्रायश्चित

बौद्ध धर्म की नास्तिकतावादी विचारधारा का खंडन करने के लिए कुमारिल भट्ट ने प्रतिज्ञा की थी और उसे पूरा करने के लिए उन्होंने तक्षशिला विश्वविद्यालय में बौद्धधर्म का गहन अध्ययन पूरा किया। उन दिनों की प्रथा के अनुसार छात्रों को आजीवन बौद्ध धर्म के प्रति निष्ठावान रहने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी, तभी उन्हें विश्वविद्यालय में दाखिला मिलता था। कुमारिल ने झूठी प्रतिज्ञा ली और शिक्षा समाप्त होते ही बौद्ध मत का खंडन और वैदिक धर्म का प्रसार आरंभ कर दिया। अपने प्रयास में उन्हें सफलता भी बहुत मिली। शास्त्रार्थ की धूम मचाकर, उन्होंने शून्यवादिता की निस्सारता सिद्ध करके लड़खड़ाती वैदिक मान्यताएं फिर से मजबूत बनाईं। कार्य में सफलता मिली पर कुमारिल का अंत:करण विक्षुब्ध ही रहा। गुरु के सामने की हुई प्रतिज्ञा एवं उन्हें दिलाए हुए विश्वास का घात करने के पाप से उनकी आत्मा हर घड़ी दुखी रहने लगी। अंत में इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने अग्नि में जीवित जल जाने का निश्चय किया। प्रायश्चित का करुण दृश्य देखने के लिए देश भर के अगणित विद्वान पहुंचे, उन्हीं में आदिशंकराचार्य भी थे। उन्होंने कुमारिन भट्ट से कहा, “आपने तो जनहित के लिए ऐसा किया था, फिर प्रायश्चित क्यों कर रहे हो?” 

इस पर कुमारिल भट्ट ने कहा, “अच्छा काम भी अच्छे मार्ग से ही किया जाना चाहिए, कुमार्ग पर चलकर श्रेष्ठ काम करने की परंपरा गलत है। मैंने आपाद्धधर्म के रूप में यह काम किया, पर उसकी परंपरा शुरू नहीं करना चाहता। दूसरे लोग मेरा अनुकरण करते हुए अनैतिक मार्ग पर चलते हुए अच्छे उद्देश्य के लिए प्रयत्न करने लगें तो इससे धर्म और सदाचार ही नष्ट होगा और तब प्राप्त हुए लाभ का कोई मूल्य नहीं रह जाएगा। अतएव सदाचार की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित करने के लिए मेरा प्रायश्चित करना ही उचित है।” 

कुमारिल प्रायश्चित की अग्नि में जल गए। उनकी प्रतिपादित आस्था सदा अमर रहेगी। 

Real life Inspirational Stories – गुरु के शब्दों का जादू

राजस्थान में जयपुर जिलांतर्गत सांगानेर क्षेत्र में पैदा हुए पठान रज्जब अली संत दादू से बहुत प्रभावित थे। वह समय-समय पर संत के पास जाकर उनके उपदेश सुना करते थे। 

Motivational story-सबसे महान कौन?

दादू ने देखा कि कुछ समय में ही रज्जब ने नशा और मांसाहार त्यागकर सात्विक वृत्ति अपना ली है। उनकी भक्ति व प्रतिभा ने दादू को काफी प्रभावित किया। दादू को लगने लगा कि यह युवक उच्चकोटि का भक्त साधक बनेगा। 

परिवार वालों ने रज्जब का विवाह तय कर दिया। रज्जब की बारात सांगानेर से आमेर जा रही थी। आमेर से कुछ मील पहले ही दादू की कुटिया थी। रजब दादू का आशीर्वाद लेने वहां पहुंचे। संत दादू उस समय भगवान के ध्यान में मगन थे। ध्यान से वैसे ही वे उठे, उन्होंने अपने शिष्य को दूल्हे के वेश में देखकर कहा –

‘रज्जब तेणो गज्जब किया, सिर पर बांधा मौर।

आया था हरिभजन को, करै नरक की ठौर।’ 

अर्थात तू तो भगवान का भजन करने व अपने सद्विचारों से संसार का कल्याण करने के लिए आया था। अब संसार के प्रपंचों में फंसकर जीवन को नरक बना लेगा। 

गुरु के शब्दों ने चमत्कार किया। रज्जब की विरक्त भावना जाग उठी। उन्होंने अपने सिर का मौर उतारकर छोटे भाई को सौंपते हुए पिता से कहा, “पिताजी! उस लड़की का विवाह मेरे इस छोटे भाई से करा दें। मैं हरिभजन करते हुए समाज की सेवा करूंगा।” 

उसी दिन से रज्जब गुरु दादू दयाल की सेवा और साधना में लग गए। दाद के भक्तिपरक पदों के संकलन का ऐतिहासिक काम उन्होंने ही किया। संत रज्जब ने स्वयं भी असंख्य पदों की रचना की। 

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