Real life Inspirational Stories-समता भाव 

Real life Inspirational Stories-समता भाव 

Real life Inspirational Stories-समता भाव 

एक बार शंकराचार्य वेदपारंगत श्री गोविंद भगवत्पाद से मिलने के लिए बद्रीनाथ की ओर रवाना हुए। जब वे पहाड़ी यात्रा से थक गए तो रास्ते में एक सरोवर के किनारे बैठकर विश्राम करने लगे। अचानक उनकी नजर जल में तैरते कुछ मेढकों पर पड़ी जो आपस में खेल रहे थे। ग्रीष्म ऋतु की भरी दोपहरी थी। पहाड़ की कठिन यात्रा से तो वे स्वयं ही इतने संत्रस्त हो गए थे, फिर मेढकों की बात ही क्या? तालाब का पानी भी तब तक गर्म हो गया था और मेढकों को उस जल में रहना असह्य हो रहा था। 

इतने में एक मेढक की ‘टर्र-टर्र’ ध्वनि जोर से सुनाई पड़ी। वह एक मेढक का छोटा बच्चा था जो गर्म जल में रहकर बुरी तरह से चीख रहा था। जल की असह्य गर्मी उसे बर्दाश्त नहीं हो रही थी। मेढक का वह बच्चा गर्मी से परेशान होकर जल से बाहर निकल आया और किनारे पर आकर बैठ गया।

थोड़ी ही देर में मेढक का क्रंदन सुनकर एक काला नाग भी उस मेढक के समीप पहुंच गया। यह देख मेढक की तो जैसे जान ही निकल गई। वह विस्फारित नेत्रों से नाग की ओर देखने लगा। लेकिन यह क्या! सर्प ने उसे खाया नहीं बल्कि उसके सिर पर अपना फन फैलाकर खड़ा हो गया। 

शंकराचार्य ने जो यह दृश्य देखा तो वे आश्चर्यचकित हो उठे। यह तो एक अनहोनी-सी बात हो गई थी। भक्षक ही रक्षक बन गया था। शंकराचार्य जब गोविंद भगवत्पाद से मिले तो उन्होंने यह अनोखी घटना उन्हें सुनाई। तब स्वामी जी ने उनसे कहा, “आपने जहां यह दृश्य देखा है वह स्थान पहले समय में महर्षि भृगी का आश्रम था। वहां सभी जीव वैर भाव भूलकर आपस में भाईचारे का बर्ताव करते थे। यह घटना भी उसी की पुनरावृत्ति है।” 

यह शब्द सुनकर शंकराचार्य ने विचार किया-‘जब भक्षक और भक्ष्य में एकता संभव है तो फिर मानव-मानव में क्यों नहीं। उनके मनश्चक्षुओं के आगे हिमालय से कन्याकुमारी तक का विशाल क्षेत्र उपस्थित हो गया। उन्होंने सोचा कि यदि दक्षिण के लोगों का उत्तर के तीर्थों के साथ और उत्तर के लोगों का दक्षिण के तीर्थों के प्रति श्रद्धा और समभाव पैदा हो जाए तो देश में एकता संभव है।

तब उन्होंने दृढ़ संकल्प लेकर समूचे भारत का भ्रमण किया तथा उत्तर में बद्रीनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम्, पूरब में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिका नगरी के समीप मठों की स्थापना की। इससे जन-जन में ऐक्य और समता भाव उत्पन्न होने संबंधी उनका सपना साकार हो गया। आज भी इन चारों धामों के दर्शनार्थ आए लोगों को इस बात का स्मरण नहीं रहता कि वे उत्तर के हैं या दक्षिण के। इसके विपरीत वे स्वयं को ‘भारतवासी’ कहना ही पसंद करते हैं। 

 

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