रक्षाबंधन पर निबंध- Raksha Bandhan Essay in hindi(राखी का त्यौहार)

Raksha Bandhan Essay in hindi

रक्षाबंधन पर निबंध-Raksha Bandhan Essay in hindi

रक्षाबंधन पर निबंध- श्रावणी का रसवंती झडी में जिस प्रकार कषकों के नयनों में उल्लास छाया रहता है उसी  प्रकार श्रावणी पर्णिमा के दिन उन बहनों के आनंद का कल-किनारा नहीं दीखता, जिनके भाई रक्षासूत्र बँधवाने के लिए उपस्थित हों। किंतु सूखे के मौसम में जिस तरह कृषकों के भोले चेहरे पर उदासी की परी वर्णमाला अंकित हो जाती है, उसी  तरह उन बहनों की मायूसी को कौन माप सकता है, जिनके भाई नहीं हों या उस दिन कहीं चले गए हों। 

वस्तुतः, रक्षाबंधन भाई-बहन के परम पवित्र प्रेम का स्मारक पर्व है। वे दो नाजुक घागे त्याग और प्रेम के प्रतीक हैं.। इन रेशमी धागों में इतनी शक्ति है, जितनी लोहे की जंजीरों में भी नहीं। लौहश्रींखला को झटक देना आसान है, किंत जो भी बहन के इस प्रेमबंधन में बंध गया उसके लिए इसे तोडकर निकल जाना असंभव है|भाई-बहन इस दिव्य प्रेम की अनेकानेक विस्मयकारिणी कहानियाँ सुनी जाती हैं। 

लुटेरे-हत्यारे तक ने अपने गिरोह के सरदार के आदेश की अवज्ञा कर उस रमणी का रक्षा का, जिसने कभी उसको कलाई में राखी बाँधी थी। इस प्रकार, न मालूम कितने भाइयों ने अपनी बहनों की राखियों की लाज रखने के लिए अपने को तलवार की धार से भिड़ा दिया, विपत्तियों के व्यूह का भेदन बड़ी ही वीरता के साथ किया। इसका बड़ा ही रोमांचकारी वर्णन स्वर्गीय वृंदावनलाल वर्मा ने अपने ‘राखी की लाज’ नामक नाटक में किया है। 

 पुराणों में रक्षाबंधन की कथा मिलती है। एक बार युधिष्ठिर ने सांसारिक संकटों से मुक्ति का उपाय श्रीकृष्ण से पूछा। श्रीकृष्ण ने कहा कि वही उपाय बताता हूँ, जो उपाय इंद्र की रक्षा के लिए इंद्राणी ने किया था। प्राचीन काल में एक बार बड़ा भीषण देवासुर-संग्राम छिड़ा। देवता पराजित तथा असुर विजयी हो रहे थे। स्थिति यहाँ तक बिगड़ी कि देवेंद्र भी पराजित हो गए। वे अब अपनी राजधानी छोड़कर भागने को उद्यत हो गए। 

इंद्राणी ने श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन विधिपूर्वक तैयार किए रक्षाकवच को इंद्र के दाहिने हाथ में बाँधा । इसका बड़ा ही अद्भुत परिणाम हुआ। देवेंद्र का मस्तक विजयतिलक से विभूषित हुआ और दानवेंद्र राजा बलि बाँध लिए गए। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि उपर्युक्त पद्धति से जो मनुष्य रक्षाबंधन पाते हैं, उनके पास सालभर न तो रोग आता है और न कोई अशुभ व्यापता है| 

इस रक्षाबंधन के दिन ब्राह्मणों का समुदाय रंग-बिरंगे रक्षासूत्र यजमानों के हाथों में बाँधने निकल जाता है। अनेक छोटे-छोटे बच्चे भी गाँवों-नगरों में अनजाने अपरिचित लोगों को रोककर उनके हाथों में रक्षासूत्र बाँधते हैं। 

इस प्रकार, यह त्योहार भाई-बहन के दिव्य प्रेम एवं पुरोहित-यजमान के सदभाव की याद दिलाने के लिए उपस्थित होता है। रक्षाकवच द्वारा राष्ट्र की भगिनीशक्ति यदि एक ओर अपने भ्राताओं पर शुभकामनाओं एवं आशीर्वादों की अमृतवर्षा करती है, तो दूसरी ओर सबल भ्रातृगण अपने राष्ट्र के अबला-समुदाय के अभयदान के लिए कृतसंकल्प हो जाते हैं। 

इसी दिन ब्राह्मणवर्ग, अर्थात ज्ञान का. आराधकवर्ग अवशिष्ट जनता पर अपनी मंगलकामनाओं का मंदाकिनी-वारि छिड़कता है। आएँ, हम सभी कंकम, मिष्टान्न एवं राखियों में सजी थालियाँ लिए बहनों तथा आशीर्वादों की झोली लिए पूज्य गुरुओं के समक्ष अपने कर्म के प्रतीक दाहिने हाथ को राखियों से सुसज्जित होने के लिए बढ़ा दें-हमारी कर्मशक्ति इतनी अनंतगुणित हो जाएगी कि हमारी वैयक्तिक एवं राष्ट्रीय विजय निश्चित है। .

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