वर्षा ऋतु पर निबंध – Essay on Rainy Season in Hindi

वर्षा ऋतु पर निबंध

वर्षा ऋतु पर निबंध – Essay on Rainy Season in Hindi

क्या कभी आपने ग्रीष्म-दैत्य के अतिशय अत्याचार से अग-जग को आकुल-व्याकुल होते नहीं देखा है? उस समय पृथ्वी तवे की तरह तपने लगती है। जब उसे ग्रीष्म का निदारुण अनाचार सह्य नहीं होता, तब उसका हृदय विदीर्ण हो उठता है। उसकी आंतरिक पीड़ा दरारों के रूप में दृष्टिगत हो उठती है। आकाश से दाहक सूर्यरश्मियाँ अग्निशर की तरह छूटती हैं। ग्रीष्मरूपी पिशाच जब सुहागिन सरिताओं का शोणित सोख लेता है, तब बेचारी बीमार विधवाओं की तरह मालूम होने लग जाती हैं।

सघन जेठ की दुपहरी में जब छाँह भी छाँह चाहती है, तब सुकुमार-तन मानव की कौन कहे! पक्षियों के घोंसले कुम्हार के आँवें बन जाते हैं। भोले कृषकों के मुखड़ों पर उदासी का आलम छा जाता है। वे अपलक आँखों से निष्ठुर गगन को निहारते रहते हैं। कृषककुमारियाँ वर्षा के स्वामी इंद्र महाराज की अर्चना-वंदना करने लग जाती हैं-“हे इंद्र महाराज! हम तुम्हें चंदन की चौकी पर बैठाएँगी। दूध से तुम्हारे पाँव धोएँगी, चावल पकाएँगी तथा मूंग की धुली हुई दाल राँधेगी। ताँबे की कटोरी में घी गरम करेंगी। चलते समय तुम्हारी चाल देखेंगी। पलंग पर झालरदार गलीचा बिछाएँगी और तुम्हें सोने के लिए कहेंगी। हे महाराज! आज तो हमारे देश पर दया करो।” 

चौकी पर इंदर राजा बैठो तो जी

एजी कोई दूध पलारूँगी पाँय ! 

आज मेहर करो इंदर राजा देश में जी! 

निश्छल ग्रामबालाओं के अनुनय-विनय पर कोई पाषाणहृदय भी पिघल उठता है, तो भला सहृदय जलधर कबतक उनकी पुकार अनसुनी कर सकता था! और, बादल का नाम तो पर्जन्य ठहरा। बकपंक्तियों की मुक्तामाला धारण किए हुए, बिजलियों की स्वर्ण-पताका फहराते हुए, गर्जन का नगाड़ा ठोकते हुए, मतवाले बादल विजय-यात्रा के लिए नभपथ पर उतर आए। 

प्यासी-पथराई पृथ्वी पर अमृत की बूँदें झरने लगी और निष्प्राण प्राणियों में नई चेतना लौट आई। मौन मरघट में भी खुशियों की रागिनी बिखर उठी। पर्वत वर्षा-जल से भरपूर स्नान कर मानो पूजन के लिए उद्यत हो उठे। सागर के ऊपर मूसलाधार वर्षा इस प्रकार होने लगी, मानो कुबेर के पास अशर्फियों के तोड़े पहुँचाए जा रहे हों।

मेघ ने “सन्तप्तानां त्वमसि शरणम्’ कविसम्राट कालिदास के इस वाक्यखंड को सार्थक किया। वैसे तो वर्षा की फुहार ‘आषाढस्य प्रथमदिवसे’ आरंभ हो जाती है और आश्विन तक यदा-कदा धौले बादलों की घुड़दौड़ दिखाई पड़ती है, किंतु इसकी मस्तानी बहार तो सावन-भादों में ही देखते बनती है। बरसात के मनोहर दृश्य का क्या कहना! ‘ नभपथ में मेघखंड को चलते देखकर कभी तो ऐसा लगता है जैसे पर्वत पंख फैलाए उड़ रहे हों। कभी लगता है कि नभ-सागर में वणिकों के पोतसमुदाय निकल पड़े हों! 

