राम कहानी-सेतु निर्माण 

राम कहानी

राम कहानी-सेतु निर्माण 

राम की पत्नी सीता को रावण ने लंका में बंधक बना रखा था। राम वानर सेना को लेकर सीता को मुक्त कराने जा रहे थे। रास्ते में विशाल समुद्र था जिसे पार करके ही लंका पहुँचा जा सकता था। सभी समुद्र के किनारे पहुँचे। जोरों की आँधी चल रही थी। काले बादल आकाश में छाए थे और ज़ोरदार बारिश शुरु हो गयी थी। समुद्र ने ऊँचे-ऊँचे ज्वार के कारण भयानक रूप धारण कर रखा था। राम ने देखा कि सेना के साथ इसे पारकर दूसरी ओर जाना अत्यन्त कठिन है। राम वहीं किनारे बैठकर समद्र के शांत होने की प्रतीक्षा करने लगे। 

उन्होंने समुद्र से प्रार्थना करी कि वह शांत होकर उन्हें मार्ग दे दे। पर उनकी प्रार्थना का समुद्र पर कोई असर नहीं हुआ। तीन दिन व्यतीत हो जाने पर राम का धैर्य टूटने लगा। उन्होंने तीर-धनुष उठाया और समुद्र की ओर तानकर कहा, “तमने मेरी प्रार्थना नहीं सनी। अब मैं अग्नि बाण से तम्हें सोख लूँगा।” 

राम की शक्ति का समुद्र को पता था। वह तुरंत राम के समक्ष उपस्थित हुआ और हाथ जोड़कर बोला, “भगवन्, ऐसा अनर्थ न करें। मैं मूढ़ हूँ, बस अपना कार्य कर रहा था। धरती, पवन, जल, बिजली इन सभी को अपने स्वभाव में ही रहना चाहिए। कृपया मुझे क्षमा कर दें। मेरी एक प्रार्थना है… आपकी वानर सेना में नल नामक वानर है। वह कलाकुशल विश्वकर्मा जी पन पुत्र है। उसे कुछ सिद्धियां प्राप्त हैं। यदि नल सेतु बनाएगा तो उसे यथास्थान उठाए रखने में मैं उसकी सहायता करूँगा और आप लंका जा पाएँगे।” 

राम कहानी

श्री राम का आशीर्वाद पाकर सभी सेतु र्मािण में लग गए। पत्थर, चट्टान, पेड़,झाड़ियाँ जिसे जो मिलता लाकर देता जाता और नल उसे व्यवस्थित करता जाता। पाँच दिनों के अथक परिश्रम के परिणाम स्वरूप सेतु बनकर तैयार हो गया। ईश्वर ने स्वर्ग से आकर सभी को आशीर्वाद दिया। 

प्रभु राम अपनी वानर सेना के साथ समुद्र पार कर लंका पहुँचे और दुष्ट रावण से सीता को मुक्त कराने में सफल हुए।

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