प्राचीन महान् गणितज्ञ पाइथागोरस ऑफ सामोस की जीवनी

प्राचीन महान् गणितज्ञ पाइथागोरस ऑफ सामोस की जीवनी

प्राचीन महान् गणितज्ञ पाइथागोरस ऑफ सामोस की जीवनीPythagoras ki jivani

प्रसिद्ध गणितज्ञ पाइथागोरस ऑफ सामोस का जन्म यूनान के निकट सामोस नामक टापू पर 580 ईसा पूर्व हुआ था। पाइथागोरस ने जब होश सम्भाला, तब लिखने के लिए आज की तरह कागज-पेन नहीं थे और न ही भोजपत्र पर लेखन करने का चलन था। इस कारण उनके कार्य-कलापों की गाथा जनश्रुतियों पर आधारित है। 

ईसा पूर्व छठी शताब्दी में यूनान की सभ्यता का बोलबाला था। यहां के निवासी धनवान, सभ्य और सुसंस्कृत थे। उनका व्यवसाय भी अच्छा चलता था। उन दिनों उनका व्यावसायिक केन्द्र सामोस टापू था। पाइथागोरस का परिवार भी धनधान्य से परिपूर्ण था। 

पाइथागोरस के पिता ने उन्हें, उनकी मेधाशक्ति को देखकर अच्छी शिक्षा दिलायी थी। मात्र सोलह वर्ष की किशोरावस्था में पाइथागोरस की प्रतिभा इतनी विकसित हो गई थी कि विद्यालय के शिक्षक भी उनके प्रश्नों के उत्तर देने में खुद को असमर्थ समझते थे। उन्हें सन्तुष्ट करना अध्यापकों के सामर्थ्य से बाहर की बात थी। यह सब देखकर उनके पिता ने पाइथागोरस को वोल्स ऑफ मिलेट्स की देखरेख में अध्ययन करने के लिए भेज दिया। 

पाइथागोरस ट्रिपल,

पाइथागोरस में कुछ नया व विचित्र कार्य करने की लगन थी, वहां उन्हें अवसर मिला। उन्होंने अपनी विश्व विख्यात प्रमेय का वहीं आकर सूत्रपात किया तथा उसका प्रयोगात्मक प्रदर्शन भी किया। इनकी इस प्रमेय के अनुसार किसी समकोण त्रिभुज में दो भुजाओं के वर्गों का योग तीसरी भुजा के वर्ग के बराबर होता है। उनका उदाहरण इस प्रकार है 

“यदि किसी समकोण त्रिभुज में एक भुजा की लम्बाई 6 सेमी० हो और दूसरी भुजा की लम्बाई आठ सेमी० हो, तो तीसरी भुजा की लम्बाई (कर्ण की लम्बाई) दस सेमी० होगी। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 6 सेमी० की भुजा में 1-1 सेमी० के छत्तीस वर्ग होंगे और 8 सेमी० की भुजा में एक सेमी० के चौसठ वर्ग होंगे। इन दोनों का योग सौ होगा। इस प्रकार सबसे लम्बी भुजा में सौ वर्ग होंगे अर्थात् उस भुजा की लम्बाई दस सेमी० होगी।” 

 

