रेडियो का आविष्कार किसने किया?

रेडियो का आविष्कार किसने किया?

रेडियो  का आविष्कार किसने किया था-Radio ka avishkar kisne kiya tha

रेडियो नामक यंत्र मनुष्य-जाति के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुआ है। आज रेडियो यंत्र का जल, थल और वायु हर जगह उपयोग हो रहा है। अलग-अलग रेडियो स्टेशनों से अलग-अलग वेवलेंथ पर आता है। वेवलेंथ (तरंग दैय) को समझने के लिए उदाहरण हैं-दो कीलों पर बंधी हुई डोरी को हिलाने से उसमें लहर पैदा होती है। यह लहर एक सिरे A से उठती है। उठती-उठती यह उच्चतम स्थान B तक पहुंचती है, फिर ज्यादा-से-ज्यादा नीचे C तक आई और फिर ऊपर उठी D तक। D तक पहुंचकर लहर अपनी उसी स्थिति में हो गई, जैसे A पर थी।A से B, B से C और C से D तक की दूरी एक तरंग अथवा लहर या वेव कहलाएगी। A से D तक पहुंचने में लहर ने एक चक्कर पूरा कर लिया, जिसे एक साइकिल कहा जाता है। 

बिजली की लहरें ईथर (आकाश) में उतने ही वेग से बहती हैं, जितने से प्रकाश की लहरें। ये एक लाख, छियासी हजार मील प्रति सैकेण्ड की गति से बहती हैं। एक सैकेण्ड में लहर ने कितने चक्कर पूरे किए इस पर तरंग दैर्ध्य निर्भर है। 

रेडियो  का आविष्कार किसने किया?

बिजली की लहरों का यह दैर्ध्य कुछ इंच से लेकर कई मील का हो सकता है। एक सैकेण्ड में एक लाख, छियासी हजार लम्बी लहर एक ही चक्कर पूरा करेगी। यदि लहर की लम्बाई एक हजार मील हो, तो एक सैकेण्ड में एक सौ छियासी चक्कर लगेंगे।

मीटर में नापने के लिए बिजली की लहरें एक सैकेण्ड में तीस करोड़ मीटर दूर जाती हैं। यदि इस संख्या को प्रति सैकेण्ड चक्करों से भाग दिया जाए, तो तरंग-दैर्ध्य निकल आएगा। सौ मीटरों से कम लम्बी लहरों की बहुधा छोटी लहर (शार्ट वेज) और इससे ज्यादा लम्बी लहर को लम्बी लहर (लांग वेज) कहते हैं। साधारणतया दो सौ से छः सौ मीटर तक ही लहरें मध्यम लहर (मीडियम वेज) कहलाती हैं। 

रेडियो एक यंत्र है, जिसके द्वारा बिना तार की सहायता से एक स्थान के समाचार दूसरे स्थान पर भेजे जा सकते हैं। इसका प्रयोग दूर-दूर के समाचार सुनने, गाना, वार्ता आदि सुनने में किया जाता है। रेडियो पर न केवल हम अपने देश के समाचार सुनते हैं, बल्कि हमें ब्रिटिश ब्रॉडकास्ट कॉर्पोरेशन, जर्मनी और जापान के रेडियो स्टेशनों से चले समाचार भी प्राप्त होते रहते हैं।

 द्वितीय विश्वयुद्ध में चर्चिल, रूजवेल्ट, हिटलर, मुसोलिनी और स्टैलिन के शब्द घर बैठे कानों से सुन लिए जाते थे। हमारे देश में जहां से समाचार अथवा गाने इत्यादि प्रसारित किए जाते हैं, उसे प्रसार भारती आकाशवाणी अर्थात् ऑल इण्डिया रेडियो या ‘ब्रॉड कास्टिंग स्टेशन’ कहते हैं। इस स्टेशन से प्रसारित समाचार अथवा गाना आदि हम रेडियो के माध्यम से सुनते रहे हैं। 

रेडियो का आविष्कार आज से लगभग एक शताब्दी पूर्व हुआ था। करीब पचास वर्ष पूर्व रेडियो ‘बेतार के तार’ के नाम से बहुत प्रसिद्ध था। इसके लिए बहुत ऊंचे खम्भे लगाए गए थे। 

