रडार कैसे काम करता है-Radar kaise kam karta hai

रडार कैसे काम करता है

रडार कैसे काम करता है-Radar kaise kam karta hai

रडार एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है। इसके माध्यम से किसी भी दूरी, दिशा, ऊंचाई और गति से गुजर रही वस्तु का पता लगाया जा सकता है। रडार का उपयोग रात्रि, कोहरे, बरसात और बर्फ पड़ने पर भी किया जाता है। इसका इस्तेमाल पायलट द्वारा हवाई अड्डे पर जहाज उतारते समय किया जा सकता है। दुश्मन के हमले से बचाव के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है। रेडार के द्वारा पृथ्वी पर मौजूद वातावरण का अध्ययन तो किया ही जाता है, यह ग्रहों तथा चंद्रमा के अध्ययन में भी सहायक है। रडार के माध्यम से रेडियो तरंगें लक्ष्य तक प्रेषित की जाती है। लक्ष्य से प्रतिबिंबत किरणों के लौटने में लगने वाले समय से लक्ष्य की दूरी व दिशा का पता चलता है। 

डिजाइन व आकार में भिन्न-भिन्न होते हैं रडार। प्रत्येक उपकरण में रडार सिगनल के लिए ट्रांसमीटर और एरियल लगा होता है। रडार की हवाई जहाज में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसका उपयोग हवाई जहाज और हवाई अड्डे दोनों पर किया जाता है। इसके माध्यम से आने और जाने वाले हवाई जहाजों का पता लगाया जाता है। यह 80 किलोमीटर की दूरी तक हवाई जहाजों की स्थिति से अवगत कराता है। खराब मौसम में हवाई जहाज के लिए नियंत्रक रडार की मदद ली जाती है। रडार एलीमिनेटर बताता है कि हवाई जहाज किस ऊंचाई पर उड़ रहा है। इसके आधार पर चालक दिशा तय करते हैं। 

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यह नाविकों के लिए भी उपयोगी है। जब सामने से आ रहा जलयान, जलशैल अथवा हिमशैल दिखाई नहीं देता, तब रडार का उपयोग कर दुर्घटना से बचा जा सकता है। जब जहाज तट के नजदीक होते हैं, तब नाविक रडार प्रतिध्वनि के माध्यम से द्वीप और सीमा चिन्ह का पता लगाता है। बंदरगाह पर तैनात कर्मी इसी के माध्यम से जहाजों का ट्रैफिक नियंत्रित करते हैं। वे रडार पर दिखाई दे रहे नक्शे के माध्यम से जलयानों के संचालन पर नजर रखते हैं।

सेना में भी रडार की भूमिका बहुउपयोगी होती है। वायुसेना में अधिकतम दूरी वाले रडारों की जरूरत होती है। इसके माध्यम से रात्रि में दुश्मन के हवाई जहाजों का पता लगाने में सहायता मिलती है। दूसरे देशों की युद्ध से संबंधित सूचनाएं इसी के जरिए एकत्रित की जाती हैं। लड़ाकू विमान रडार के जरिए मैदानी इलाके में लगी दुश्मन की सेना की स्थिति तथा उपकरणों का पता लगाते हैं।

मौसम के पूर्वानुमान के लिए भी रेडार का उपयोग किया जाता है। रडार प्रतिध्वनि बादलों में 400 किलोमीटर की दूरी से बरसात या खराब मौसम का पता लगाती है। इसके अलावा तूफान किस दिशा और किस गति से आएगा, इसका भी पता भी इसके द्वारा लगाया जा सकता है। इसलिए हवाई अड्डों पर मौसम रडार लगा होता है। वैज्ञानिक इसके जरिए पृथ्वी के बाह्य वातावरण में मौजूद तापक्रम और हवा में मौजूद गैसों का अध्ययन करते हैं। 100 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर हवा रेडियो तरंगें छोड़ती है। बाह्य वातावरण में मौजूद हवा ‘आयन मंडल’ कहलाती है। यहां सूर्य की किरणें इतनी सशक्त होती हैं कि वे हवा में मौजूद अणुओं को तोड़कर विद्युतीय कणों में बदल देती है। परिणाम स्वरूप पृथ्वी की सतह पर इनका अध्ययन रडार के जरिए किया जाता है।

रडार से प्रेषित तरंगों की निश्चित आवृत्ति होती है। इन आवृत्तियों का मापन मेगाहर्ट्ज में किया जाता है। निचली आवृत्तियों में संचालित रडार उच्च आवृत्तियों वाले रडारों की अपेक्षा मौसम का पूर्वानुमान बेहतर करते हैं। रडार तरंगें अन्य विद्युत चुम्बकीय तरंगों की तरह 299, 792 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से संचालित होती है, जबकि वापसी में इनकी गति 599,584 किलोमीटर प्रति सेकंड होती है। रडार का एरियल तरंगों की दिशा इंगित करता है। यह प्रतिबिंबित ध्वनि एकत्रित करता है।

 रडार का उपयोग सर्वप्रथम सन् 1925 में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने किया था। वर्तमान में वैज्ञानिक इसके आकार को छोटा करने एवं इसे कम कीमत में तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं। 

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