अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद पर निबंध |Ram Janm Bhumi par nibandh

अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद पर निबंध

अयोध्या राम जन्म भूमि विवाद पर निबंध |Ram Janm Bhumi par nibandh

भगवान राम का जन्म अयोध्या में हुआ था। वह अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र थे। उन्होंने अपने पिता और सौतेली माता कैकेयी की आज्ञा से राज्य छोड़ दिया और 14 वर्षों तक वनों में रहे। वनवास के पश्चात जब वे राजा बने, तो जनापवाद के कारण उन्होंने सीता जी को त्याग दिया, क्योंकि वनवास के समय रावण ने उन्हें हर लिया था और काफी लंबे समय तक अपने यहां रखा था। मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सर्वत्र पूजा जाता है, क्योंकि वे आदर्श राजा थे। उनके पुत्र कुश ने उनकी जन्मभूमि पर एक मंदिर का निर्माण किया था। 

रामजन्म भूमि अयोध्या में निर्मित वह मंदिर सबसे पहले यूनानी मिनेंडर द्वारा 150 ई.पू. में ध्वस्त किया गया था। शुंग राजा घुमत्सेन ने तीन माह में पुनः उस मंदिर को निर्मित करा दिया था। बौद्धकाल में उस राम मंदिर की उपेक्षा होती रही। उज्जैन के राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने पुराने दस्तावेजों के आधार पर रामजन्म भूमि का निर्धारण किया और पुनः उस मंदिर का निर्माण कराया। वह एक भव्य कलात्मक मंदिर था, जिसमें 84 काले कसौटी के स्तंभ थे। इस मंदिर पर सन 1033 ई. में सालार महमूद ने दो बार आक्रमण किया। राजा सुलहदेव ने उसे बहराइच के युद्ध में मार डाला। 

मुगल साम्राज्य के प्रथम बादशाह बाबर ने सन 1520 से 1530 के मध्य इस मंदिर पर चार बार आक्रमण किए। उसके सेनापति मीर बाकी ने मंदिर को ध्वस्त करके उस मलबे पर मस्जिद का निर्माण कराया। तब से लेकर अब तक मंदिर बनाने के लिए हजारों बार आक्रमण हो चुके हैं। राजा टोडरमल और बीरबल की सलाह मानकर बादशाह अकबर ने मस्जिद के पास एक चबूतरे पर मंदिर निर्माण की आज्ञा दे दी, परंतु हिंदुओं का संघर्ष चलता रहा। सन 1851 में बाबा रामचंद्र दास और फकीर अमीर अली में समझौता हो गया। तदनुसार मंदिर हिंदुओं को लौटा दिया गया, परंतु अंग्रेजों को यह अच्छा नहीं लगा। उन्होंने बाबा रामचंद्र दास और फकीर अमीर अली को फांसी पर लटका दिया। 

आजादी के बाद 22 अक्टूबर, 1949 को फैजाबाद के तत्कालीन कलेक्टर श्री के.के. नायर ने उस कथित बाबरी मजिस्द में राम लला की मूर्ति स्थापित करवा दी, परंतु मुस्लिम वोटों की खातिर सरकार ने उसमें ताले लगवा दिए। लेकिन वहां पूजा-अर्चना चलती रही। रामजन्म भूमि संघर्ष समिति के लगातार सत्याग्रह से 1 फरवरी, 1986 को मंदिर के द्वार खोल दिए गए। 

प्रयाग के कुंभ मेले में 1 फरवरी, 1989 को एक विशाल संत सम्मेलन में यह निश्चय किया गया कि अयोध्या में राम जन्मभूमि पर एक विशाल मंदिर का निर्माण किया जाए। उसका शिलान्यास प्रबोधनी एकादशी पर 9 नवंबर, 1989 को किया जाए। शिलान्यास रोकने के लिए राज्य और केंद्र सरकार ने कई रोड़े अटकाए। विभिन्न प्रदेशों में मंदिर निर्माण के लिए मुहिम चलाई गई। 

राम मूर्ति से 152 फीट पूर्व तथा वहां से साढ़े सत्रह फीट दक्षिण में सिंह द्वार के शिलान्यास का स्थान निर्धारित किया गया। मंदिर निर्माण का भार प्रधान वास्तुविद श्री चंद्रकांत सोमपुरा के अधीन था। निर्धारित स्थान पर 9 नवंबर, 1989 को भूमि-कार्य किया गया। फिर 10 नवंबर, 1989 को एक हरिजन श्री कामेश्वर चौपाल के हाथ से शिलान्यास हुआ। इसमें 7,000 से अधिक कार सेवक एकत्रित हुए, परंतु जिलाधीश के आदेश से कार सेवा रोक दी गई। विवाद को बढ़ता देखकर तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने चार माह में समस्या का समाधान करने की घोषणा की, परंतु कुछ नहीं हो सका। 

गुजरात प्रांत में प्रभास क्षेत्र के निकट शिवजी का एक विशाल मंदिर सोमनाथ मंदिर के नाम से स्थापित था, जिसे 1025 ई. में महमूद गजनवी ने लूटकर नष्ट कर दिया था। इसके पश्चात अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति अफजल खां ने उसे तहस-नहस कर दिया। औरंगजेब के सेनापति आजम खां ने वहां मस्जिद बनवा दी। स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सहयोग से पुनः मंदिर निर्माण कराया गया, जिसमें मुसलमानों का भी सहयोग प्राप्त था। 

भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा निकालने की घोषणा की। समाजवादी और वामपंथी नेताओं ने विरोध करते हुए प्रधानमंत्री से रथयात्रा रोकने की मांग की। केंद्र सरकार ने 23 अक्टूबर, 1990 को समस्तीपुर में श्री आडवाणी को गिरफ्तार कर रथयात्रा रोक दी। अयोध्या के राम मंदिर पर कार सेवक पहुंचे, जहां उन पर लाठी और गोलियां चलाई गईं। ऐसे में अनेक कार सेवक मारे गए। 

6 दिसंबर, 1992 को पुनः कार सेवकों की एक विशाल सभा बुलाई गई। सभा की समाप्ति के बाद एक उन्मादी भीड़ ने कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को तोड़कर गिरा दिया। रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के निपटारे के लिए दस्तावेज मांगे गए। तब न्यायालय में इस विवाद को पेश किया गया। न्यायालय ने उक्त भूमि के खनन का आदेश दिया। भारतीय पुरातत्व विभाग की देखरेख में खुदाई की गई, जिसमें खुदाई के पश्चात अनेक अवशेष चिह्न मिले। इन चिह्नों से मंदिर के होने की पुष्टि होती है। परंतु न्यायालय ने अब तक किसी भी पक्ष में निर्णय नहीं दिया है। अतः यह विवाद बना हुआ है, जिससे आए दिन कहीं कहीं हिंदू-मुस्लिम तनाव भड़कता रहता है।

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