उन दिनों उन खम्भों पर तार बांधकर बिना तार के समाचार प्राप्त किए जाते थे। मगर आज खम्भों इत्यादि की आवश्यकता नहीं है। 

रेडियो का आविष्कार इटली के निवासी गुग्लोमो मारकोनी ने सन् 1896 ई. में किया था। उनके आविष्कार के बाद इस रेडियो-यंत्र में निरन्तर सुधार होते रहे। 

रेडियो (बेतार के तार) का रहस्य जानने के लिए मैक्सवेल के सिद्धान्त और हर्टज के प्रारम्भिक प्रयोगों से परिचित होना अत्यन्त आवश्यक है। सन् 1864 ई. में जेम्स कार्क मैक्सवेल ने सर्वव्यापक ईथर (आकाश) की कल्पना इस बात के लिए आवश्यक समझी, जिसके आधार पर नौ करोड़, तीस लाख मील दूर सूरज से हमारे पास तक रोशनी आ रही है। 

रोशनी तरंगों के रूप में चलती है, किन्तु कोई ऐसा द्रव भी तो होना चाहिए, जिसमें तरंगें उठें, जैसे पानी की लहरें। मैक्सवेल ने विचार किया कि सूर्य और 

हमारे मध्य ईथर का एक विस्तृत तालाब है और इसमें उठने वाले प्रकाश की तरंगें विद्युत-चुम्बकीय तरंगों के समान हैं। 

ईथर क्या है? इसे जानने के लिए हमें देखना होगा कि हमारा शरीर मिट्टी, पानी, आग, हवा और आकाश-पांच तत्वों के मेल से बना है। हम इन पांचों को अपनी आंखों से देख सकते हैं, किन्तु इन पंच तत्वों में एक ऐसी वस्तु छिपी रहती है, जिसे हम न तो देख सकते हैं और न ही सुन सकते हैं। यह चीज बंद बर्तन के भीतर रहती है, ठोस से ठोस वस्तु को भी ईथर के नाम से पुकारते हैं। ईथर की तरंगें हमेशा आकाश में दौड़ती रहती हैं। उन्हीं के कारण हमें रोशनी और गरमी मिलती है। ये हवा से भी अधिक तेज चलती हैं। 

प्राचीन काल में भी किसी को भी ईथर का ज्ञान नहीं था। सर्वप्रथम ह्यूजी नामक एक वैज्ञानिक ने ईथर का पता लगाया। 

सन् 1864 ई. में मैक्सवेल और कुक्स ने ईथर के सम्बन्ध में एक और नई बात ज्ञात की कि ईथर में बिजली की शक्ति के द्वारा तरंगें पैदा की जा सकती हैं।

 मैक्सवेल ने सिद्धान्त तो प्रस्तुत कर दिया, परन्तु उस सिद्धान्त के ईथर का समर्थन प्रयोगों द्वारा होना अभी शेष था। यह कार्य सन् 1886 ई. में जर्मन देश के एक युवा वैज्ञानिक हाइनरिक हर्ट्स ने किया। हर्ट्स के प्रयोग का संक्षिप्त रूप इस प्रकार है-  

हर्ट्स ने आवेश बेठन अर्थात् इंडक्शन कॉयल के दोनों सिरों को जस्ते की दो प्लेटों से संयुक्त किया। प्लेटों का यह युग्म संग्राहक अर्थात् कण्डेंसर कहलाता है। आवेश बेठन द्वारा कण्डेंसर को चार्ज (विद्युन्मय) किया गया। मगर जब प्लेटों के मध्य चिंगारी दौड़ी, तो कण्डेंसर विद्युतहीन अर्थात् डिस्चार्ज हो गया। कण्डेंसर को बार-बार इस तरह विद्युन्मय और विद्युतहीन किया जा सकता है। जैसे ही कण्डेंसर विद्युतहीन होता, वैसे ही इसमें विद्युत तरंगें आगे को ईथर में बढ़ने लगतीं। 

