रेलगाड़ी का आविष्कार किसने किया था | Train ka avishkar kisne kiya tha

रेलगाड़ी का आविष्कार किसने किया था

रेलगाड़ी का आविष्कार किसने किया था | Train ka avishkar kisne kiya tha

छुक्क-छुक्क करती रेलगाड़ी यातायात का ऐसा साधन है, जिसमें सैकड़ों-हजारों व्यक्ति एक साथ सफर कर सकते हैं। यही नहीं, रेलगाड़ी का ही एक दूसरा रूप है- मालगाड़ी, जो रेलगाड़ी की ही तरह पटरियों पर चलकर अपने गन्तव्य स्थल तक पहुंचती है, किन्तु उसका प्रयोग एक शहर से दूसरे शहर तक आवश्यक वस्तुएं (माल) भेजने में होता है। 

रेलगाड़ी का पहला इंजन जेम्स वॉट ने बनाया था। वह इंजन भाप का इंजन था। उन्हें बचपन से ही तरह-तरह के प्रयोग करने की आदत थी। एक दिन उन्होंने देखा कि चूल्हे पर उनकी मां ने पानी से भरकर भगोना रख दिया। जैसे ही पानी उबला, भगोने का ढक्कन भाप की शक्ति से ऊपर उठने लगा। जेम्स वॉट इस घटना को बड़े गौर से देख रहे थे। उन्होंने ढक्कन पर वजन रख दिया, कुछ ही देर में ढक्कन फिर ऊपर उठा और भगोने से भाप बाहर निकल गई। उन्हें इस बात पर विश्वास हो गया कि भाप में बहुत शक्ति होती है। इसी शक्ति के आधार पर उन्होंने भाप के इंजन का विकास किया। 

जेम्स वॉट ने थॉमस न्यूकोमैन द्वारा बनाए गए भाप के इंजन के मॉडल का परिवर्तित रूप बनाया। थॉमस ने वह मॉडल सन् 1700 ई. में बनाया था। 

रेलगाड़ी का आविष्कार किसने किया था

वास्तव में आज से कई सौ वर्ष पूर्व ग्रीक अर्थात् यूनान के वैज्ञानिक हैरो ने इंजन का आविष्कार कर दिया था, मगर उसके द्वारा बनाए गए इंजन को देखकर लोगों ने उसका बहुत मजाक उड़ाया था। जिस कारण हैरो ने अपना धैर्य खो दिया और उसे इतना क्रोध आया कि उसने अपने अविष्कृत इंजन को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। 

यद्यपि जेम्स वॉट के बनाए हुए इंजन की भी लोगों ने खिल्ली उड़ाई थी, मगर उसने धैर्य से काम लिया। लोगों के उपहास पर उसने तनिक भी ध्यान नहीं दिया और अपने कार्य में जुटा रहा। जेम्स वॉट ने अपनी बुद्धिमानी से विभिन्न प्रकार के इंजन बनाए। 

सन् 1804 ई. में विश्व की पहली रेलगाड़ी का आविष्कार हुआ। इसके आविष्कारकर्ता थे-रिचर्ड। किन्तु रिचर्ड द्वारा बनाई गई रेलगाड़ी कुछ ठीक नहीं थी। इस कारण रिचर्ड दूसरी रेलगाड़ी के निर्माण कार्य में जुट गए। जब उनकी वह रेलगाड़ी पूरी तरह से बन गई, तो उन्होंने उसका नाम रखा–’मुझे कौन पकड़ सकता है?’ 

जिस समय रिचर्ड रेलगाड़ी बनाने की तैयारी कर रहे थे, उन्हीं दिनों इंग्लैण्ड के वैज्ञानिक स्टीफेंसन भी रेलगाड़ी के निर्माण कार्य में लगे थे। यद्यपि स्टीफेंसन द्वारा तैयार की गई रेलगाड़ी में आवश्यकता से अधिक समय लगा, किन्तु स्टीफेंसन की रेलगाड़ी रिचर्ड की रेलगाड़ी से बेहतर थी। स्टीफेंसन की रेलगाड़ी को लोगों ने बहुत पसन्द किया। इसी कारण रिचर्ड के स्थान पर रेलगाड़ी के आविष्कारक’ की उपाधि स्टीफेंसन को दी गई। 