कभी मेघखंड काँवर ढोनेवाले तीर्थयात्रियों की तरह मालूम पड़ते हैं, तो कभी राजा नल के हाँफते हुए दौड़नेवाले दूतसमूह-जैसे, जो दमयंती को खोजने के लिए निकल पड़े हों। 

दिग्वधओं ने मेघरूपी वस्त्र से अपने शरीर को ढक लिया है। उनकी मुस्कराहटें जुही की कलियाँ बन झर रही हैं। उनके अंगकदंब कंटकित हो रहे हैं। प्रकृति रानी पल-पल परिधान परिवर्तित करती दिखाई पड़ती है। कभी वह वैदूर्यमणि की तरह घास का हरा साड़ी पहन लेती है, तो कभी पीले फूलों का पीतांबर धारण कर कन्हैया का अभिनय करनेवाली राधा की भाँति प्रतीत होती है। झींगुरों की झंकार उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ की शहनाई की तरह गूंजती है, तो मेढकों की टर्र-टर्र ‘विविध भारती’ के कर्नाटक संगीत जैसी मालूम पड़ती है। ऊदे-ऊदे बादलों के बीच तना हुआ इंद्रधनुष गंगा पर बने राजेंद्रपुल की सहसा याद दिला देता है। 

घनघोर वर्षा होने पर बेचारे गरीबों का दिल दहलता रहता है। हर क्षण उन्हें अपने कच्चे घर गिर जाने की आशंका बनी रहती है, यम की कचहरी से किसी समय भी उनके सारे परिवार का परवाना कट सकता है। अतिवृष्टि से छोटी-छोटी सड़कें सर्पिल नालों में बदल जाती हैं-यातायात में बड़ी कठिनाई उपस्थित हो जाती है। सड़कें, पुल, रेलवे-लाइनें-ये सभी टूट जाती हैं।

अतिवृष्टि होने से बाढ़-दानवी गदराई फसलों को बहा ले जाती है। ईंधन-चारे का अभाव हो जाता है। हैजा, मलेरिया आदि बीमारियों का प्रकोप हो जाता है। मच्छर-मक्खियों की सेना का आक्रमण होने लगता है। साँप-बिच्छुओं की पलटन उतर आती है और हमारे प्राण हर क्षण खतरे में रहते हैं। घूमने-फिरने और खेल-कूद की असुविधा के कारण पाचनशक्ति नष्ट हो जाती है और हमें रोगों का शिकार होना पड़ता है। 

किंतु, संसार की ऐसी कोई भी वस्तु नहीं, जिसके प्रकाश-पक्ष के साथ उसका अंधकार-पक्ष न हो। जो वर्षाऋतु जीवनदायिनी है, अन्न-ब्रह्म की प्रापयित्री है, नयनरंजन है, प्राणियों की प्राणभूता है, कामनाओं की प्राण है, सारे वर्ष हर्षप्रदायिनी है, उसी के अतिरेक में यदि चाँद में कलंक की तरह एक-दो अवगुण हों, तो चिंता नहीं करनी चाहिए। 

जो ग्रीष्म के प्राणघाती आतप को सह नहीं सकते, उनके जीवन में वर्षा का सरस जलधर उपलब्ध नहीं हो सकता, उन्हें उसकी हरीतिमा सुलभ नहीं हो सकती, उनका जीवन, सुपल्लवित, सुपुष्पित नहीं हो सकता। अतः, हम लू में बार-बार तपनेवाले जीवनधर्म के तपस्वी कह उठेंगे 

बार-बार बरसो मेरे

आँगन में मतवाले बादल ! 