हर्ट्ज ने कण्डेंसर की दोनों प्लेटों से दो तार लगाए और उनके सिरों को मोड़कर एक-दूसरे से थोड़ी दूरी पर रखा। इन दोनों सिरों के मध्य जैसे ही चिंगारी छुटती, इनसे विद्युत तरंगे आगे को बढ़तीं। 

हर्ट्ज ने अपने यंत्र की सहायता से ईथर से सफलतापूर्वक तरंगें पैदा की। हर्ट्ज ने ईथर के सम्बन्ध में और भी कई आश्चर्यजनक बातें सिद्ध कीं। उसने यह भी कहा कि ईथर की तरंगों की शक्ति से अद्भुत से अद्भुत कार्य पूर्ण किए जा सकते हैं। किन्तु उन दिनों किसी ने ईथर की तरंगों से लाभ उठाने की ज्यादा कोशिश नहीं की। 

सन् 1889 ई. में प्रोफेसर एडुअर्ड ब्रैनली नामक एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने यह ज्ञात किया था कि कांच की नली में यदि लोहे का बुरादा लिया जाए, तो यह ईथर की विद्युत तरंगों के संसर्ग में आने पर बहुत घनीभूत हो जाता है। ब्रैनली ने इस निरीक्षण के आधार पर एक ‘कोहेरेर’ नामक यंत्र बनाया। इस यंत्र को अनुस्पन्दक अथवा ग्राहक भी कहा जाता है। इसके साथ बैटरी तथा बिजली की घण्टी लगाकर रखी गई। जिस आवर्तन से विद्युत की तरंगें कोहेरेर पर पड़तीं, बिजली की घण्टी उसी आवर्तन से बजती, यद्यपि कण्डेंसर और बिजली की घण्टी में तार द्वारा सम्बन्ध नहीं था, किन्तु तब भी आकाश में से आयी हुई तरंगों ने बिजली की घण्टी बजा दी|

ब्रैनली के इस कोहेरेर यंत्र का प्रयोग आगे चलकर मारकोनी ने अपनी युक्ति को सफल बनाने के लिए किया था। 

इधर हर्ट्ज की ईथर वाली विद्युत लहरों पर कई वैज्ञानिकों ने कार्य आरम्भ किया। इन वैज्ञानिकों में लिवरपूल के सर आलिवर लाज और बोलोग्ना के प्रोफेसर रीधी प्रमुख थे। 

इटली का एक युवा युवक गुग्लीमो मारकोनी भी इसी प्रकार के प्रयोगों में लगा हुआ था। उसने अपनी प्रतिभा से यह जान लिया था कि हर्ट्स के प्रयोग आकाश मार्ग से समाचार भेजने में अवश्य सहायक होंगे।

 गुग्लीमो मारकोनी का जन्म इटली के बालोग्रा नामक नगर में सन् 1874 ई. को हुआ था। उनके पिता गाइसिय इटली के ही निवासी थे। जब वह छोटे थे, तभी से उनकी रुचि विज्ञान के क्षेत्र में हो गई थी। वह प्रायः एकान्त में बैठकर ज्ञानार्जन हेतु साधना किया करते थे। 

इसका ही परिणाम था, जो मात्र इक्कीस वर्ष की आयु में बेतार के तार का एक यंत्र बनाने में वह पूरी तरह सफल हुए थे। यद्यपि मारकोनी से पूर्व भी कई वैज्ञानिकों ने इस सम्बन्ध में सराहनीय प्रयोग किए, जिनमें एडिसन, मार्स, कुक्स, हार्टेप पयक और लज का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है; किन्तु बेतार के तार द्वारा समाचार भेजने में मारकोनी के अलावा और किसी को सफलता प्राप्त नहीं हुई। 

 हर्ट्स ने जो यंत्र बनाया था, मारकोनी ने भी उसकी के आधार पर यंत्र का आविष्कार किया। उससे मारकोनी को एक नई बात मालूम हुई। उसने देखा कि, इस यंत्र की शक्ति से, ईथर की जो तरंगें पैदा होती हैं, उनमें अधिक दूर जाने की शक्ति नहीं होती। वह सोचने लगा कि वह किस उपाय से ईथर की तरंगों को दूर से भी दूर स्थानों में भेज सकता है? 