प्राचीन महान् गणितज्ञ पाइथागोरस ऑफ सामोस (Pythagoras of Samos)  प्रसिद्ध गणितज्ञ पाइथागोरस ऑफ सामोस का जन्म यूनान के निकट सामोस नामक टापू पर 580 ईसा पूर्व हुआ था। पाइथागोरस ने जब होश सम्भाला, तब लिखने के लिए आज की तरह कागज-पेन नहीं थे और न ही भोजपत्र पर लेखन करने का चलन  था। इस कारण उनके कार्य-कलापों की गाथा जनश्रुतियों पर आधारित है।  ईसा पूर्व छठी शताब्दी में यूनान की सभ्यता का बोलबाला था। यहां के निवासी धनवान, सभ्य और सुसंस्कृत थे। उनका व्यवसाय भी अच्छा चलता था। उन दिनों उनका व्यावसायिक केन्द्र सामोस टापू था। पाइथागोरस का परिवार भी धनधान्य से परिपूर्ण था।  पाइथागोरस के पिता ने उन्हें, उनकी मेधाशक्ति को देखकर अच्छी शिक्षा दिलायी थी। मात्र सोलह वर्ष की किशोरावस्था में पाइथागोरस की प्रतिभा इतनी विकसित हो गई थी कि विद्यालय के शिक्षक भी उनके प्रश्नों के उत्तर देने में खुद को असमर्थ समझते थे। उन्हें सन्तुष्ट करना अध्यापकों के सामर्थ्य से बाहर की बात थी। यह सब देखकर उनके पिता ने पाइथागोरस को वोल्स ऑफ मिलेट्स की देखरेख में अध्ययन करने के लिए भेज दिया।            पाइथागोरस में कुछ नया व विचित्र कार्य करने की लगन थी, वहां उन्हें अवसर मिला। उन्होंने अपनी विश्व विख्यात प्रमेय का वहीं आकर सूत्रपात किया तथा उसका प्रयोगात्मक प्रदर्शन भी किया। इनकी इस प्रमेय के अनुसार किसी समकोण त्रिभुज में दो भुजाओं के वर्गों का योग तीसरी भुजा के वर्ग के बराबर होता है। उनका उदाहरण इस प्रकार है  “यदि किसी समकोण त्रिभुज में एक भुजा की लम्बाई 6 सेमी० हो और दूसरी भुजा की लम्बाई आठ सेमी० हो, तो तीसरी भुजा की लम्बाई (कर्ण की लम्बाई) दस सेमी० होगी। इसका तात्पर्य यह हुआ कि 6 सेमी० की भुजा में 1-1 सेमी० के छत्तीस वर्ग होंगे और 8 सेमी० की भुजा में एक सेमी० के चौसठ वर्ग होंगे। इन दोनों का योग सौ होगा। इस प्रकार सबसे लम्बी भुजा में सौ वर्ग होंगे अर्थात् उस भुजा की लम्बाई दस सेमी० होगी।”  वास्तव में यूनानी पाइथागोरस ही विश्व के ऐसे पहले गणितज्ञ थे, जिन्होंने ज्यामिति के प्रमेयों के लिए उत्पत्ति प्रणाली की नींव रखी। उन्होंने यह भी प्रमाणित करके दिखाया कि किसी भी त्रिभुज के तीनों अंतः कोणों का योग दो समकोण के बराबर होता है। उन दिनों मुद्रण कला का अभाव था। लेखन सामग्री उपलब्ध नहीं थी, इसी कारण ग्रन्थों की उपलब्धि का सवाल ही नहीं उठता।  तत्कालीन शिक्षार्थियों को अध्ययन हेतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर विद्वानों से सम्पर्क बनाना पड़ता था। ऐसा कहा जाता है कि पाइथागोरस को भी ज्ञान की खोज में पूरे तीस वर्षों तक फारस, बेबीलोन, अरेबिया और भारत तक का भ्रमण करना पड़ा था। उन दिनों भारत में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध अपने नए धर्म का प्रसार कर रहे थे।  यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस ने इस भ्रमण काल में कई वर्ष मिस्र में गुजारे। इस बीच उन्होंने संगीत एवं गणित के मध्य कड़ी जोड़ने का प्रयत्न किया। तत्कालीन कई मिस्र लेख इस बात के साक्षी हैं कि इन्होंने स्वर ग्रामों पर भी कार्य किया। पचास वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते ये काफी कुछ सीख गए थे। अब ये एक ऐसे विद्यालय की स्थापना करना चाहते थे, जहां विद्यार्थियों को गणित का ज्ञान दिया जा सके।  ईसा से 532 वर्ष पूर्व इस यूनानी गणितज्ञ को सामोस के क्रूर शासक से मुक्ति पाने के लिए इटली की ओर पलायन करना पड़ा। वहां पहुंचकर उन्होंने 529 ईसा पूर्व में क्रोटोन में एक विद्यालय की स्थापना की। अब उनका सपना साकार हुआ। कुछ ही समय में तीन सौ विद्यार्थियों ने उनके विद्यालय में प्रवेश ले लिया। उनका यह विद्यालय एक धार्मिक संस्थान था, जिसमें हर किसी को परस्पर एक-दूसरे को समझने का अवसर प्रदान किया जाता था। प्रमुखतः वहां पर अंकगणित, ज्यामिति, संगीत   तथा ज्योतिष विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी। इसके साथ ही यूनानी दर्शन से भी अवगत कराया जाता था। इस महान् गणितज्ञ का विचार था कि नक्षत्र वक्र गति से घूमते हैं। उन्होंने दिन-रात के विषय में अपना मत दिया था कि पृथ्वी किसी केन्द्रीय शक्ति के चहुं ओर चक्कर लगाती है। उन्होंने अंकों के सिद्धान्त पर कार्य किया। वे पिरामिड, घनादि आकृतियां भी बनाना जानते थे।  इसके अतिरिक्त उन्होंने संगीत और गणित के बीच भी सम्बन्ध स्थापित किए। गणितज्ञ पाइथागोरस धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनका कहना था  "मानव को पवित्र जीवन यापन करना चाहिए, क्योंकि इसी के माध्यम से आत्मा को देह के बन्धन से मुक्त किया जा सकता है।” ।  मगर दुर्भाग्यवश उनके विचारों को मानने वाले उनके अनुयायी राजनीति क्षेत्र में कूद पड़े। उन लोगों को जहां भी अवसर मिलता था वे अपना अधिकार जमाने का प्रयास करते थे।  उनकी करनी का सारा दोष पाइथागोरस के सिर पर आ पड़ा। दण्ड-स्वरूप उन्हें देश निकाला दे दिया गया।  इस महान् गणितज्ञ की अस्सी वर्ष की आयु में ईसा से करीब पांच सौ वर्ष पूर्व मैटापोण्टम (इटली) में मृत्यु हो गई।  मृत्यु के बाद भी, उनके विचारों से प्लेटो जैसे महान् यूनानी दार्शनिक भी प्रभावित रहे। ईसा से 300 वर्ष पूर्व पाइथागोरस की रोम केरीनेट में विशाल प्रतिमा बनवायी गई और उन्हें यूनान के महानतम् बुद्धिमान व्यक्ति का सम्मान प्रदान किया गया।