Essay on rainy season 

Haven’t you ever seen Agu-Jag distraught by the extreme tyranny of the summer-monster? At that time, the earth begins to heat up like a pan. When he is not able to tolerate the incest of summer, his heart becomes exhausted. His inner suffering becomes visible in the form of cracks. The sunlight exits the sky like fire. When the ghoulish vampire exploits the exploits of the Suhagins, the poor begin to look like sick widows.

In the twilight of a dense brother, when the shadow also wants the shade, then who should say that the human body is human! Birds’ nests become the potter’s eyes. There is a feeling of sadness on the faces of naive farmers. They stare at the inexorable Gagan with unflattering eyes. Krishakkumaris start praying to Indra Maharaj, the lord of rain – “O Indra Maharaj! We will make you sit at the sandwich post. Will wash your feet with milk, cook rice and wash washed moong dal. Ghee will be heated in a copper bowl. You will see your movement while walking. Lay a ruffled rug on the bed and ask you to sleep. Hey chef! Have pity on our country today. “

If Inder Raja sit at the post

AG will get some milk!

Please live in the country of Inder Raja!

If a stone-heart also melts at the persuasion of the innocent villagers, then how long could the call of the heart be unheard of! And, the name of the cloud was declared as pursani. Wearing the free speech of the queens, hoisting the golden-ensign of the lightning, thundering the thunder, the drunken clouds descended on the Nabphath for the Vijay Yatra.

Thirsty-pathless drops of nectar began to sprout on the earth and new souls returned to soulless beings. The silence of happiness also shattered in the silence. The mountain was filled with rain-water as if it was ready for worship. The torrential rain over the ocean started in this way, as if the breaking of Ashrafis were being carried near Kubera.

Megh made this sentence of Kavisamrat Kalidas “Santaptanam Tvamsi Sharanam” meaningful. By the way, rain showers begin on ‘Aashadhasya First Day’ and sometimes a rash of dust clouds can be seen till Ashwin, but its Mastani is seen only in the spring. What to say about the beautiful rainy scene! Seeing the Meghalkhand moving in the sky, it sometimes feels as if the mountains are flying with wings spread. At times, it seems that the vessel community of foresters has come out in the sea!

Sometimes, Meghalkhand seems like a pilgrim carrying Kanwar, sometimes a messenger of Raj Nal’s pantheon-like, who set out to find Damayanti.

The Digvadhas have covered their bodies with cloudy clothes. His smiles are falling into the buds of Juhi. His limbs are getting chopped off. Prakriti Rani is seen changing her dress moment by moment. Sometimes she wears a green sari of grass like Vaidyurmani, sometimes she looks like Radha acting Kanhaiya wearing yellow flowers. The chimes of the prawns echo like the shehnai of Ustad Bismillah Khan, while the treads of the frogs sound like the Carnatic music of ‘Vividh Bharati’. The rainbow strung amidst the clouds reminds me of Rajendrapul on the Ganges.

Poor poor heart burns due to heavy rain. Every moment they have the possibility of falling from their kutcha houses, Yama’s office can cut off the whole family at any time. Small roads turn into spiral drains due to overflow – great difficulty is present in the traffic. Roads, bridges, railway lines – all of them break down.

Due to overflowing, flood-heavy earth sweeps the crops. There is a lack of fuel-feed. Outbreaks of diseases like cholera, malaria etc. occur. An army of mosquito-flies begins to attack. The platoon of snakes and scorpions comes down and our lives are in danger every moment. Due to the inconvenience of walking and sports, digestive power is destroyed and we have to suffer from diseases.

But, there is no such thing in the world which does not have its dark side with light side. The one who is the rainbow of life, the attainment of food and Brahma, is the breath of life, is the soul of creatures, is the soul of desires, the whole year is the joy of happiness, in his excesses, if the moon has one or two defects like stigma, then do not worry. needed.

Those who cannot bear the deadly terror of summer, the rain can not have water available in their lives, their greenness may not be accessible, their life cannot be fulfilled, fulfilled. Therefore, we will rise up in the heatwaves saying the ascetic of life-long life.

Rain me again and again

Drunken clouds in the courtyard!

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