इसके पूर्व रूस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक पयफ ने लम्बा तार झुलाकर आकाश से बिजली संग्रह करने की युक्ति निकाली थी। सहसा यह बात मारकोनी के मस्तिष्क में आई। उसने सोचा कि यदि चिंगारी (स्फुतिलंग) वाला एक तार भूमि में छुआ दिया जाए और अनुस्पंदक का भी एक तार भूमि में लगा दिया जाए, तो ईथर की तरंगें बहुत दूर तक अपना प्रभाव दिखा सकती हैं। मारकोनी ने चिंगारी वाले दो तारों में से एक को खड़ा ऊंचा टांग दिया और दूसरे को भूमि से स्पर्श किया। इसी तरह अनुस्पंद के एक तार को भी इस ऊंचे तार से जोड़ दिया। ये ऊंचे तार आकाशीय तार अर्थात् एण्टीना कहलाए।

 मारकोनी ने आवेश बेठन के साथ टेलीग्राफ-की का भी सम्बन्ध कर दिया था और हर्ट्स की बिजली की घण्टी के स्थान पर टेलीग्राम साउण्डर (खटखटा यंत्र) रख दिया। इन आकाशी तारों का उपयोग करना मारकोनी की विशेषता थी। 

सन् 1896 ई. में मारकोनी इंग्लैण्ड गए और उसी वर्ष उन्होंने अपने नये आविष्कार बेतार के यंत्र का सरकार से विशेषाधिकार प्राप्त कर लिया। इस तरह उन्होंने अपना आविष्कार पेटेंट करा लिया। 

रेडियो  का आविष्कार किसने किया?

मारकोनी ने अपने यंत्र का इंग्लैण्ड के प्रमुख शासनाधिकारियों के सम्मुख प्रदर्शन किया। अधिकारी उनके यंत्र को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। इंग्लैण्ड आने से पूर्व मारकोनी अपने प्रयोग द्वारा दो मील तक समाचार भेजने में सफल हो चुके थे। अतः आगे भी उन्होंने अपनी इन तरंगों का उपयोग समाचार भेजने में ही किया। 

मारकोनी व्यवहार-कुशल थे। इंग्लैण्ड में उन्हें सर डब्ल्यू.एच. प्रीस का सहयोग प्राप्त हुआ। प्रीस स्वयं बेतार के तार पर प्रयोग कर चुके थे और एक बार जब सन् 1895 ई. में ओबन और मालद्वीप के मध्य समुद्री तार भंग हो गया था, प्रीस ने बेतार के तार से समाचार भेजने का आयोजन भी किया था। 

मारकोनी ने अपने प्रयोगों से सम्बन्धित सबसे पहला व्याख्यान इंग्लैण्ड में दिया। उस सभा के अध्यक्ष प्रीस थे। वास्तव में आविष्कार के प्रारम्भिक दिनों में मारकोनी के प्रीस से इंग्लैण्ड में निस्पृह प्रोत्साहन मिला। धीरे-धीरे मारकोनी के काम की 

ओर अन्य लोगों ने भी रुचि दिखाई। लार्ड सप्तम एडवर्ड भी, जब वे प्रिंस ऑफ वेल्स थे, युवा वैज्ञानिक मारकोनी की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने अपनी नौका मारकोनी को प्रयोगों के लिए दे दी। 

सन् 1897 ई. में मारकोनी इटली के सम्राट की इच्छानुसार स्पेजिया गए। उन्होंने वहां समुद्र के किनारे बेतार के तार का स्टेशन स्थापित किया। स्टेशन से करीब बारह मील की दूरी पर युद्ध में लगे हुए जहाजों से उस यंत्र द्वारा बातचीत सम्भव हो सकी। मारकोनी वहां से पुनः इंग्लैण्ड लौट आए। 