स्टीफेंसन की रेलगाड़ी में लगे इंजन का नाम रॉकेट था। यहां यह जानकारी देना आवश्यक है कि स्टीफेंसन ने रेलगाड़ी का आविष्कार सन् 1825 ई. में किया था। 

रेलगाड़ी का आविष्कार किसने किया था

स्टीफेंसन द्वारा रेलगाड़ी के आविष्कार से करीब बाईस वर्ष पहले विथिक नामक इंजीनियर ने एक इंजन बनाया था, मगर उसकी गुणवत्ता बहुत ही खराब थी। इसमें अनेक यांत्रिक दोष थे। स्टीफेंसन ने सर्वप्रथम उस इंजन के यांत्रिक दोषों को दूर किया था। 

स्टीफेंसन एक फायरमैन के बेटे थे। उन्होंने अपने पिता की सहायता करने के लिए कोयला ढोने वाले इस इंजन का निर्माण किया था। इस इंजन से तीस टन कोयले को आठ मील की दूरी तक ले जाया जा सकता था। जब वे अट्ठारह वर्ष के थे, तब वे नाइट स्कूल में पढ़ने के लिए जाते थे, मगर उन्हें लोकोमोटिव बनाने का आरम्भ से शौक था।

स्टीफेंसन ने सबसे पहले 27 सितम्बर, सन् 1825 ई. में पहली बार भाप द्वारा चलने वाली रेलगाड़ी को दस मील लम्बी लोहे की पटरियों पर डार्लिंगटन और स्टापटन के बीच दौड़ाया था। यह विश्व की सबसे पहली रेलगाड़ी थी। इस मौके पर संसार की सर्वप्रथम सेवा इसी रेलगाड़ी से आरम्भ हुई थी। यद्यपि यह पटरी माल ढोने के लिए बनाई गई थी, मगर स्टीफेंसन की रेलगाड़ी के उद्घाटन के अवसर पर उस पटरी का प्रयोग कर चार सौ पचास लागों ने इस रेलगाड़ी में यात्रा की। इसमें अड़तीस डिब्बे थे, जो खुले थे। उस रेलगाड़ी की गति 12 से 16 मील प्रतिघण्टा थी। 

स्टीफेंसन सारी उम्र रेलगाड़ी का विकास कार्य करते रहे। सन् 1829 ई. में रेलगाड़ी के ब्रेक का परीक्षण किया गया तो स्टीफेंसन का बनाया हुआ रॉकेट इंजन इस परीक्षण में सफल हो गया। उस इंजन का प्रयोग लिवरपूल मानचेस्टर रेलवे में प्रयोग किया जाना था। 

सन् 1830 ई. में स्टीफेंसन द्वारा निर्मित सात इंजन सवारियों की कोचों को चालीस मील लम्बी पटरी पर तीस मील प्रति घण्टे की रफ्तार से खींचने में समर्थ थे। इस तरह स्टीफेंसन का नाम सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध हो गया।

भारतवर्ष में पहली रेलगाड़ी 16 अप्रैल, सन् 1853 ई. को रेल की पटरी पर दौड़ी। उसके चलने का स्थान बम्बई था और पहुंचने का ठाणे अर्थात् वह बम्बई से ठाणे तक चली थी। उस समय उस रेलगाड़ी को 21 तोपों की सलामी दी गई थी। 

धीरे-धीरे रेलगाड़ी में काफी सुधार किए गए। उन दिनों रेलगाड़ी में सीटें, पंखे, प्रकाश, दरवाजे, खिड़कियां आदि नहीं होती थीं। तब रेलगाड़ी में फर्श पर बैठना पड़ता था। रेलगाड़ी के डिब्बे मालगाड़ी की तरह खुले होते थे। उसमें खिड़की, प्रकाश आदि की भी सुविधा नहीं थी। यहां तक कि खतरे की जंजीर भी नहीं होती थी। रेलगाड़ी का चालक सीटी के स्थान पर घण्टा बजाता था। 

 

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