वास्तव में यूनानी पाइथागोरस ही विश्व के ऐसे पहले गणितज्ञ थे, जिन्होंने ज्यामिति के प्रमेयों के लिए उत्पत्ति प्रणाली की नींव रखी। उन्होंने यह भी प्रमाणित करके दिखाया कि किसी भी त्रिभुज के तीनों अंतः कोणों का योग दो समकोण के बराबर होता है। उन दिनों मुद्रण कला का अभाव था। लेखन सामग्री उपलब्ध नहीं थी, इसी कारण ग्रन्थों की उपलब्धि का सवाल ही नहीं उठता। 

तत्कालीन शिक्षार्थियों को अध्ययन हेतु एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर विद्वानों से सम्पर्क बनाना पड़ता था। ऐसा कहा जाता है कि पाइथागोरस को भी ज्ञान की खोज में पूरे तीस वर्षों तक फारस, बेबीलोन, अरेबिया और भारत तक का भ्रमण करना पड़ा था। उन दिनों भारत में बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध अपने नए धर्म का प्रसार कर रहे थे। 

यूनानी गणितज्ञ पाइथागोरस ने इस भ्रमण काल में कई वर्ष मिस्र में गुजारे। इस बीच उन्होंने संगीत एवं गणित के मध्य कड़ी जोड़ने का प्रयत्न किया। तत्कालीन कई मिस्र लेख इस बात के साक्षी हैं कि इन्होंने स्वर ग्रामों पर भी कार्य किया। पचास वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते ये काफी कुछ सीख गए थे। अब ये एक ऐसे विद्यालय की स्थापना करना चाहते थे, जहां विद्यार्थियों को गणित का ज्ञान दिया जा सके। 

ईसा से 532 वर्ष पूर्व इस यूनानी गणितज्ञ को सामोस के क्रूर शासक से मुक्ति पाने के लिए इटली की ओर पलायन करना पड़ा। वहां पहुंचकर उन्होंने 529 ईसा पूर्व में क्रोटोन में एक विद्यालय की स्थापना की। अब उनका सपना साकार हुआ। कुछ ही समय में तीन सौ विद्यार्थियों ने उनके विद्यालय में प्रवेश ले लिया। उनका यह विद्यालय एक धार्मिक संस्थान था, जिसमें हर किसी को परस्पर एक-दूसरे को समझने का अवसर प्रदान किया जाता था। प्रमुखतः वहां पर अंकगणित, ज्यामिति, संगीत तथा ज्योतिष विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी। इसके साथ ही यूनानी दर्शन से भी अवगत कराया जाता था। इस महान् गणितज्ञ का विचार था कि नक्षत्र वक्र गति से घूमते हैं। उन्होंने दिन-रात के विषय में अपना मत दिया था कि पृथ्वी किसी केन्द्रीय शक्ति के चहुं ओर चक्कर लगाती है। उन्होंने अंकों के सिद्धान्त पर कार्य किया। वे पिरामिड, घनादि आकृतियां भी बनाना जानते थे। 

इसके अतिरिक्त उन्होंने संगीत और गणित के बीच भी सम्बन्ध स्थापित किए। गणितज्ञ पाइथागोरस धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनका कहना था 

“मानव को पवित्र जीवन यापन करना चाहिए, क्योंकि इसी के माध्यम से आत्मा को देह के बन्धन से मुक्त किया जा सकता है।” । 

मगर दुर्भाग्यवश उनके विचारों को मानने वाले उनके अनुयायी राजनीति क्षेत्र में कूद पड़े। उन लोगों को जहां भी अवसर मिलता था वे अपना अधिकार जमाने का प्रयास करते थे। 

उनकी करनी का सारा दोष पाइथागोरस के सिर पर आ पड़ा। दण्ड-स्वरूप उन्हें देश निकाला दे दिया गया। 

इस महान् गणितज्ञ की अस्सी वर्ष की आयु में ईसा से करीब पांच सौ वर्ष पूर्व मैटापोण्टम (इटली) में मृत्यु हो गई। 

मृत्यु के बाद भी, उनके विचारों से प्लेटो जैसे महान् यूनानी दार्शनिक भी प्रभावित रहे। ईसा से 300 वर्ष पूर्व पाइथागोरस की रोम केरीनेट में विशाल प्रतिमा बनवायी गई और उन्हें यूनान के महानतम् बुद्धिमान व्यक्ति का सम्मान प्रदान किया गया।

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