सन् 1898 ई. में उन्होंने सबसे पहले इंग्लैण्ड और फ्रांस में बेतार के तार द्वारा समाचार भेजने का प्रबंध किया। 12 दिसम्बर, सन् 1901 ई. का दिन मारकोनी के जीवन का चिरस्मरणीय दिन था। इस दिन एटालोटिक समुद्र के आरपार (अमेरिका के न्यूफाउण्ड द्वीप से इंग्लैण्ड तक) पहली बार बेतार के तार से समाचार भेजा गया। इस दिन तीन छोटे बिन्दुओं का संदेश, जो मोर्स लिपि में ‘S’ होता है, महासागर को पार करके आया। इसका अपना ही सम्पूर्ण सफलता का प्रमाण था। मात्र 1.19 सैकेण्ड में संदेश ने अट्ठारह सौ मील की दूरी पार की थी।

अभी बेतार की पद्धति में काफी सुधार करने शेष थे। करीब एक वर्ष के बाद 22 दिसम्बर, सन् 1902 ई. में एटलांटिक के आर-पार वास्तविक विस्तृत समाचार भेजने में सफलता मिल सकी। मगर इस अवधि में मारकोनी को बहुत-सी बाधाओं का सामना करना पड़ा। 

न्यूफाउण्ड लैण्ड की एक केबल कम्पनी ने मारकोनी को उस द्वीप में काम न करने दिया, उसे वहां से अपने सारे यंत्र उठा लेने पड़े। बहुत से वैज्ञानिक लोग इस चमत्कार को संदेह की दृष्टि से देखते थे। उन सभी को यह यकीन नहीं होता था कि बेतार के तार का साधारण तार की भांति प्रयोग भी हो पाएगा। मगर आज सम्पूर्ण विश्व बेतार के तार से व उसके लाभों से परिचित है। शान्ति व युद्ध के समय बेतार के तार बहुत सहायक सिद्ध हुए। इन्होंने हजारों मील दूर के देशों की दूरियों को पलों में समेट दिया। 

सन् 1902 ई. में मारकोनी ने ईथर की लहरों की विद्यमानता जताने वाले ‘चुम्बकी सांकेतक’ (मैगनेटिक डिटेक्टर) का पेटेण्ट करवा लिया। 

सन् 1903 ई. में अमेरिका के प्रेसिडेण्ट रूजवेल्ट ने सप्तम एडवर्ड को समाचार भेजा। दो वर्ष बाद मारकोनी ने खड़े आकाशी तारों के स्थान पर ऊंचाई पर आड़े लगे हुए तारों का उपयोग किया। सन् 1910 ई. में मारकोनी ने ब्यूनेस आयर्स से आयरलैण्ड तक छः हजार मील के आरपार समाचार भेजने में सफलता प्राप्त की। सन् 1914 ई. में जब पहला विश्वयुद्ध आरम्भ हुआ, तब मारकोनी चाहते थे कि बेतार के तार का युद्ध के कामों में उपयोग होना चाहिए। इस प्रकार मारकोनी का यंत्र धीरे-धीरे सर्वव्यापक बन गया, कई कम्पनियों ने मारकोनी से उसकी मशीनें बनवायीं। उन मशीनों के माध्यम से मारकोनी ने बहुत धन कमाया। 

सन् 1919 ई. में मारकोनी ने इटली में हुए शान्ति सम्मेलन में प्रतिनिधित्व किया। इससे दस वर्ष पूर्व (सन् 1909 ई.) में मारकोनी को भौतिक विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला और इसी वर्ष उन्हें इटली के सीनेट का सदस्य चुना गया। सन् 1929 ई. में इटली ने उन्हें ‘मारचीज’ के सम्मान से सम्मानित किया। 

भारत में प्रथम रेडियो प्रसारण सन् 1927 ई. में कलकत्ता और बम्बई में हुआ। भारत सरकार के अधीन प्रथम प्रसारण अर्थात् भारतीय प्रसारण सेवा सन् 1927 ई. से आरम्भ हुई। आकाशवाणी द्वारा प्रसारण सन् 1957 ई. में आरम्भ हुआ और सन् 1957 ई. के अक्टूबर माह में विविध भारती का प्रसारण आरम्भ हुआ। । 

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